
बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू
लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त
अनुवादिका
श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए.,
साहित्य रत्न, साहित्यालंकार
सन 1963 में प्रकाशित
–—- गतांक से आगे–
बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है l जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहा l
इतने वर्ष पूर्व वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया था l
घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहेगा l उसी संदर्भ में आज चतुर्थ अध्याय प्रस्तुत है l
चतुर्थ अध्याय
मृत्यु के ग्रास में
डिक प्रतिक्षण मृत्यु की आशंका कर रहा था। ऐसा लगता है कि अभी उसके हाथ के ऊपर तलवार का वार होगा। वह आँखें मूँद करके जीवन के इस चरम आघात की प्रतीक्षा कर रहा था, किंतु आघात नहीं लगा। उसने धीरे-धीरे आँखें खोलीं। उसने देखा, घातक हब्शी पाषाण के समान निश्चल खड़ा है। उसके हाथ की तलवार हाथ में ही है। यह क्यों हुआ ? डिक यह न समझ सका। मुहम्मद तक “अल्लाह” कहकर विस्मय से देखता ही रह गया । उस कक्ष में जो भी उपस्थित थे, सभी कुछ क्षण के लिए पाषाण मूर्ति की तरह चल हो गये। सहसा सब की दृष्टि दरवाजे पर पड़ी। सब ने विस्मय से देखा, एक दीर्घकाय व्यक्ति ने वहाँ प्रवेश किया।
उसे देखकर लगा कि यह अभी-अभी मरुभूमि के किसी स्थान से आया है।
उसके माथे पर गहरे रक्त वर्ण का साफा बँधा था, और एक लम्बा रेशम का कपड़ा छाती तक लटका हुआ था। उसकी कमर में लाल और हरे रंग की सुन्दर चमड़े की म्यान के अंदर एक छुरा था । मनुष्य लम्बा और इकहरे बदन का था। लम्बी दाढ़ी छाती तक लटक रही थी l आंखें अत्यंत तीक्ष्ण और उज्जवल थीं और ज्वालामुखी की चिंगारी के समान जल रही थीं। उसे देखते ही ऐसा लगता था, मानो उसका जन्म मनुष्यों के ऊपर हुक्म चलाने को ही हुआ है। मुहम्मद की ओर देखकर उसने गम्भीर भाव से कहा हम क्या तुर्क है जो अवध्य दूत का वध करेंगे ? क्या तुम नहीं जानते कि मुस्लिम शास्त्र में इससे बड़ा दूसरा पाप नहीं है।
मुहम्मद ने गरज कर कहा- तुम मेरे आदेश के विरुद्ध बाधा देनेवाले कौन ? क्या तुम नहीं जानते कि यह बन्दी हमारा शत्रु है ? शत्रु को क्षमा करना हमारा धर्म नहीं है ।
— तुम मेरी बात सुनो मुहम्मद ! तुम जो अच्छा समझो, कर सकते हो। यदि अच्छा लगे तो इसे छोड़ दो नहीं तो बन्दी कर लो, पर इस बंदी की तुम कोई क्षति मत करो। हमारे देश के कल्याण के लिए, हम लोगों का पक्ष लेकर ही तो ये लोग युद्ध कर रहे हैं।
मुहम्मद ने कहा- जमील, मैं तुम्हारी कोई बात नहीं सुनना चाहता। मैं इन बंदियों के ही समान तुम्हारे लिए भी दंड का निश्चय करूँगा ।
अब उसके मुँह फेर कर जोर से ताली बजाते ही दो भीषण आकृति के हब्शी प्रहरी वहाँ आकर उपस्थित हुए।
मुहम्मद ने जमील को दिखा कर दोनों प्रहरियों से कहा – ‘इसको बंदी करो । हाथ बाँध लो। प्रहरी असमंजस में पड़ गये। मुहम्मद ने क्रोध से काँपते काँपते कहा- मेरे हुक्म की तामील करो—में शरीफ हूं।
