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अरब के बद्दू: लेखक योगेंद्र नाथ गुप्त : “छुटकारे के रास्ते पर”: अनुवादिका सुदेवी गौड़

बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू

लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त

 अनुवादिका 

श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए.,

साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

सन 1963 में प्रकाशित

—– गतांक से आगे–

बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है l जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहा l

इतने वर्ष पूर्व प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया था l

घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहेगा l उसी संदर्भ में आज षष्ठ अध्याय प्रस्तुत है l

षष्ठ अध्याय

 छुटकारे के रास्ते पर

निस्तब्ध रात्रि । गहन अन्धकार l कुछ भी दिखाई नहीं देता। बन्दीगण कारागृह के भीषणतम अन्धकार में एक दूसरे को देख नहीं पा रहे हैं। ऐसे समय बाहर गोली चलने की आवाज सुनाई दी।

डिक ने माथा घुमाकर एक बार चारों ओर देखा, शायद कुछ दिखाई दे जाय । जमील और कासिम छुटकारे की आशा में घुटनों के बल खिसकते-खिसकते दरवाजे के निकट आने लगे, इस आशा में कि अब उनके छुटकारे के लिए शायद कोई आ जाय, नहीं तो बाहर इस प्रकार का शब्द क्यों हुआ?

चारों ओर और कोई शब्द सुनाई नहीं दे रहा था। सब ओर नीरवता थी। जमील ने कहा, “यदि कोई हमारे छुटकारे के लिए न भी आये, तो भी कोई शंका नहीं है। हम स्वयं ही अपने छुटकारे की व्यवस्था करेंगे। और हम सबसे पहले कारागाह के दरवाजे में आघात करके उसे खोलने की चेष्टा करेंगे।

तीनों का जीवन एक क्षीण सूत्र के ऊपर झूल रहा था। यदि साधारण सी भी भूल हो आये, तो उनके जीवन-प्रदीप बुझने में जरा भी बाधा नहीं है। किसी विचार की प्रतीक्षा नहीं होगी, क्षण भर में उन्हें मृत्यु- दंड से दण्डित होना पड़ेगा। विशेष नहीं, इस अन्धकारमय कारागृह में इन तीन असहाय बन्दियों के मस्तक को तीन गोलियाँ अत्यन्त सुगमता से विदीर्ण कर सकती हैं। एल-हाज्जा के समान शहर से कभी कोई बन्दी प्राण बचाकर नहीं गया है, यह बात इतिहास के पृष्ठों में नहीं देखी गई।

एकाएक दरबाजा खुल गया । उन तीनों ने खुले हुए दरवाजे से अनुभव किया कि बाहर से स्वच्छ वायु तीव्र वेग से अन्दर आ रही है। इस हवा ने एक क्षण में ही उनके प्राणों में सजीवता और आशा का संचार कर दिया। एक मनुष्य लालटेन हाथ में लेकर उस दरवाजे के निकट स्तब्ध खड़ा था। लालटेन की रोशनी से इस अन्धकार में थोड़ी थोड़ी आभा फैल गई। जमील अत्यन्त शीघ्रता से अपने कुर्ते के अन्दर से छुरा निकाल कर उस व्यक्ति को मारने को उद्यत हो गया, किन्तु वह मनुष्य जरा भी विचलित न होकर अति मृदु स्वर में बोला-मिन-हु- हेथा— तुम कौन हो ?

जमील ने कहा- तुम कौन हो मित्र ? उस मनुष्य ने अति मृदु स्वर से कहा- ऐना ताहिब। मैं मित्र हूं। – तुम क्या ताहेब हो ? आगन्तुक ने कहा- हाँ ।

तीनों बन्दियों का मुँह प्रफुल्लित हो उठा। शत्रु के बदले उनका साक्षात्कार एक मित्र से हुआ l यह मित्र अन्य कोई नहीं था, जमील का ही अनुगत एक विश्वासी सेवक था। उसके साथ के मित्रों का परिचय हो जाने के बाद, जमील ने मृदु स्वर में डिक् और कासिम का परिचय करा दिया। उस समय बात करने का अवसर नहीं था, किस प्रकार कैसे इस शत्रुपुरी से निकला जाय, इस समय की यही एक मात्र समस्या थी ।

