” किसान आंदोलन का क्या नतीजा निकलेगा , इसका दारोमदार तो राजनैतिक नेतृत्व पर है पर आंदोलन शांतिपूर्ण रहे , इसकी कुछ हद तक ज़िम्मेदारी पुलिस बलों की भी है । दिल्ली , उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस को अलग अलग और एक साथ भी बैठ कर इस पर गंभीर चर्चा करनी चाहिये कि ऐसा क्यों हुआ कि ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने आवश्यक मात्रा मे बल प्रयोग नही किया और बिना ज़रूरत उन उपकरणों का प्रदर्शन किया जिन से मनवाधिकारों का सम्मान करने वाले लोकतंत्र का हमारा दावा निश्चित रूप से कमज़ोर पड़ा है ?”
“असफलता की पुलिसिया खीझ”

विभूति नारायण राय, IPS
लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके हैं
कुछ चाक्षुष अनुभव ऐसे होते हैं जिन्हे आप हमेशा भूल जाना चाहेंगे । किसान आंदोलन के दौरान हाल मे उन्हे और उनके ट्रैक्टरों को राजधानी दिल्ली की सड़कों पर आने से रोकने के लिये पुलिस द्वारा सड़कों पर गाड़ी गयीं लंबी नुकीली कीलें या कंसरटीना तारों की बाड़ें ऐसे ही दृश्य हैं जिन्हें देखते हुये वितृष्णा और दहशत एक साथ पैदा होती है । यह क्योंकर संभव हो रहा है कि लोकतंत्र बनने की प्रक्रिया मे लगे एक समाज और अपने को उसके अनुकूल बनाने का प्रयास कर रही पुलिस की जुगलबंदी ऐसे विज़ुअल निर्मित कर रही है जो किसी सुसंस्कृत आँखों को रुचिकर नही लगेंगे?
इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि भारत मे पुलिस की प्रतिक्रियाएँ अक्सर ग़ैर पेशेवर कारणों से प्रभावित होती हैं । 26 जनवरी को जिस तरह से सिंधु बार्डर से दिल्ली मे घुसे अराजक ट्रैक्टर सुरक्षा चक्र को तोड़ते हुये लाल क़िले तक पहुँच गये और फ़िर बिना किसी बड़ी बाधा के उस पर एक धार्मिक झंडा फहरा दिया गया , उस से किसी को भी दिल्ली पुलिस को एक प्रशिक्षित और पेशेवर पुलिस बल मानने मे दिक्कत होगी । अपनी शुरुआती नालायकी पर लीपापोती करने के प्रयास मे दिल्ली पुलिस ने आंदोलन के अगले चरण को रोकने के लिये हरियाणा और उत्तर प्रदेश की सीमाओं पर ऐसे इन्तज़ामात किये कि कई सांसदों को सदन मे कहना पड़ा कि ऐसे दृश्य तो उन्होंने पाकिस्तान की सीमा पर भी नही देखे हैं ।
पुलिस की हड़बड़ी मे की गयी अतिरेक़ी व्यवस्थाओं के कारण तलाशना बहुत मुश्किल नही होगा । क़ानून व्यवस्था बनाये रखने का दायित्व एक स्थिति के बाद पुलिस के नेतृत्व पर छोड़ दिया जाना चाहिये । किसी परिस्थिति मे लक्ष्य निर्धारित होने के बाद उसे हासिल करने की रणनीति बनाने और लागू करने की ज़िम्मेदारी इसी नेतृत्व की होनी चाहिये । पर ऐसा बिरले ही होता है । अमूमन पुलिस द्वारा तय की गयी रणनीति मे महत्वपूर्ण सुझाव ग़ैर पेशेवर सूत्रों से आते हैं और अक्सर वही अंतिम भी होते हैं । 26 जनवरी को दिल्ली मे फैली अराजकता इसी का उदाहरण है । जिस तरह से घटनाक्रम घटित हुआ उससे विश्वास करना मुश्किल होगा कि किसान मार्च से निपटने की रणनीति पुलिस का शीर्ष नेतृत्व बना रहा था या वही उसमे समय समय पर आवश्यकतानुसार परिवर्तन कर रहा था ?
संचारक्रांति के चलते पूरा देश दम साधे दिल्ली की सड़कों पर अराजकता और उससे निपटने मे पुलिस की असफलता देख रहा था । यह सही है कि गणतंत्र दिवस के आयोजनों की विराटता और उन पर संभावित आतंकी ख़तरों के चलते दिल्ली पुलिस की पहली प्राथमिकता वही थी पर इसके बाद भी जितने संसाधन उसके पास दिख रहे थे , वे दृढ़ता से और सही रणनीति से इस्तेमाल किये जाते तो अराजकता काफ़ी हद तक सीमित की जा सकती थी । छोटे पर्दे से चिपका देश दोनो पक्षों – किसानों और पुलिस के घात प्रतिघात देख रहा था और किसी से छिपा नही रहा कि पुलिस कभी भी स्पष्ट नही थी कि उसे करना क्या है । कोई अदृश्य हाथ था जो उसकी रणनीति मे अपनी ज़रूरत के मुताबिक़ वक़्ती बदलाव कर रहा था? नतीजतन लाल क़िले मे जो कुछ हुआ उसके लिये तो कोई भी तैयार नही था ।
26 जनवरी की असफलता के दौरान इस संयम के लिये तो दिल्ली पुलिस की तारीफ़ की जानी चाहिये कि उन्होंने अपने कर्मियों के गंभीर रूप से घायल होने के बावजूद उपद्रवियों पर गोली नही चलायी और किसी इंसानी जान का नुक़सान नही हुआ। पर इस सवाल का जवाब कहीं से नही मिलता कि आँसू गैस के गोलों और लाठीचार्ज के बाद उनके पास रबर बुलेट जैसे कम घातक विकल्प क्यों नही थे जिनके चलते बिना जान लिये भी भीड़ को विसर्जित किया जा सकता था ? पुलिस के पास विदेशों की तरह स्टन ग्रिनेड या मिर्चों के छिड़काव जैसे विकल्प ज़्यादा होने चाहिये जो जान लेने की जगह भय उत्पन्न करें ।
टीवी पर दिन भर की घटनायें देखते हुये मैं लगातार आशंकित रहा कि शुरू मे अपर्याप्त प्रतिरोध करने वाला पुलिस बल अपने सदस्यों को ज़ख़्मी होते देख कर किसी मौक़े पर अधिक असंगत बल का प्रयोग कर देगा और जिसके बड़े दूरगामी गंभीर परिणाम निकल सकते हैं । सौभाग्य से ऐसा नही हुआ ।
इसके बाद 6 फ़रवरी के चक्का जाम के दौरान जिस तरह की नाकाबंदी दिल्ली सीमा पर की गयी वह किसी पेशेवर कार्यवाही से अधिक अपनी पिछली असफलता की खीझ निकालने का प्रयास अधिक लगता है । एक ख़राब आप्टिक की तरह बड़ी बड़ी नुक़ीली कीलें सड़क पर गाड़ीं गयीं, रास्तों पर कंक्रीट के टुकड़े रखे गये या कंसरटीना तार बिछाये गये । हम यह भूल गये कि अब एक विश्वग्राम में तब्दील दुनिया मे जनांदोलनों से निपटने के लिये की जाने वाली राज्य की कार्यवाही अंतरराष्ट्रीय ख़ुर्दबीन से होकर गुजरती है । मानवधिकारों का एक आम स्वीकृत स्तर है , जिस की कसौटी पर कसने पर इन तस्वीरों से भारत की छवि धूमिल होगी और जिस तरह की अंतरराष्ट्रीय प्रतिक्रियाएँ इन पर मिलीं वे किसी भी तरह से उत्साह बढ़ाने वाली नहीं थीं ।
थोड़े धैर्य और कल्पनाशीलता से काम लिया जाता तो इन्हीं उपायों को बेहतर ढंग से इस्तेमाल किया जा सकता था । मसलन कीलों जड़े लकड़ी के फट्टे सुरक्षित रखे जा सकते थे और जिन्हें ज़रूरत पड़ने पर किसी भी रास्ते पर तेज़ी से लगाया जा सकता था। इसी तरह कंसरटीना तार भी प्रशिक्षित टुकड़ी द्वारा समय रहते बिछाया जा सकता है । किसान कोई शत्रु देश के सैनिक नही हैं जो रात के अंधेरे मे अचानक हमला करेंगे । हर आंदोलन पूर्व घोषित होता है और पुलिस के अवरोध तोड़ने के पहले घंटों खींचातानी चलती है । हर बार इतना समय तो होता ही है कि पुलिसकर्मी ज़रूरत पड़ने पर उपरोक्त अवरोधक लगा सकें । यह सब नही किया गया और दिल्ली सीमा को वास्तविक नियंत्रण रेखा जैसा दिखने दिया गया तो शायद इसके पीछे वह उतावली झुँझलाहट थी जिसके लिये किसी पेशेवर पुलिस बल मे जगह नही होनी चाहिये ।

