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मध्य प्रदेश कांग्रेस सरकार संकट: बिना लड़े हार नहीं मानना चाहते कमलनाथ

मध्य प्रदेश में कांग्रेस बिना लड़े हार मानने के लिए तैयार नहीं है। पूर्व केंद्रीय मंत्री ज्योदिरादित्य सिंधिया के बीजेपी में शामिल होने और उनके समर्थक विधायकों के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री कमलनाथ ने सरकार बचाने की मुहिम तेज कर दी है।

पार्टी जहां एक तरफ इस्तीफा देने वाले विधायकों को मनाने में जुटी है। दूसरी तरफ पार्टी की कोशिश है कि किसी तरह बीजेपी खेमे में सेंध लगाई जाए। हालांकि कांग्रेस रणनीतिकार मानते हैं कि कमलनाथ सरकार बचाना बड़ी चुनौती है।
कांग्रेस एक वरिष्ठ नेता ने दावा किया कि बेंगलुरु में ठहरे पार्टी के कई विधायक संपर्क में हैं।

पार्टी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा कि कई विधायकों का कहना है कि वह वरिष्ठ नेता ज्योतिरादित्य के समर्थक हैं, लेकिन वे भाजपा में जाने के लिए तैयार नहीं हैं। हमें उम्मीद है कि यह सभी विधायक वापस लौट आएंगे। कई भाजपा विधायक भी कांग्रेस के संपर्क में हैं। ऐसे में कांग्रेस सरकार बहुमत साबित करने में सफल रहेगी।

बेंगलुरु में मौजूद कांग्रेस के बागी विधायकों को मनाने की जिम्मेदारी वरिष्ठ नेता डीके शिवकुमार को सौंपी गई है। पार्टी ने बुधवार को ही शिवकुमार को कर्नाटक में प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष की जिम्मेदारी भी सौंपी। शिवकुमार ऐसी स्थितियों में मध्यस्थ के तौर पर जाने जाते हैं, लेकिन कर्नाटक में भाजपा सरकार है, ऐसे में शिवकुमार की सीधे तौर पर विधायकों तक पहुंच सीमित है। इसलिए मुख्यमंत्री कमलनाथ खुद सभी विधायकों से संपर्क करने की कोशिश कर रहे हैं।

वरिष्ठ नेता भोपाल पहुंचे 
पार्टी महासचिव मुकुल वासनिक और दीपक बाबरिया भोपाल पहुंच गए हैं। दिल्ली में मौजूद पार्टी के सभी वरिष्ठ नेता कमलनाथ से संपर्क बनाए हुए हैं। मुख्यमंत्री के करीबी सज्जन वर्मा और दिग्विजय सिंह के भरोसेमंद गोविंद सिंह को भी विधायकों के साथ संपर्क बनाने की जिम्मेदारी सौंपी गई है। पार्टी की कोशिश है कि किसी भी स्थिति में सदन के अंदर बहुमत साबित किया जाए। मध्य प्रदेश विधानसभा का बजट सत्र 16 मार्च से शुरू होने वाला है।
अभी सरकार सुरक्षित – पीडीटी आचार्य (संविधान विशेषज्ञ)
संविधान विशेषज्ञ और लोकसभा के पूर्व महासचिव पीडीटी आचार्य का कहना है कि जब तक विधानसभा अध्यक्ष विधायकों के त्यागपत्र पर कोई निर्णय नहीं लेते हैं, तब तक सरकार सुरक्षित है। उन्होंने कहा कि विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने के लिए एक तय प्रारूप है। इसके साथ विधायक को यह भी बताना होता है कि वह किसी दबाव में इस्तीफा नहीं दे रहा है। एक साथ 22 विधायक इस्तीफा देते हैं, तो हो सकता है कि त्यागपत्र किसी दबाव में दिए गए हैं।
विधायकों के त्यागपत्र स्वीकार करने के मामले में विधानसभा अध्यक्ष की राय बेहद अहम है। स्पीकर सभी विधायकों को निजी तौर पर उनके सामने पेश होकर इस्तीफा देने के लिए कह सकते हैं, ताकि वह यह सुनिश्चित कर सके कि विधायक पर कोई दबाव नहीं है। सदन की कार्यवाही शुरू होने तक अध्यक्ष विधायकों के त्यागपत्र पर कोई निर्णय नहीं लेते हैं, तब तक उन्हें पार्टी के व्हिप का पालन करना होगा। इसे नहीं मानने की स्थिति में विधायक पर कार्रवाई हो सकती है।

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