इस कारागृह की भीषण सुरंग के रास्ते से पहले ताहिब, फिर जमील, उसके बाद कासिम और अन्त में डिक चलने लगा। उस गुफा में प्रायः चालीस गज रास्ता चलने के बाद वे कितनी ही पत्थर की सीढ़ियों के पास पहुँचे। सीढ़ियों के नीचे एक मिट्टी का ढेर था। प्रथम सीढ़ी के बाद ही डिक ने अपने पैर के नीचे एक मनुष्य के पड़े हुए हाथ का अनुभव किया। दूसरी सीढ़ी पर उसका पैर बिछल गया। ऐसा लगा कि मनुष्य के रक्त की धारा बह रही है। डिक को समझने में देरी नहीं लगी कि उन्हीं के समान किसी अभागे का जीवन जल्लाद के हाथ से कुछ ही देर पहले समाप्त हुआ है। वे नीरवता में एक और दरवाजे के निकट पहुँचे। इस दरवाजे को खोलने में कोई दिकत नहीं हुई। इस दरवाजे से निकलकर वे एक बरामदे में पहुँचे। यहाँ पूर्ण निस्तब्धता छाई हुई थी। कहीं कोई नहीं था। आकाश के तारे जैसे मधुर मुस्कराहट फैला रहे थे। उनके क्षीण आलोक में डिक ने अचानक देखा कि बरामदे में एक ओर एक प्रहरी पड़ा है। उसकी छाती में एक छुरा बिद्ध है। इधर-उधर रक्त की धारा बह रही है। कि समझ गया कि जो व्यक्ति उन्हें मुक्त करने आया है उसी का यह काम है। डिक के लिए यह समझना बाकी न रहा कि जमील के अनुचर अपने को पकड़वाने लायक कहीं कोई सूत्र नहीं छोड़ते।

इस प्रकार पूर्णरूप से निरापद होकर ये सदर दरवाजे के निकट छा गये। सबसे पहले जमील सदर दरवाजे से बाहर आया। उसके बाद कासिम चला। डिकू ने केवल चौखट के ऊपर पैर ही रक्खा था, इसी समय बाहर गोलमाल सुनाई देने लगा। उन्होंने शीघ्रता से दरवाजा पार करके देखा, कि दीवाल के निकट एक खुली जगह में बहुत से लोग अस्त्र हाथ में लिये खड़े हैं। एक हब्शी ने जोर से ताहिब का गला पकड़ लिया। किन्तु सहसा अन्धकार में भी जमील का छूरा चमक उठा। दूसरे ही क्षण आक्रमणकारी के हाथ में यह विद्ध हो गया। हब्शी चीत्कार करता हुआ जमीन पर गिर गया। जमील शून्य पथ पर अपना छुरा घुमाते घुमाते डिक् और कासिम के पास आकर बोला- इस दीवाल में जो दरवाजा दिखाई दे रहा है उसमें होकर शीघ्रता से बाहर चले जाओ। शत्रुओं ने हमें देख लिया है l डिक उस अन्धकार में दीवाल के दरवाजे की ओर वेग से चलने लगा। इधर इस गम्भीर निशीथ के अन्धकार में शत-शत दैत्य – दानवों की तरह प्रहरी और सेना दौड़ती आ रही थी। अब और रक्षा संभव नहीं थी। किसी भी क्षण उन लोगों के प्राण नष्ट हो सकते हैं l

दीवार में जो गुप्त दरवाजा था उसके निकट आकर डिक ने देखा, वह बन्द था। उसने सोचा जैसे भी हो इस दरवाजे को तोड़ कर बाहर निकलना है। लेकिन कैसे, किस प्रकार इस दरवाजे को खोले, यह वह न समझ सका । सायं – सायं करती एक गोली उसके गाल के पास होकर निकल गई। सन्-सन् करती दूसरी गोली माथे के ऊपर से चली गई। उस समय गोली का शब्द, बन्दूकों की आवाज और शत-शत कंठो का नाना प्रकार का कोलाहल ।

डिक ने सोचा कि दुर्ग की सेना के पास उन लोगों के भागने का समाचार पहुँच गया है। सारे शहर के आदमी, प्रहरी और सेना उन्हें पकड़ने के लिए भागी चली आ रही है। नगर के निरीह निवासी इस शोर-गुल को सुनकर जाग गये हैं। इसका पता राजपथ के दोनों ओर के मकानों के खिड़कियों, दरवाजों से आती हुई रोशनी से चलता है।

