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“लखीमपुर-खीरी प्रकरण: किसका विरोध कितने पानी में है और कौन महज दिखावा करके जनता का हमदर्द बन रहा है”: रतिभान त्रिपाठी

वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी

राजनीति में दिखावे जब तक चलते रहेंगे, मासूम जनता छली जाती रहेगी। उसकी आवाज न तो सुनी जाएगी, न ही मानी जाएगी। सत्ताएं तो अपने अंदाज में काम करती हैं, चाहे मौजूदा दौर की हों या दस बीस पचास साल पहले की। इसीलिए तो जब गलतियां करती हैं, जनता बड़ी खामोशी से उन्हें बाहर कर देती है। वह तो विपक्ष है जो जनता की आवाज बनता है, आवाज़ बुलंद करता है और जरूरत पड़ने पर ईंट से ईंट बजाता है।

लेकिन अब के विपक्ष की हालत तो शायद अंग्रेजों के जमाने के जैसे विपक्ष और कुछ नेताओं जैसी हो गई है जिनके लिए अकबर इलाहाबादी ने शेर लिखा था- “क़ौम के ग़म में डिनर खाते हैं हुक्काम के साथ। रंज़ लीडर को बहुत है मगर आराम के साथ।।” करीब 90 बरस पहले लिखा गया यह शेर तब एक बार फिर मौजूं हो उठा है जब उत्तर प्रदेश के लखीमपुर-खीरी जिले में किसान गाड़ी तले कुचल दिए गए। फिर घटना को लेकर सत्तासीनों का विरोध करने वाले कुछ दलों ने एक खास किस्म का रवैया अपनाया।

किसी भी दौर में सत्तासीनों की मनमानी इसीलिए कम होने का नाम नहीं लेती क्योंकि उनके विरोधी अपनी सुविधा से आंदोलन चलाते हैं, विरोध भी लिजलिजे अंदाज में करते हैं। सत्तातंत्र से मिलीभगत का खेल रचकर ये राजनीतिक लोग अपने मकसद में भले ही कामयाब हो जाते हैं लेकिन सच तो यह है कि अपने रवैए के जरिए जनता से छल ही करते हैं। सत्ताएं अपना काम करती रहती हैं और उनके विरोधी सुविधानुसार विरोध का दिखावा करते रहते हैं।

लखीमपुर-खीरी में हाल में ही जो हुआ, वह दुर्भाग्यपूर्ण है। सत्ताधारी अपनी पाकीज़गी की सफाई पेश करें और विरोधी दल व अन्य संगठन उनके खिलाफ झंडाबरदारी करते फिरें लेकिन इस धींगामुश्ती में जिन किसानों, राजनीतिक कार्यकर्ताओं और मीडियाकर्मी की जान चली गई, उनके परिवार पर तो विपत्ति का पहाड़ टूट ही पड़ा। कोई मुआवजा, कोई सरकारी नौकरी उस जान की कीमत या बराबरी नहीं कर सकती है। हां, इसके बाद जो राजनीतिक कसरत शुरू हुई है, वह जरूर कुछ लोगों को फायदा पहुंचाएगी तो कुछेक का नुक़सान भी करेगी। व्यक्ति, परिवार या समाज को किसी भी रूप में दुख देने, दुख पहुंचाने वाला कृत्य अंजाम देने वालों और उसके फलस्वरूप अपना फायदा देखने वालों को किसी न किसी तरह से नुकसान जरूर पहुंचाता है, चाहे वह फौरन पहुंचाए या फिर कुछ समय बाद। लखीमपुर-खीरी मामला भी यही करने वाला है। इस पूरे मामले को लेकर हमदर्द बनने वाले चाहे राजनीतिक दल हों या किसानों का हितैषी बताने वाले संगठन, ये सब हमदर्दी के दिखावे के मार्फत सिर्फ और सिर्फ अपना फायदा तलाशने आए हैं। लेकिन राजनीति का यह प्रपंच बरसों से भोली-भाली क़ौम को ऐसे ही छलता रहा है और इस छलावे का सिलसिला जारी है।

यह कौन नहीं जानता है कि उत्तर प्रदेश में राजनीतिक नफा-नुकसान देख रहे दलों के लिए विरोध या समर्थन सब आगे होने वाले चुनाव से जुड़ा हुआ है। जो लोग सत्ता में पहुंचने को बेताब हैं, वह घटनाक्रम के विरोध में खड़े दिखना चाहते हैं और जो सत्ता में हैं, वह उसे बचाए रखने की जुगत में लगे हैं। जो लोग घटना में मारे गए लोगों को दूर दूर तक नहीं जानते, वह उनके घर पहुंचकर दुख जताने का नाटक इसलिए कर रहे हैं कि उन्हें इसके मार्फत अपना फायदा दिख रहा है। दरअसल वह पीड़ित परिवारों के घर जाना नहीं चाहते थे, जाने की कोशिश का दिखावा कर रहे थे। इसलिए कि मीडिया के जरिए उनका अपना प्रचार हो जाए। जाने की इच्छा होती तो चोरी छिपे ही सही, किसी न किसी रूप में पहुंच ही जाते, लेकिन ऐसे पहुंचने से उनका फायदा नहीं होगा। फायदा तो दिखावा करने से होना है।

