
आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज
हम सभी, सभी का तात्पर्य प्रत्येक धर्म, पंथ, किसी विशिष्ट धार्मिक विश्वास से युक्त समुदाय धर्म की बहुत बात करते हैं, इतनी ज्यादा कि ऐसा लगता है हम से अधिक धार्मिक तो कोई हो ही नहीं सकता। किंतु क्या वास्तव में यह सही है ? वास्तव में आज के वातावरण में कुछ लिखना पढ़ना थोड़ा संकट से युक्त हो गया है। पता नहीं कब किसको क्या बुरा लग जाए।
क्योंकि आस्था का प्रश्न है।
आप देखिए धर्म का हर संदर्भ में हवाला देते हुए हम बड़ी कुटिलता के साथ अपनी स्वार्थ पूर्ति के संदर्भों को कभी नहीं भूलते तथा धर्म के उन संदर्भों का पूरी चतुराई के साथ अपने हित में प्रयोग करने का पूर्ण प्रयास करते हैं। अर्थात धर्म आज के परिप्रेक्ष्य में मात्र सुविधा भोगी होकर के रह गया है।
हमारी शास्त्रीय परंपरा कहती है कि जब हम वेदांत का प्रयोग समाज के हित के लिए करते हैं, तब उसे देव वेदांत कहा जाता है तथा जब उसका अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए प्रयोग करते हैं तब उसे आसुर वेदांत कहा जाता है।
किसी धर्म में बहुत सारे संप्रदाय हैं, किसी में बहुत सारे फिरके हैं। किसी में बहुत सारे सेक्ट हैं और उनकी भी बहुत सारी शाखाएं – प्रशाखाएं हैं।
उनसे जुड़े हुए लोग भेड़ों की तरह अपने अपने गुरु की बात को आत्यंतिक सत्य के रूप में स्वीकार करके सत्य के तुलनात्मक अध्ययन एवं मूल सत्य के आविष्कार की प्रक्रिया से स्वयं को पृथक कर लेते हैं तथा जड़ के समान हो जाते हैं। सभी संदर्भ में अधिकांशतः आधुनिक गुरु वर्ग में एक बात प्रायः परिलक्षित होती है।
वह यह कहते हैं कि हम जो कह रहे हैं वहीं अंतिम सत्य है, इसके अतिरिक्त और कुछ भी नहीं है। अगर तुम यह बात ना मान करके अपनी बौद्धिक चेतना का प्रयोग करते हुए किसी अन्य सत्य का अनुसंधान करते हो, तो तुम गुरु द्रोह करते हो।
अद्भुत बात है!
इसी कारण आज हम सनातन धर्म में भयंकर खेमे बंदी देख रहे हैं।
विभिन्न मतों को किनारे रखकर के यदि सनातनी हिंदुओं को आवाज दी जाए कि एकत्र हो जाओ धर्म की रक्षा के लिए, मानवता की रक्षा के लिए, समाज की कुरीतियों को नष्ट करने के लिए, स्त्री के सम्मान की रक्षा के लिए, शोषित के सम्मान की रक्षा के लिए तो आप यह निश्चित जानो बहुत थोड़े से लोग ही खड़े होंगे। क्योंकि सभी अपनी-अपनी बाड़बंदी में फंसे हुए हैं तथा उनके गुरु जी अपने निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिए स्वतंत्र चिंतन को अनुमति प्रदान नहीं करेंगे, जबकि सनातन धर्म यह उद्घोष करता है कि
ll एकं सद् विप्रा बहुधा वदंति l
अर्थात एक ही सत्य है जिसे ज्ञानी जन अनेक प्रकार से समझाने और बताने का प्रयास करते हैं।
तात्पर्य यह है कि इस संदर्भ में असंख्य मत हैं, किंतु विवेक का आश्रय लेते हुए सत्य पर ही ध्यान संकेंद्रित करना चाहिए। सत्य के स्वरूप के विषय में अनेकों मत हो सकते हैं किंतु मत के आग्रह में पड़ कर सत्य के अनुसंधान का शुभ संकल्प एवं प्रक्रिया दूषित एवं बाधित नहीं होने चाहिए।