इधर व्यवस्था क्रमशः बिगड़ती जा रही थी। प्रहरी और सेना किधर जायेंगी, किस पर आक्रमण करेंगी, यह न समझने के कारण बन्दूक, तलवार, छुरा आदि अस्त्रों को उन्मत्त की भाँति चलाने लगे। एकाएक आवाज करता हुआ वह गुप्त दरवाजा खुल गया । प्रायः बारह आदमियों ने नंगी तलवार और बन्दूक लेकर भीषण वेग से उस दरवाजे से शहर में प्रवेश किया। बेचारा कासिम दरवाजे के बीच में सहारा लेकर खड़ा था । इन लोगों के आक्रमण से वह जमीन पर गिर गया एवं फुटबाल की तरह बहुत दूर तक लुढ़कने लगा । डिक पहले से ही कुछ सतर्क था और हटकर खड़ा था इसलिये स्वभावतः ही उसकी दशा कासिम की तरह नहीं हुई।

क्या करें, यह स्थिर नहीं कर पा रहा था कि इसी समय कई लोगों ने आकर डिक् पर आक्रमण किया। दो आदमियों ने उसे सख्ती से पकड़ लिया और एक आदमी ने उसे लक्ष्य करके तलवार उठाई। एक दूसरा उसे मारने के लिए बन्दूक में गोली भरने लगा। डिक् ने समझा, अब मेरी रक्षा नहीं हो सकती । वह मृत्यु के लिए प्रस्तुत हो गया l

इसी समय जैसे कोई भूतों की लीला हो; जमील के कई विश्वासी अनुचर दीवाल लाँघकर उस स्थान पर आ गये एवं डिक की दशा देखकर उसी क्षण अपने हाथ के लोहे के मुग्दर से उन लोगों पर इस प्रकार आक्रमण किया कि वे क्षण भर में ही हमेशा के लिए पृथ्वी को छोड़ने को बाध्य हुए।

अब कासिम अपने को सँभालकर डिक् के पास आकर खड़ा हो गया और मृदु स्वर में कहने लगा— अब देर न करो। चलो, हम दरवाजे से बाहर निकल चलें । एक बार यदि बाहर निकल जायें तब भय नहीं है। इसी समय जमील का कण्ठस्वर सुना गया l वह कासिम और डिक की ओर अत्यंत शीघ्रता से आकर कहने लगा भागो l बाहर चले जाओ। वहाँ कोई डर नहीं है। वहाँ मेरे आदमी तुम्हारा इन्तजार कर रहे हैं।

डिक ने निर्भीक भाव से जमील को संबोधित करके कहा— जमील, तुम क्या करोगे ?

जमील ठठा करके हँसा । उस निस्तब्ध रात्रि में उसका उच्च हास्य एल-हाज्जा नगरी की प्रत्येक प्राचीर में प्रतिध्वनित हो उठा । दिक ने अपने जीवन में कल्पना भी नहीं की थी कि इतनी बड़ी विपत्ति का सामना इस प्रकार करना पड़ेगा। आज इस भीषण रात्रि में इतनी विपत्ति के समय भी वह विचलित नहीं हुआ। निर्भीक भाव से मृत्यु के पथ पर अग्रसर होने लगा l दुर्दान्त दस्युओं के दल ने, असहाय डिक् के ऊपर एक मुग्दर से आक्रमण किया । अरब देश के उत्तर ओर के निवासी शत्रु के ऊपर इस प्रकार के मुग्दर से आक्रमण करते हैं। ये मुग्दर देखने में छोटे लगते हैं लेकिन वजन में बहुत भारी होते है l यदि डिक के माथे पर यह मुग्दर पड़ जाता, तो उसके बचने की कोई आशा नहीं थी। मस्तक की खोपड़ी अलग हट जाती । चतुर डिक ने अपने बाँये हाथ से शीघ्रतापूर्वक मुग्दर को हटा दिया l यह उसके निकट के एक व्यक्ति के माथे में लगा एवं वह तुरन्त पृथ्वी पर गिर गया। डिक जरा निश्चिन्त हुआ था कि एकाएक उस अंधकार में होता हुआ एक आदमी तीक्ष्ण छुरा लेकर आया और उसके कंधे में मार दिया। डिक ने भयानक यंत्रणा और दर्द को भी धैर्य के साथ सहन करके धीरे-धीरे कंधे में लगे हुए छुरे को निकाल लिया। जिस आदमी ने उसे छुरा मारा था उसे लक्ष्य करके डिक् ने भी एक मुग्दर पास में पाकर उसी क्षण उसके मारा।

