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जयपुर: “नीर, नारी, नदी और नारायणी” सम्मेलन

दिनांक: 7–8 मई

स्थान: जयपुर

Water and Women Governance and Well-being विषय पर 7–8 मई को जयपुर में महिला सम्मेलन आयोजित किया गया।

सम्मेलन का उद्देश्य जमीनी आवाज़ों को नीति-निर्माण तक पहुँचाना, महिलाओं के जीवन-संघर्षों को केंद्र में लाना तथा जलवायु परिवर्तन, जल न्याय और महिलाओं के नेतृत्व से जुड़े मुद्दों पर राष्ट्रीय स्तर पर संवाद स्थापित करना था।

सम्मेलन में देशभर से आई महिलाओं, सामाजिक कार्यकर्ताओं और विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधियों ने भाग लिया। प्रतिभागियों ने अपने अनुभव साझा करते हुए कहा कि आज का संघर्ष केवल महिला सशक्तिकरण तक सीमित नहीं है, बल्कि यह अस्मिता, अस्तित्व और जीवन बचाने का संघर्ष बन चुका है। उन्होंने कहा कि रोटी, कपड़ा और मकान से आगे बढ़कर अब जीवन को सुरक्षित और जीवंत बनाए रखना सबसे बड़ा मुद्दा है।

सम्मेलन में यह चिंता व्यक्त की गई कि जलवायु परिवर्तन के कारण स्वच्छ जल, आजीविका और स्वास्थ्य से जुड़े संकट लगातार गहराते जा रहे हैं। महिलाओं ने बताया कि जलवायु परिवर्तन ने समाज के बड़े हिस्से को लाचार, बेरोज़गार और बीमार बना दिया है। जीवन, जीविका और ज़मीर से जुड़े सवालों को आज औद्योगिक और व्यापारिक शक्तियों के दबाव में अनदेखा किया जा रहा है।

प्रतिभागियों ने कहा कि जमीनी समुदायों की आवाज़ें लगातार कमजोर की जा रही हैं, जबकि आर्थिक और व्यापारिक शक्तियों का प्रभाव बढ़ता जा रहा है। उन्होंने चिंता व्यक्त की कि आम लोगों की समस्याएँ नीति-निर्माण की प्रक्रिया में पर्याप्त स्थान नहीं पा रही हैं।

सम्मेलन में भारत के संविधान में निहित समता, न्याय और समान अवसरों की भावना को मजबूत करने की आवश्यकता पर जोर दिया गया। महिलाओं ने कहा कि सामाजिक और आर्थिक असमानताओं की बड़ी दीवारें खड़ी कर दी गई हैं, जिन्हें तोड़ना कठिन अवश्य है, लेकिन असंभव नहीं।

देशभर से आई महिलाओं और साथियों ने संगठित होकर यह संकल्प लिया कि वे जल, जंगल, ज़मीन और जीवन के सवालों पर सामूहिक संघर्ष को आगे बढ़ाएँगी तथा समाज में चेतना निर्माण का कार्य करेंगी।

सम्मेलन में जल न्याय और लैंगिक न्याय को परस्पर जुड़ा हुआ विषय बताते हुए कहा गया कि बाढ़, सूखा और जल संकट जैसी चुनौतियों का समाधान महिलाओं की सक्रिय भागीदारी के बिना संभव नहीं है। आदिवासी और ग्रामीण समुदायों की पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियों को पुनर्जीवित करने पर भी विशेष बल दिया गया।

प्रतिभागियों ने कहा कि जल अब केवल महिलाओं का विषय नहीं रहा, बल्कि जलवायु परिवर्तन ने इसे पूरे समाज का साझा प्रश्न बना दिया है। नदियों, झरनों, पहाड़ों और जल स्रोतों को केवल पूजा का विषय नहीं, बल्कि संरक्षण, सम्मान और पुनर्जीवन का विषय मानने की आवश्यकता है।

सम्मेलन में वर्षा जल संरक्षण, भूजल पुनर्भरण, जैव विविधता संरक्षण और स्थानीय जल-संस्कृति के पुनर्जीवन पर विस्तार से चर्चा हुई। यह निर्णय लिया गया कि बालवाड़ियों, स्कूलों और समुदायों में शुद्ध जल उपलब्ध कराने के लिए सामूहिक प्रयास किए जाएँगे।

महिलाओं ने इस बात पर भी जोर दिया कि जल संरक्षण, परिवार और समुदाय के जीवन को संभालने में उनकी भूमिका सदैव महत्वपूर्ण रही है। उन्होंने प्रकृति, संस्कृति और श्रम के प्रति महिलाओं की समझ को समाज की बड़ी शक्ति बताया।

सम्मेलन में महिलाओं के सकारात्मक कार्यों और संघर्षों का दस्तावेजीकरण करने तथा उन्हें व्यापक स्तर पर साझा करने का निर्णय लिया गया। इसके लिए एक कार्यसमूह का गठन किया गया, जिसकी संयोजक इंदिरा खुराना को बनाया गया। यह समूह जमीनी स्तर पर कार्य कर रही महिलाओं की पहचान कर उनके अनुभवों और प्रयासों को समाज के सामने लाएगा।

यह भी तय किया गया कि महिलाओं की कहानियों, संघर्षों और सफल पहलों को देशभर में साझा करने के लिए यात्राएँ और संवाद कार्यक्रम आयोजित किए जाएँगे। सम्मेलन के उद्देश्यों को आगे बढ़ाने हेतु विभिन्न राज्यों में कार्य करने वाली टीमों का गठन भी किया गया।

सम्मेलन का समापन “नीर, नारी, नदी और नारायणी” के संकल्प के साथ हुआ। प्रतिभागियों ने विश्वास व्यक्त किया कि जल संकट और जलवायु परिवर्तन जैसी चुनौतियों का समाधान सामूहिक चेतना, महिला नेतृत्व और जमीनी संघर्षों के माध्यम से ही संभव है।

वीरेंद्र मिश्र: दिल्ली ब्यूरो

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