इस राजनीतिक हमदर्दी का अगर बारीक विश्लेषण करें तो साफ हो जाता है कि कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, प्रगतिशील समाजवादी पार्टी, सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी या अन्य राजनीतिक किरदार बेनकाब होते साफ दिख रहे हैं। समाज में किसी भी तरह के अन्याय, अनर्थ या अत्याचार का विरोध राजनीतिक और सामाजिक संगठनों को करना ही चाहिए, भले ही वह सत्ता तंत्र की ओर से किया गया हो या किसी व्यक्ति या समूह की ओर से। इस लिहाज से लखीमपुर-खीरी कांड का विरोध लाज़िम है। लेकिन यह महज दिखावे भर के लिए हो, यह उचित कैसे माना जा सकता है। पिछले 30-32 सालों में उत्तर प्रदेश में कांग्रेस की राजनीतिक ताकत लगातार कम होती गई है फिर भी उस पार्टी की नेता प्रियंका गांधी वाड्रा ने जिस तरीके से विरोध जताया, वह उनकी पार्टी की कमजोरी के बावजूद सरकार विरोधियों में सबसे आगे की पांत में खड़ा कर गया।

अन्य दो सरकार विरोधियों समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी ने जिस तरह से विरोध प्रदर्शन किया वह तो हास्यास्पद ही कहा जाएगा। समाजवादी पार्टी के मुखिया और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव आगामी चुनाव में 400 सीटें जीतने का दावा करते हैं। वह सत्ता में पहुंचने को तो बेताब हैं लेकिन इतने गंभीर प्रकरण पर विरोध के नाम पर वह घर से बस चंद कदम ही चले। बाद में पहुंचना और सहानुभूति जताना दीगर बात हो गई।

तो क्या इस तरह के विरोध को यह नहीं मान लिया जाना चाहिए कि वह सिस्टम से मिले हुए हैं या फिर उससे डरे हुए हैं। वह अपनी पार्टी को मुख्य विपक्षी तो बता जता रहे हैं लेकिन उत्तर प्रदेश या देश के लोगों को उनकी ताकत या तेवर दिखाई नहीं पड़ा। इससे तो यह भी कहा जा सकता है कि अखिलेश यादव सरकार की खामियों के रास्ते सत्ता में पहुंचने की जुगत में हैं, अपने संघर्ष के मार्फत नहीं, जिसके लिए उनके पिता मुलायम सिंह यादव जाने जाते हैं। राजनीतिक प्रेक्षक यह मान रहे हैं कि लखीमपुर-खीरी कांड ही नहीं, कई और मौकों पर भी सरकार की कथित ग़लत नीतियों अथवा किसी घटना को लेकर विरोध करने में अखिलेश यादव प्रियंका गांधी वाड्रा से बहुत पीछे दिखे हैं। पिछले साढ़े चार सालों का रिकॉर्ड तो कम से कम यही बताता है।

अब नजर डालते हैं बहुजन समाज पार्टी के सरकार विरोधी अंदाज पर। ऐसे किसी भी मौके पर जहां किसी विषय पर विरोध की जरूरत महसूस की गई तो बहुजन समाज पार्टी की सुप्रीमो मायावती यानी बहनजी ने सिर्फ ट्विटर का सहारा ही लिया। पिछले चार साढ़े चार सालों से लगभग हर रोज़ वह दोपहर में ट्वीट करती हैं। उनका ट्वीट ई मेल के जरिए मीडिया तक पहुंचा दिया जाता है, जिसे पढ़कर यही महसूस होता है कि वह किसी बात का विरोध कम, घर के बड़े बुजुर्ग की तरह उपदेश दे रही हैं, सुझाव दें रही हैं। 4 अक्टूबर को जब लखीमपुर-खीरी कांड के विरोध की बाढ़ आई तो न तो बहनजी ने सड़क पर उतरने की जहमत उठाई और न ही उनके खासमखास कहे जाने वाले पार्टी महासचिव सतीश चन्द्र मिश्र ने। बल्कि सतीश चन्द्र मिश्र ने अपनी ओर से एक बयान जारी करके अपनी असमर्थता सार्वजनिक की कि उन्हें घर में नज़रबंद कर दिया गया है। यानी वह सड़क पर उतरकर विरोध कर पाने में समर्थ नहीं हैं। यह वही मिश्र जी हैं जो सोशल इंजीनियरिंग का फार्मूला लिये पूरे उत्तर प्रदेश में घूम रहे हैं और सरकार बनाने के सपने देख रहे हैं। विरोध करने का विरोधियों का अंदाज यह बयान करने के लिए कम नहीं है कि वह अपनी सहूलियत देखकर ही विरोध करने के पक्षधर हैं। ऐसे में जनता खुद फैसला लेने में सक्षम है कि किसका विरोध कितने पानी में है। कौन विरोध कर रहा है और कौन महज दिखावा करके जनता का हमदर्द बन रहा है। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)

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