इस प्रकार जरा सम्हलने के उद्देश्य से वह जरा दूर हटकर खड़ा हो गया l इसी समय उसने अनुभव किया कि इस अवसर से लाभ उठाकर एक आदमी ने अपने बलिष्ठ हाथों से उसे जकड़ लिया। वह अपने को इस अनजाने आदमी के बाहुपाश से छुड़ाने की पूरी कोशिश करने पर भी सफल नहीं हो रहा था। यह आदमी असाधारण बलशाली है, यह अनुभव वह प्रतिक्षण कर रहा था l डिक प्राणपण से अपनी शक्ति के अनुसार मुक्त होने की चेष्टा कर रहा था, उसी समय उसकी दृष्टि एक दूसरे आदमी पर पड़ी। यह आदमी डिक के मस्तक पर पिस्तौल ताने खड़ा था। वह किसी भी क्षण घोड़ा दबाने को तैयार था।

एक क्षण में ही डिक के मस्तक पर गोली लगेगी और फिर सब समाप्त । ठीक इसी समय एक व्यक्ति, उपन्यास के जिन की तरह, दीवाल कूदकर आ गया और उस आदमी के ऊपर इस प्रकार झपटा कि उसके हाथ में से पिस्तौल छिटककर दूर गिर गई, एवं वह आदमी जमीन पर गिर गया। उसी समय उसकी पीठ में एक छुरा भोक दिया।

इसी समय कासिम का विकट चीत्कार सुनाई दिया। उसके हाथ में रक्त से सना छुरा था l वह किसी प्रकार से अपनी रक्षा कर रहा था। अत्यंत विकट स्वर में कासिम चीत्कार करता हुआ डिक से कहने लगा भागो- भागो l दरवाजे में से निकल जाओ। इसी समय कासिम के हाथ के छुरा के ऊपर एक गोली आकर लगने से छुरा कहाँ उड़ गया, पता नहीं लगा। डिक् एकाएक यह न सोच सका कि क्या करे इसी समय वहाँ जमील आया । वह भी कासिम के समान उच्च स्वर से बोला दरवाजे में से भाग जाओ। एक बार किसी प्रकार प्राचीर से बाहर निकल जाने पर फिर विपत्ति की सम्भावना नहीं है। वहाँ मेरे आदमी खड़े हैं।

जमील किसी प्रकार एक छःमुखी पिस्तौल पाने में सफल हो गया था। उसने एक असाधारण साहस का काम किया। जिन लोगों ने बाहर जाने का रास्ता रोक लिया था उनकी ओर लक्ष्य करके एक के बाद एक गोली छोड़ने के साथ ही लोग इधर-उधर भागने लगे। इस अवसर का लाभ उठाकर पहले जमील, फिर डिक दरवाजे की ओर बढ़े। जमील गोली छोड़ने के बाद अपने हाथ की तलवार घुमाता-घुमाता आगे बढ़ रहा था। शत्रु पक्ष का कोई भी व्यक्ति उसे बाधा देने को अग्रसर नहीं हो रहा था । नगर की प्राचीर के बाहर जमील के साथी इस प्रकार खड़े थे कि यदि नगर के अस्त्रधारी सैनिक उनका पीछा करते हुए उन पर आक्रमण करें तो वे दलबद्ध होकर आक्रमण कर सकें। दो सौ साहसी बद्दू अपने सरदार की जीवन-रक्षा के लिए प्राण देने को प्रस्तुत थे । यद्यपि जमील, कासिम और डिक् कारागार की चहारदीवारी से बाहर निकल आये थे लेकिन शहर की प्राचीर से बाहर नहीं निकल सके थे।

रेगिस्तान के शहरों की एक विचित्रता है। यहाँ शहर के बाहर की ओर जैसी दीवार होती है इसी प्रकार शहर के अन्दर भी एक के बाद एक मिट्टी की अनेक दीवारों से घिरा होता है। एल-हाज्जा शहर इसी प्रकार से बना था। इसी लिए जमील, डिक और कासिम ने यद्यपि कारागृह की दीवार से निकलकर एक अंश में मुक्ति पा ली थी किंतु वे शहर के बाहर नहीं निकल सके। ये केवल एक दीवार से बाहर निकाल सके l

इस शहर की दीवारों में केवल एक-एक दरवाजा था। वह भी इतना संकीर्ण कि उसमें होकर एक साथ दो व्यक्तियों से अधिक नहीं जा सकते थे। इसी प्रकार की दीवारों और उनमें बने हुए दरवाजों को लाँघने के बाद ही वे मुक्त हो सकते हैं l