जमील की दोनों आँखें हीरे के समान चमकने लगीं। उसने अत्यंत शीघ्रता से अपने छुरा पर हाथ रक्खा। दूसरे ही क्षण अपने को सँभाल करके हाथ हटा लिया ।
मुहम्मद क्रोध से उत्तेजित होकर कहने लगा-तुम निर्जन मरुभूमि पर विचरण करते-करते अत्यन्त दुर्द्धर्ष हो गये हो जमील, समझ लो यह मरुभूमि नहीं है। यह शहर है। यहाँ खामख्याली नहीं चलती। विधि और निषेध को मान कर चलना पड़ता है।
इतने में दोनों हब्शी प्रहरियों ने जमील के दोनों हाथ बाँध लिये थे । अब उस कक्ष में उपस्थित लोगों ने आराम की साँस ली। फिर भी लोगों की आँखों और मुंह पर जो एक भय का भाव आ गया था वह स्पष्ट झलक रहा था । बड़ी सरल बात नहीं है। मरुभूमि के दुर्दान्त बद्दुओं का दलपति शेख है। उससे कौन भय नहीं करता ? यद्यपि कुछ समय के लिए वह यहाँ निस्सहाय अवस्था में पड़ कर अपमान सहन कर रहा है, कौन जानता है बाद में इसका क्या परिणाम होगा।
“सुन शेख” – मुहम्मद बन्दी जमील के अति निकट जाकर कहने लगा- “सुन शेख ! शहर के राजपथ का यह जन कोलाहल सुन। यह क्यों हो रहा है ? वे इतना क्यों चीख रहे हैं? आज हमने जिन दो गुप्तचरों को बंदी बनाया है उनका रक्त जब तक जनता के सामने न फेंक देंगे, वे शांत नहीं होंगे।
‘मैं जानता हूँ’ सबकी ओर सगौरव देखते हुए जमील ने कहा मैं जानता हूँ, लेकिन तुम समझ लो, बाहर मेरे दो सौ साहसी बद्दू इन्तजार कर रहे हैं। वे अपने सरदार का यह अपमान, यह लांछना चुपचाप सहन नहीं करेंगे। वे इसका दस गुना प्रतिशोध लेंगे। यह बात तुम्हें स्मरण कराये देता हैं।
मुहम्मद ने हा-हा-हा-हा करते हुए उच्च हास्यपूर्वक कहा- दो सौ बद्दू ! मरूभूमि के दस्यु वे हमारा क्या करेंगे इस दो हजार शिक्षित सेना के सामने ?
“एक शेर एक हजार सियारों से भयभीत नहीं होता ।”
“हाँ! हाँ! देखा जायेगा । यह देखा जायेगा ।”
मुहम्मद ने क्रोध से काँपते- काँपते जमील के गले में बँधा हुआ रूमाल खींच लिया। बद्दुओं के साथ ऐसा करना अत्यंत अपमानजनक माना जाता है। जमील की देह का रक्त खौलने लगा, किंतु उसने एक भी शब्द नहीं कहा। उसकी छाती साँस से फूल उठी l उसके शरीर के अन्दर अपमान की तीव्र ज्वाला जल उठी थी किंतु उसने न तो एक भी शब्द कहा और न जरा भी हिला । मुहम्मद की ओर केवल अपने आग्नेय नेत्रों से देखता रहा । उन आँखों के अन्दर थी पुंजीभूत अपमान की तीव्र ज्वाला ।
मुहम्मद ने गरज कर कहा – ‘प्रहरी ! इन बन्दियों को यहाँ से ले जाओ।’ इस समय मुहम्मद जमील के कारण इतना व्यग्र हो गया कि वह डिक् और कासिम को बिल्कुल ही भूल गया ।
अब कासिम और डिक की ओर नजर पड़ते ही प्रहरियों को लक्ष्य करके उसने कहा— जमीन के नीचे जो अन्धकारमय कारागृह है वहाँ इन्हें ले जाओ ।
दैत्य के समान भीषणाकार वह जल्लाद अब तक अपनी तलवार को डिक के हाथ पर लक्ष्य करके लिये खड़ा था। अब वह तलवार को ऊँची करके प्रहरियों के साथ बन्दियों सहित चलने लगा l
डिक् ने जाते समय मुड़ कर देखा कि मरुभूमि के उस बद्दू शेख की आँखों में जो विद्रूप जल रहा था वह जैसे मुहम्मद के मुँह पर पढ़कर उसे मलिन और विवर्ण कर गया ।

शेष आगामी अंक में—–
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