
तीन साल से जेल में बंद 954 करोड़ के घोटाले के आरोपी यादव सिंह को सुप्रीम कोर्ट से जमानत मिली।हालाँक सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि यादव सिंह जमानत पर छूट जाते हैं, तो सबूत गवाहों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। पीठ ने कहा कि ऐसा होने पर अभियोजन जमानत रद्द करने का आवेदन कर सकता है। यादव सिंह की तरफ से वरिष्ट वकील मुकुल रोहतगी ने पीठ इए समक्ष दलील दी।
विधि विशेषज्ञ जेपी सिंह की कलम से
नोएडा अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह को उच्चतम न्यायालय से जमानत मिल गई है।. मंगलवार को तीन सदस्यीय पीठ ने यादव सिंह की जमानत याचिका मंजूर कर ली।

करोड़ों के घोटाले का आरोपी यादव सिंह पिछले तीन साल से जेल में बंद थे। उनपर 954.38 करोड़ रुपए के एग्रीमेंट बांड को गलत तरीके से जारी करने का आरोप है। पीठ ने यादव सिंह को जमानत देते हुए ट्रायल कोर्ट को जमानत की शर्त निर्धारित करने के लिए कहा। हालांकि, सीबीआई ने यादव सिंह की जमानत याचिका का विरोध किया।

जस्टिस रोहिंटन फली नरीमन, जस्टिस केएम जोसेफ और जस्टिस वी रामसुब्रमण्यम की अध्यक्षता वाली उच्चतम न्यायालय की तीन जजों की पीठ ने कहा कि पक्षकारों की दलील सुनने के बाद, हम याचिकाकर्ता (यादव सिंह) को जमानत पर रिहा करना उचित समझते हैं,इसके लिए ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की गयी नियम और शर्तें लागु होंगी । हालाँक सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने यह आशंका व्यक्त की कि यदि यादव सिंह जमानत पर छूट जाते हैं, तो सबूत गवाहों के साथ छेड़छाड़ की जा सकती है। पीठ ने कहा कि ऐसा होने पर अभियोजन जमानत रद्द करने का आवेदन कर सकता है। यादव सिंह की तरफ से वरिष्ट वकील मुकुल रोहतगी ने पीठ इए समक्ष दलील दी।
उच्चतम न्यायालय का उक्त निर्णय इलाहाबाद उच्च न्यायालयके न्यायमूर्ति रमेश सिंह द्वारा पारित आदेश के खिलाफ यादव सिंह द्वारा अपील पर आया, जिसने यादव सिंह द्वारा दायर जमानत याचिका को यह कहते हुए खारिज कर दिया था, कि यादव सिंह ने पद का दुरुपयोग करते हुए 954.38 करोड़ रुपये के एग्रीमेंट बांड जारी किए जो 1280 प्रोजेक्ट के लिए थे। सिंह ने अप्रैल 2004 से चार अगस्त, 2015 के बीच आय से अधिक 23.15 करोड़ रुपये जमा किए, जो उनकी आय के स्रोत से लगभग 512 प्रतिशत अधिक है।यह सार्वजनिक धन का दुरूपयोग है।यही नहीं सीबीआई का कहना है कि यादव सिंह द्वारा हस्ताक्षर किए गए विभिन्न अन्य अनुबंध अभी भी सीबीआई जांच के अधीन हैं, मुझे उसे जमानत देने के लिए कोई अच्छा आधार नहीं मिला।
गौरतलब है किइलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ ने डॉ नूतन ठाकुर बनाम स्टेट ऑफ यू.पी. में अपने 16जुलाई2015 को तत्कालीन मुख्य अभियंता, नोएडा प्राधिकरण के आवेदक यादव सिंह के विरुद्ध सीबीआई को जांच करने के निर्देश दिए थे । इससे पहले, यादव सिंह और अन्य के खिलाफ क्राइम नंबर 371/2012 के तहत धारा 120बीआईपीसी सपठित 409, 420, 466, 467, 469, 471 आईपीसी और धारा 13 (1) (डी) सपठित 13 (2) भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत 13जनवरी 2012 को पुलिस स्टेशन सेक्टर 39, नोएडा, गौतम बुद्ध नगर, उत्तरप्रदेश में दर्ज़ की गयी थी।इसमेंआरोप था कि 14दिसम्बर 2011 से 23दिसम्बर 2011 के 954.38 करोड़ का के एग्रीमेंट बांड जारी करके उनका क्रियान्वयन किया गया। मामले की जांच पूरी करके राज्य पुलिस ने क्लोजर रिपोर्ट दाखिल की जिसे 27नवम्बर 2014 को गौतमबुद्धनगर के जिला एवं सत्र न्यायाधीश ने स्वीकार कर लिया। तत्पश्चात 16जुलाई 2015 को इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने सीबीआई जाँचका आदेश दिया। इस आदेश के अनुपालन में सीबीआई ने धारा 120 बी आईपीसी सपठित धारा 409, 420, 466, 467, 469, 471 आईपीसी और धारा 13 (1) (डी) सपठित13 (1) (डी)सपठित 13 (2) भ्रष्टाचार अधिनियम, 1988 के तहत के यादव सिंह अन्य अज्ञात व्यक्तियों के खिलाफ एक नियमित मामला दर्ज किया गया।मामले की जांच पुलिस अधीक्षक, सीबीआई, एसटीएफ, दिल्ली के आदेश से 30जुलाई2015 को राजेश कुमार, उप-अधीक्षक, सीबीआई, एसटीएफ, दिल्ली को सौंपी गई थी।