किसान आंदोलन का क्या नतीजा निकलेगा , इसका दारोमदार तो राजनैतिक नेतृत्व पर है पर आंदोलन शांतिपूर्ण रहे , इसकी कुछ हद तक ज़िम्मेदारी पुलिस बलों की भी है । दिल्ली , उत्तर प्रदेश और हरियाणा पुलिस को अलग अलग और एक साथ भी बैठ कर इस पर गंभीर चर्चा करनी चाहिये कि ऐसा क्यों हुआ कि ज़रूरत पड़ने पर उन्होंने आवश्यक मात्रा मे बल प्रयोग नही किया और बिना ज़रूरत उन उपकरणों का प्रदर्शन किया जिन से मनवाधिकारों का सम्मान करने वाले लोकतंत्र का हमारा दावा निश्चित रूप से कमज़ोर पड़ा है ? राजनैतिक नेतृत्व को भी इन परिस्थितियों मे पुलिस नेतृत्व को ज़िम्मेदार ठहराने के साथ साथ उन्हे फ़ैसलों मे पर्याप्त स्वतंत्रता देनी ही होगी तभी संभव हो सकेगा कि समय पर पर्याप्त बल का प्रयोग हो और बेज़रूरत उनका फूहण प्रदर्शन न किया जाय ।

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