
आचार्य अमिताभ जी महाराज
“जीवन की आपाधापी में क्या सत्य है, क्या असत्य है ? इसका निर्णय करना बहुत कठिन हो जाता है। इतिहास के पन्नों में झांकने पर बहुत कुछ ऐसा प्राप्त होता है जिस पर हमारी कभी दृष्टि नहीं गई होती है। किंतु उसके बड़े निहितार्थ होते हैं। ऐसा ही एक प्रसंग है सम्राट पृथ्वीराज चौहान तथा मोहम्मद गोरी का।”

सैन्य विज्ञान के मापदंडों के आधार पर यदि विवेचन करेंगे तो बहुत दुख होगा। हमारी आध्यात्मिक तथा उपनिषद पर आधारित विचारधारा में त्याग, मानवता, मानव धर्म, व्यक्तिगत अनुशासन आदि पर बहुत-बहुत बल दिया जाता रहा है,
किंतु यदि राष्ट्र के रूप में किसी संकल्पना को मूर्त रूप प्रदान किया जाए तो विदेशी आक्रांता के धरती पर कदम रखते ही उसको कुचल देने के अतिरिक्त और कोई शास्त्र नहीं हो सकता, इस बात को समझने की आवश्यकता है।
हमें युद्ध नहीं करना चाहिए किंतु जो हमसे युद्ध की आकांक्षा करता है हम उसको युद्ध करने के लायक भी नहीं छोड़ेंगे। यह सैन्य नीति का प्रारंभिक शिक्षण होता है। दुर्भाग्य से क्षत्रिय शासक युद्ध के क्षेत्र को क्रीड़ा का क्षेत्र समझते रहे। अपनी वीरता, अपनी सामर्थ्य तथा माता जैसी भूमि के प्रति अपने अटूट समर्थन के बावजूद उन्होंने यह विचार नहीं किया कि युद्ध का एकमात्र मापदंड और परिणाम विजय ही होता है। इसके अतिरिक्त और कुछ नहीं हो सकता। यदि हम इस भाव को अपने हृदय में स्थापित नहीं करेंगे तो सब कुछ नष्ट हो जाएगा।
यह मूल संदर्भ मुस्लिम आक्रांताओं के द्वारा भारतीय भूमि को निरंतर पद दलित किए जाने के बावजूद क्षत्रिय हिंदू शासकों के मन में नहीं बैठ पाया। उन्होंने इस पर विचार नहीं किया। आज हम जिनको अपने युद्ध कौशल से परास्त करके उनके क्षमा मांगने पर उनको छोड़ देते हैं। मौका मिलने पर वह हमें समूल नष्ट कर देंगे, खड़े होने का दूसरा अवसर प्रदान नहीं करेंगे।
दुर्भाग्य से क्षत्रीय शासक इस मूल तत्व को समझ नहीं पाए। अपनी वीरता अपनी सामर्थ्य तथा असंदिग्ध भाव से अपने शौर्य के आश्रय से सुप्रसिद्ध सम्राट पृथ्वीराज चौहान भी इस तथ्य को नहीं समझ पाए। अनेकों बार उन्होंने गोरी को क्षमा करके बिना कोई घातक या गंभीर हानि पहुंचाए प्रत्यावर्ती होने दिया यानी कि वापस जाने दिया। जबकि वह कहता था मुझे अवसर मिला तो मैं तुम्हें अवसर नहीं दूंगा।
वर्तमान की नजाकत, देश की सीमाओं पर तथा उनके परे घटित हो रही राजनीतिक- सैन्य गतिविधियों और उतार-चढ़ाव के प्रति ज्ञान के उपेक्षा भाव तथा परिस्थितियों के प्रति निरपेक्ष रहते हुए मात्र अपने शौर्य के प्रदर्शन पर ध्यान केंद्रित करना इन सभी क्षत्रिय शासकों को बहुत भारी पड़ा। परिणाम यह हुआ राष्ट्र निरंतरता में पतन के गर्त में समाता चला गया और मुस्लिम आक्रांताओं की जड़े जमती गई।
सभी को यह समझने की आवश्यकता है। खेल की भावना का परिचय खेल के मैदान में दिया जाता है जहां पर आपको पुनः प्रदर्शन करने का अवसर प्राप्त हो सकता है। किंतु युद्ध के मैदान में आपके द्वारा प्राप्त की गई विजय ही एकमात्र पारितोषिक है आपको प्रसन्न करने के लिए, आपके राष्ट्र को गौरवान्वित होने के लिए विजय के अतिरिक्त दूसरा कोई विकल्प नहीं है।

राष्ट्र को यह समझना होगा। जब विजय होगी तब धर्म सुरक्षित होगा, समाज सुरक्षित होगा, नैतिकता सुरक्षित होगी, हम और आप सभी सुरक्षित होंगे। चित् में यह बात आई तो मैंने आपके साथ इस को बांटने का निर्णय किया। यह विचार तो बहुतों के चित् में उत्पन्न होते होंगे किंतु कभी-कभी उनकी अभिव्यक्ति भी आवश्यक है।
ll सर्वे भवंतु सुखिनः ll
ll जय श्री कृष्ण ll
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