पितृपक्ष पर विशेष
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आशीर्वाद पिता का
डॉ रविशंकर पांडेय
खतम हुआ
सब मेला ठेला
शाम हुई
जब हुआ अकेला
स्मृतियों से
छनकर के तब
चेहरा आता याद पिता का ।
तुम क्या गए
कि निपट अकेला
ज्यों मेले में छूट गया मैं
एक खिलौना
मिट्टी जैसा
टुकड़े टुकड़े टूट गया मैं।
एकाकीपन में
होता तब फोटो से
संवाद पिता का ।
रहे सत्य के सदा पुजारी
भागवत के
तुम भाष्यकार थे
बीतराग
जड़भरत सरीखे
सुख में दुख में निर्विकार थे।
जीवन क्या था
चलता फिरता गीता का
अनुवाद पिता का ।
अंतहीन यात्रा पर
जाने कहां गए
तुम हमें छोड़कर
बरबस यादों में आते हो
जीवन के
हर कठिन मोड़ पर।
ढाढस हमें
बंधाता है तब
आकर आशीर्वाद पिता का ।
तब स्मृतियों से
छनकर के
चेहरा आता याद पिता का।।
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