मरुभूमि का एक-एक शहर मानो एक-एक द्वीप है। यदि किसी प्रकार इस शहर से निकल सको तो काफी निश्चिन्त होने की सम्भावना है। अब कुछ समय के लिए शत्रुदल आक्रमण करने में सफल नहीं हो सकता, इसमें कोई सन्देह नहीं है । रेगिस्तान की तुलना समुद्र के साथ की जा सकती है। सागर कहाँ कौन-सी दिशा में जाकर मिला है, उसमें छिप जाने पर सुगमता से पकड़ने की कोई सम्भावना नहीं होती इसी प्रकार मरुभूमि के विशाल मैदान में पहुँच जाने पर पकड़े जाने की सम्भावना बहुत कम रहती है। डिक और जमील पुनः द्रुत वेग से रास्ता चल रहे थे। आगे जमील, पीछे टिक, पीछे कुद्ध जनता चीत्कार करती हुई आ रही थी। दो आदमियों के हाथ में दो भारी मुग्दर थे l एक अरब ने अपने हाथ का मुग्दर खींचकर डिकू के ऊपर फेका। डिक् क्या करता आत्मरक्षा के लिए उसके पास कोई अस्त्र-शस्त्र था ही नहीं। उसने शीघ्रता से कुछ हटकर किसी प्रकार अपने प्राण बचाये। इधर वह सामने जमील को नहीं देख पा रहा था। जमील सम्भवतः किसी मकान के अंदर घुस गया था। रास्ते के दाहिनी ओर उसने एक मकान देखा । यदि किसी प्रकार इस मकान के अन्दर प्रवेश कर सके तो उसकी प्राणरक्षा हो सके। से उसने देखा कि पास के मकान का दरवाजा खुला है। डिक् ने हड़बड़ाकर उस दरवाजे के अन्दर प्रवेश करके दरवाजा बंद कर लिया। उस घर में प्रवेश करके उसने देखा कि वहाँ अन्धकार है। कोई दीपक नहीं है। उसे ऐसा लगा कि उस मकान के अन्दर से एक आदमी जल्दी से भागकर बाहर निकल गया। उसका यह अनुमान सत्य है या नहीं, वह उस समय न समझ सका ।

उसने शीघ्रता से दूसरे कमरे के अन्दर प्रवेश करके देखा कि वहाँ भी अन्धकार है, लेकिन उसने उस अंधकार में अस्पष्ट रूप से देखा कि वहाँ कई स्त्रियों भय से काँपती हुई करुण स्वर से अल्लाह, अल्लाह, प्रार्थना कर रही हैं। डिकू ने जैसे ही प्रवेश किया वैसे ही स्त्रियाँ एक साथ चिल्लाई, हरामी ! हरामी ! चोर ! चोर। कोई हमारी सहायता करो। डिक् क्षण भर के लिए विचलित हुआ। क्या करे, सहसा यह निश्चय न कर सका एकाएक उसे ध्यान आाया कि प्रत्येक अरब के घर के पीछे एक छोटा-मोटा बगीचा होता है l उस बगीचे के पीछे की ओर भी दरवाजा होता है। इस दरवाजे से समयानुसार स्त्रियाँ दूसरों के घर आती-जाती हैं। जैसे ही उसे ध्यान आया, वह घर से बाहर निकलकर दरवाजे की ओर दौड़ा। बगीचे के अंदर दौड़ने के समय न जाने किसने चुपके-चुपके कहा- जल्दी जल्दी चलो। मैं उत्तर के दरवाजे से पहुंचा हूं।

डिक् आश्चर्य से बोला ‘जमील’ l साथ ही साथ एक दीर्घकाय व्यक्ति ने अन्धकार में से बाहर आकर उसका हाथ पकड़ लिया एवं पीठ थपथपाते हुए बोला— डर नहीं है। मैं तुम्हारा इन्तजार कर रहा था। मैं जानता था तुम इसी मकान में घुसोगे इसे छोड़कर और किसी ओर कोई रास्ता नहीं था। अब समय नहीं है। जल्दी चलो।