सीबीआई का आरोप है कि 14 दिसंबर 2011 से 23 दिसंबर 2011 तक नोएडा अथॉरिटी के विभिन्न इंजीनियरिंग डिपार्टमेंट यादव सिंह के कंट्रोल में थे। वह नोएडा अथॉरिटी के चीफ इंजीनियर थे और उन्होंने अपने पद का दुरुपयोग करते हुए 954.38 करोड़ रुपये के एग्रीमेंट बांड जारी किए जो 1280 प्रोजेक्ट के लिए थे।सीबीआई के आरोप-पत्र में कहा गया है कि सिंह ने अप्रैल 2004 से चार अगस्त, 2015 के बीच आय से अधिक 23.15 करोड़ रुपये जमा किए, जो उनकी आय के स्रोत से लगभग 512 प्रतिशत अधिक है।
इसके पूर्व प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) ने नोयडा अथॉरिटी के पूर्व चीफ इंजीनियर यादव सिंह और उसके परिवार की 89 लाख रुपये की कीमत की प्रॉपर्टी कुर्क (अटैच) की थी। अटैच प्रॉपर्टी में रिहायशी घर, एक कामर्शियल प्रॉपर्टी और कुछ खेती की जमीन शामिल है।प्रवर्तन निदेशालय और सीबीआई यादव सिंह और उसके परिवार के खिलाफ पहले ही चार्जशीट दायर कर चुकी है।वहीं अब धनशोधन रोकथाम कानून (पीएमएलए) के अंतर्गत ईडी ने नोएडा के पूर्व मुख्य अभियंता यादव सिंह की 25.8 करोड़ रुपये की संपत्ति जब्त की थी। इसके साथ ही ईडी ने विशेष अदालत में धनशोधन के एक मामले में यादव सिंह के खिलाफ आरोपत्र दायर किया था। प्रवर्तन निदेशालय ने एक बयान में कहा था कि आय से अधिक संपत्ति का मामला दर्ज होने के बाद धनशोधन के मामले में उसने सिंह के खिलाफ आरोपपत्र दायर किया है।जांच के दौरान पता चला कि यादव सिंह की पत्नी कुसुमलता ने कथित तौर पर पीजीपी नाम का ट्रस्ट बनाया, जिससे कि अपराध की कार्यवाही को बेदाग रखा जा सके।
यूपी में मायावती की सरकार थी, तब यादव सिंह नोएडा अथॉरिटी का चीफ इंजीनियर था। उस दौरान जमकर पैसा कमाया। इसके बाद वर्ष 2012 में अखिलेश यादव की नई सरकार आई और उस पर शिकंजा कसने का नाटक हुआ। सीबीसीआईडी जांच भी हुई, लेकिन फटाफट क्लीनचिट मिल गई। इसके साथ ही तोहफे में नोएडा के अलावा ग्रेटर नोएडा अथॉरिटी और यमुना एक्सप्रेसवे अथॉरिटी की चीफ इंजीनियरी भी मिल गई। हजार करोड़ रुपये की दौलत के मालिक यादव सिंह पैसा कमाने की वह सरकारी मशीन बन गए, जिसे सजा देना तो दूर, हाशिए पर डालने की कोशिश भी कोई सरकार नहीं कर सकी।
सत्ता को अपनी उंगलियों पर नचाने का गुमान रखने वाले यादव सिंह का जन्म आगरा के गरीब दलित परिवार में हुआ था। इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में डिप्लोमाधारी यादव सिंह ने 1980 में जूनियर इंजीनियर के तौर पर नोएडा अथॉरिटी में नौकरी शुरू की। 1995 में प्रदेश में पहली बार जब मायावती सरकार आई तो 1995 में 19 इंजीनियरों के प्रमोशन को दरकिनार कर सहायक प्रोजेक्ट इंजीनियर के पद पर तैनात यादव सिंह को प्रोजेक्ट इंजीनियर के पद पर प्रमोशन दे दिया गया। इसके साथ ही उन्हें डिग्री हासिल करने के लिए तीन साल का समय भी दिया गया।इसके बाद 2002 में यादव सिंह को नोएडा में चीफ मेंटिनेंस इंजीनियर (सीएमई) के पद पर तैनाती मिल गई। नौ साल तक वे सीएमई के पद पर ही तैनात रहा। यह इस प्राधिकरण में इंजीनियरिंग विभाग का सबसे बड़ा पद था। इस वक्त तक अथॉरिटी में सीएमई के तीन पद थे। यादव सिंह ने कई पद खत्म कराकर अपने लिए इंजीनियरिंग इन चीफ का पद बनवाया।
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