
बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू
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लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त
अनुवादिका
श्रीमती सुदेवी गौड़
एम.ए., साहित्य रत्न साहित्यालंकार
सन 1963 में प्रकाशित
—– गतांक से आगे–
बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है l जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहाl
इतने वर्ष पूर्व प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया थाl
घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहेगा l उसी संदर्भ में आज पंचदश अध्याय प्रस्तुत हैl
पंचदश अध्याय
हवाई जहाज का आक्रमण
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पन्द्रह दिन बाद |
पता चला कि जमील के दल में कुल साठ आदमी बचे हैं। तुर्को की गाड़ी का नाश करने से जो दुर्घटना घटी उससे उन्हें हानि की अपेक्षा लाभ ही अधिक हुआ। इस विजय में अरबों को काफी रुपये एवं खाद्य सामग्री, रसद आदि मिली।
डिक समझ रहा था कि यह सामयिक विजय लाभदायक होते हुए भी पता नहीं इसका परिणाम क्या होगा l रणविजय के उत्साह, उद्दीपन से बद्दुओं को जैसा आनन्द मिला और उत्साह हुआ वैसे ही शरीर इतना क्लांत हो गया था कि उन्हें कुछ दिनों के विश्राम की जरूरत थी l चुपचाप बेकार बैठने से शरीर और मन को विश्राम मिलते हुए भी एक प्रकार का अवसाद छाया हुआ था। घुड़दौड़ के घोड़े को बन्दी बना देने से जैसे उसके अङ्ग-प्रत्यङ्ग शिथिल हो जाते हैं, ऐसे ही लड़ाके सिपाही भी शान्त होकर नहीं बैठना चाहते । दीर्घं विश्राम से उनका शरीर और मन शिथिल हो जाता है। जमील के दल के लोगों की भी कुछ ऐसी ही दशा हो गई थी।
डिक सोच रहा था कि अब किस प्रकार और किस ओर बढ़ना चाहिए। मरुभूमि के निर्जन प्रान्त में भी यह संवाद आ पहुँचा था कि इस समय मरुभूमि के उत्तर के निवासियों के साथ तुर्को का युद्ध चल रहा है। अकाबा नाम का अरब के उत्तर प्रान्त में स्थित, सामुद्रिक बन्दरगाह अभी शत्रुओं के कब्जे में था। एक दिन संध्या को जमील, डिक एवं दल के और एक-दो विश्वस्त आदमियों में सलाह-मशविरा चल रहा था । जहाँ ये लोग बात कर रहे थे वहीं एक ओर एक झरना कल-कल करता हुआ ऊपर की ओर बह रहा था । इसीलिए इसके चारों ओर का पहाड़ विशेष गरम नहीं था । जमील और डिक काफी पीते हुए बातें कर रहे थे। जमील बोला—- तुर्को के प्रधान सेनापति फखरी पाशा के सम्बन्ध में अनेक आश्चर्यजनक बातें सुनी जाती हैं।
डिक बोला—सुनी हुई बातें मानकर हर समय मत चलो जमील। मैं अपनी ही बात कहता हूं। दूसरी बार गाड़ी लूटने की विशेष इच्छा नहीं थी पर बाध्य होकर वैसा करना पड़ा। जय लाभ करेंगे ही, यह भी निश्चित नहीं था। तब भी हम कह सकते हैं कि हमारे पास खाने-पीने की चीजों की कमी नहीं है। बहुत रुपये मिले हैं। यह सोचकर बैठे रहने से तो काम चलेगा नहीं। आखिर सभी चीजों का अन्त तो होता ही है। और यह भुलावा भी बेकार है कि हमारी लूट का हाल तुर्कों को नहीं मालूम हुआ है। अब हमारे लिए यही उचित होगा कि हम जल्दी से जल्दी अरबों की प्रधान सेना से जा मिलें । हम यदि एलक्रिम पहुँच सकें तो अधिक कार्य कर सकेंगे और जाते समय रास्ते में यदि मरुभूमि के अन्य निवासियों को अपने दल में मिला सकें तो विजय की संभावना अधिक बढ़ जायेगी।
जमील बोला- मेरे ख्याल से हमारे दल के लोग इस लूट के सामान को फेंक कर जाने को तैयार न होंगे। यह बड़ी मुसीबत है ।
डिक हँसकर बोला- रुपये-पैसे के लिए चिन्ता करने की जरूरत नहीं है। मेरे पास बहुत धन है। मैं मरुभूमि की एक अज्ञात जगह उसे छिपा आया हूं । यदि युद्ध में विजयी हो गये तो वह सारा धन तुम लोगों को बाँट दूँगा। मुझे उसकी आवश्यकता नहीं है।
जमील को जैसे एक विपत्ति से छुटकारा मिल गया है, उसने इस प्रकार आनन्द जाहिर किया ।
डिक कहने लगा- मैं जानता है, तुम्हारे दल के लोग तुम्हारा जितना विश्वास करते हैं उतनी ही इज्जत करते हैं l तुम्हारा हुक्म वे कभी नहीं टालेंगे। तुम आदेश दो, उन्हें समझाकर कहो कि कल हम उत्तर की ओर रवाना होंगे। मेरा विचार है कि हमारी इस यात्रा के साथ ही हमारे दल की भी वृद्धि होगी। बहुत लोग आकर हमारे दल में मिलेंगे। हम सौ से अधिक आदमी नहीं चाहते। हमारे लिए सौ आदमी काफी हैं।
जमील हँसकर बोला- यही होगा; किन्तु सर्दार, एक बात का ध्यान रखना कि दल के अन्दर कहीं गीदड़ न आ जायें
डिक बोला क्या तुम जासूस के विषय में कहना चाहते हो ?