डिक एक भी शब्द न बोलकर जमील के साथ गुप्त दरवाजे से बाहर आया। बाहर उस रास्ते पर कोई आदमी नहीं था। दोनों दीवाल से सटे सटे अत्यंत सतर्कता से अग्रसर होने लगे। थोड़ी ही दूर पर बन्दूक की आवाज सुनाई दे रही थी। वे जितना ही आगे बढ़ते जा रहे थे उतना ही मरुभूमि के निर्मल नीलाकाश के पात्रों नक्षत्रों के ज्योतिर्मय प्रकाश में दिखाई दिया कि थोड़ी ही दूर अरबों का एक दल आपस में ही लड़ रहा है। उनके हाथ में छुरी, तलवार, मुग्दर आदि मारने के अस्त्र हैं। कभी-कभी एक-दो गोलियाँ भी आपस में मार देते थे

जमील और डिक् के सामने दो आदमी एक बन्दूक के लिए छीना-झपटी कर रहे थे । सहसा बन्दूक की आवाज हुई। जो बंदूक की नली को पकड़े हुए था उसका मस्तक उड़ गया । जमील सहसा डिक् को उत्तेजित देखकर कहने लगा-सावधान ! लड़ाई करने मत जाना । हम मुक्ति चाहते हैं— मुक्ति चाहते हैं। मेरे पीछे आओ।

मुहूर्त भर में ही डिक् समझ गया कि इन दोनों दलों में उसके पक्ष का कौन-सा दल है। एक दल जमील के पक्ष का था और दूसरी सुलतान की सेना थी। सुलतान की सेना बद्दुओं-बीर जमील के अनुचरों पर आक्रमण करके एकदम उन्हें खतम करने के लिए भूखे बाघ की तरह टूट पड़ी, किंतु मरुभूमि के निर्भीक और साहसी बद्दू इस सेना को हटाकर, वीरता से नगरी की अंतिम दीवार के दरवाजे पर आ गये थे । सुलतान की बहुत-सी सेना मारी गई। जो सैनिक बच गये थे उनमें इतनी शक्ति नहीं थी कि जमील के लोगों का प्रतिरोध कर सकते l

इस प्रकार डिक और जमील एल-हाज्जा नगरी के बाहर आ पहुँचे। वहाँ एक ऊँट उनके लिए खड़ा था। जमील ने कहा- अब भय नहीं है, अब हम पूर्ण सुरक्षित हैं। मरुभूमि की स्वच्छन्द हवा से उन दोनों में सजीवता का संचार हुआ। जमील ने कहा— डिक, तुम मेरे पीछे कैंट पर बैठो। पृथ्वी की ऐसी कोई शक्ति नहीं है जो अब हमें पकड़ सके ।

अब बाहर की तरफ दनादन गोली चल रही थी। कैसा आश्चर्य ! जब वे सोच रहे थे कि अब आशंका की कोई बात नहीं है, उसी समय पुनः विपत्ति की कालिमा घिर आई। मनुष्यों के एक दल ने डिक और जमील को ऊँट पर चढ़ते देख लिया था। वे चिल्लाकर कहने लगे—वह देखो, वह देखो, दुश्मन भाग रहा है।

सुलतान की सेना का एक दल वेग से उनकी ओर आने लगा। जिस प्रकार मुक्त जलस्रोत अत्यंत वेग से बहता है उसी प्रकार सैनिक अत्यंत वेग से बाहर चले आ रहे थे। जमील और डिक जिस ऊंट पर चढ़े थे वह ऊँट सेना का विकट चीत्कार और गोली की आवाज सुनकर चौंक उठा। एक बार उछला, उसके बाद परिचित मरुभूमि के बालुकामय पथ पर इतनी तेजी से दौड़ने लगा कि उस अंधकारमय मरूभूमि के ऊपर किस ओर जा रहे हैं, यह न समझने के कारण सुलतान के सैनिक उनका पीछा न कर सके ।

डिक ने देखा कि समुद्र के समान ही रेगिस्तान का अनन्त विस्तार है। मरूभूमि में किस ओर वे जा रहे हैं, इस विषय में उन्हें कोई उत्सुकता नहीं थी। धीरे-धीरे एल-हाज्जा शहर उनकी दृष्टि से ओझल हो गया । पत्थर गिरने की सामान्य आवाज के समान गोले- गोलियाँ चलने की आवाज अत्यंत क्षीण सुनाई दे रही थी। आकाश में तारे चमक रहे थे रात्रि की शीतल हवा के स्निग्ध स्पर्श से उनकी देह को छुटकारे का आनन्द मिल रहा था एक साथ दोनों चिल्ला उठे-छुटकारा हो गया ।

शेष आगामी अंक में—–

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