जिस प्रकार से किसी मंत्र को संपुटित करके सिद्ध किया जाता है उसी प्रकार से श्रीमद् भागवत भी सत्य से संपुटित है। श्रीमद्भागवत के प्रारंभ में भी सत्य का उद्घोष है तथा विश्राम में भी सत्य का ही उद्घोष है।
एक बात और भी है।
हमारे शास्त्र यह भी कहते हैं अज्ञान के अंधकार को जो ज्ञान रूपी अंजन को शलाका से लगाकर नेत्रों के या यूं कहें कि आत्मा नेत्रों के अंधकार को दूर कर देता है, वही गुरु है।
गुरु पथ का प्रदर्शन करता है।
अपनी आध्यात्मिक यात्रा शिष्य को स्वयं ही पूर्ण करनी होगी, किंतु वह पथ से ना भटके इस उद्देश्य से गुरु उसके के साथ सदैव रहेगा। यह भी संभव है कि शिष्य को इतना ज्ञान प्राप्त हो जाए कि उसके ज्ञान से गुरु को भी गौरव की अनुभूति हो।
शंकराचार्य के संदर्भ में कहते हैं कि वृक्ष के नीचे युवा गुरु बैठा है। चारों तरफ अत्यंत वृद्ध शिष्य बैठे हैं, नेत्र बंद हैं, शिष्यों को आत्मानुभूति प्राप्त हो गई।
जो ज्ञान की गुरुता से युक्त है, उसकी वय के विषय में चर्चा और चिंता नहीं करनी चाहिए। शरीर की वय तो समय के साथ बढ़ती है। यह एक जैविक प्रक्रिया है, किंतु ज्ञान वृद्ध होना एक अलग संदर्भ है, जिसका सम्मान किया जाना चाहिए।
श्रीमद्भागवत में छोटे से बालक श्रीकृष्ण की सलाह को मानकर वृद्ध गोप जनों ने इंद्र की पूजा का निषेध कर गोवर्धन पूजन का संकल्प लिया।
स्वतंत्र चिंतन की हमारी वैदिक परंपरा का प्रयास पूर्वक विस्तार किया जाना चाहिए। किसी भी प्रकार की कट्टरता वैमनस्य को जन्म देती है।
हम अपने इष्ट का सम्मान करें किंतु मात्र वही सम्मान का पात्र है अन्य नहीं, यह भाव स्वयं में ही दूषित और असामाजिक है तथा नाना प्रकार की समस्याओं को जन्म देता है।
पृथ्वीराज चौहान के पतन के बाद प्रारंभ हुए आक्रांता मुस्लिम राज्यों की दीर्घकाल पर्यंत निरंतरता होने के बावजूद भारतीय वैदिक वांग्मय सुरक्षित रहा, क्योंकि वैदिक परंपरा में विश्वास रखने वाले लोगों ने अपने ज्ञान को अपनी परंपरा के माध्यम से बाद में आने वाले लोगों को भी निरंतरता में प्रदान किया, जिन्होंने उसे एक निधि के रूप में न केवल सुरक्षित रखा अपितु समय आने पर उस को प्रकट भी किया।
यह इसलिए संभव हुआ क्योंकि आचरण का, चरित्र का, विद्या के निदिद्यासन का अभ्यास कठोरता से पालन किया गया। आज की भी यही आवश्यकता है।
आज हम पत्ते पर पानी डाल कर के उसको चिकना कर रहे हैं,
जबकि आवश्यकता जड़ में पानी डालने की है। वह पानी धर्म का आचरण है, मानवता की रक्षा है, स्त्रियों की सुरक्षा है तथा शोषित के नेत्रों से अश्रु धारा का बहना रोक देने का संकल्प है। तभी हम जड़ को बचा पाएंगे धर्म की रक्षा कर पाएंगे।
ll सर्वे भवंतु सुखिनः ll
ll शुभम भवतु कल्याणम ll
ll जय श्री कृष्ण ll
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