जमील ने सिर हिलाया। डिक भी जरा चिन्तित हुआ जमील बोला— दुनिया में ऐसे बहुत से आदमी हैं जो दौलत के लिए मान-मर्यादा एवं देश को भी विसर्जन करने में आगा-पीछा नहीं करते
डिक बोला—- सौभाग्य की बात है कि हमारे दल में अभी एक भी ऐसा आदमी नहीं है। फिर भी क्या तुम कह सकते हो कि हमारे दल में एक भी जासूस नहीं है ?
जमील सिर हिलाकर बोला- मैं यह नहीं कह सकता। हमारे आदमियों ने सिंह की तरह युद्ध किया। अब विश्राम करके वे लड़ाई के लिए उतावले हो उठे हैं। देखता हूँ कि कल तक उत्तर की ओर यात्रा करने की व्यवस्था हो सकती है या नहीं।
अब जमील एकाएक उठकर खड़ा हो गया ।
उस रात वे लोग उस झरने की धारा के निकट ही रहे l ऊँटों ने गीली घास चरकर तृषा शान्त की। बद्दुओं ने अपनी बन्दूकों, बरछों और तलवारों की सफाई की और रात में काफी भोजन किया। चारों ओर अग्नि जला ली। संध्या को कई प्रहरी गर्म कपड़े ओढ़ कर सो गये l
पता नहीं क्यों, उस रात डिक् को नींद नहीं आ रही थी। उसकी आँखों के सामने भयानक चित्र दिखाई दे रहे थे। कभी तन्द्रावस्था में कोई दुःस्वप्न देखकर चौंक उठता था। एक बार जागकर उसने सुना कि किसी बड़े पक्षी के पंखों की आवाज आ रही है। कुछ क्षण बाद अजगर की फुफकार के समान भीषण फुफकार जैसा शब्द कानों में आने लगा l
डिक् उठकर बैठ गया l कहाँ से यह आवाज आ रही है, यह ध्यान से सुनने लगा । किन्तु जब वह शब्द निकट आने लगा तो उसे आश्चर्य हुआ। इसी समय जमीन पर कोई छाया दिखाई दी। देखते-देखते आकाश में एक ओर लाल रोशनी दिखाई देने लगी। उस प्रकाश से मरुभूमि के आकाश और पृथ्वी का अंधकार दूर हो गया ।
डिक् उठकर खड़ा हो गया। वह जमील और अन्य सबको सम्बोधन कर चिल्लाने
लगा l प्रहरियों ने भी वह देख लिया था। वे भी सबको जगाने के लिए चिल्लाने लगे। जो नींद में सो रहे थे वे जाग उठे। दोनों हाथों से आँखें मलते हुए उन्होंने अपनी अपनी बंदूकें और तलवारें उठा लीं। जमील शीघ्रता से वहाँ आकर बोला—- इतना गोल- माल क्यों है ? क्या हुआ सर्दार ?
डिक उसका हाथ पकड़कर बोला सुन रहे हो, किसका शब्द है? लाखों मधुमक्खियों के गुंजन जैसा शब्द चारों ओर सुनाई दे रहा है।
जमील डिक की बात सुनकर बोला- मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है।
डिक बोला— किसका शब्द है, नहीं समझ सके ? हवाई जहाज हमारे ऊपर आक्रमण करने के लिए आ रहे हैं। जरूर हमारे दल के किसी आदमी ने विश्वासघात किया है। तुकों ने हमारे ऊपर आक्रमण करने के लिए हवाई जहाज मेजे हैं। जहाज हमारे मस्तक के ऊपर उड़े आ रहे हैं। यह है फखरी पाशा का प्रतिशोध l हमने जैसे रसद की गाड़ी लूट ली थी उसी प्रकार फखरी पाशा ने हमारा नाश करने के लिए हवाई जहाज भेजे हैं।

शेष आगामी अंक में—–
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