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अरब के बद्दू 13/”तूफान के मुँह में”: सुदेवी गौड़

बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू

लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त

 अनुवादिका 

श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए., साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

सन 1963 में प्रकाशित

—– गतांक से आगे–

बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहाl

इतने वर्ष पूर्व प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया थाl

घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहेगा l उसी संदर्भ में आज त्रयोदश अध्याय प्रस्तुत है l

त्रयोदश अध्याय

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तूफान के मुँह में

जो गाड़ी आकर खड़ी हुई थी उसमें से सेना की एक टुकड़ी नीचे उतरी। सिपाहियों की बन्दूकों का शब्द निस्तब्ध मरुभूमि में प्रतिध्वनित होने लगा ।

डिक् हतबुद्धि हो गया था। वह क्या करे, यह सहसा निश्चित न कर सका । वह देख रहा था कि अरब इधर-उधर बिखरे हुए हैं। इस समय यदि सिपाही आकर उनके ऊपर आक्रमण करें तो उनकी गति को किस प्रकार रोका जाय !

जमील ने डिक से कहा- इस समय हम क्या कर सकते हैं ? डिक् ने गम्भीर होकर कहा – यदि हम अपने दल के लोगों को एकत्रित करके मशीनगन चला सकें तो निश्चय ही पहले की तरह इस बार भी इस गाड़ी के अधिकारियों को पराजित करना असम्भव नहीं है। किन्तु यदि तुम्हारे आदमी न आयें तो क्या होगा ?

शेख जमील उत्तेजित कंठ से बोला तुम निश्चय समझो कि वे भागेंगे नहीं। उन्हें आकर साथ देना होगा।

उसकी बात सत्य हुई। डिक् और जमील एक बालू के टीले पर खड़े होकर बातें कर रहे थे। उन्होंने देखा, कुछ देर पहले जो अरब भूखे बाघ की तरह लूट का माल लेकर मार-काट कर रहे थे वे बन्दूक का शब्द सुनते ही दौड़कर एकत्र होने लगे। क्षण भर में ही अपना लूटा हुआ माल बालू के अन्दर छिपा दिया। वे लोग शत्रु से लड़ने को तैयार हो गये।

ट्रेन एक पहाड़ के नीचे खड़ी थी। इस समय गाड़ी के अन्दर बैठी हुई सेना यदि वेग से आकर आक्रमण करे तो हम किसी प्रकार नहीं बच सकते। इधर तुर्क अन्दाज से लक्ष्यहीन गोली छोड़ रहे थे। इस समय यदि डिक, जमील और उनके दल के लोग ऊँचे पहाड़ पर खड़े होकर शत्र को लक्ष्य करके गोली छोड़ सकें तो किसी भी प्रकार शत्रु उनको विध्वंस नहीं कर सकते। यह सोचकर डिक शीघ्रता से एक पहाड़ी पर जाकर खड़ा हो गया । एक पहाड़ के ऊपर डिक और जमील पचास बद्दुओं को लेकर शत्रुओं पर आक्रमण करने को तैयार हो गये। और दूसरे पहाड़ पर बद्दुओं का दूसरा दल खड़ा हो गया ।

ऐसी समुचित व्यवस्था हो जाने के बाद जमील की ओर देखकर डिक बोला- तुम्हारे आदमी मेरा हुक्म मानेंगे न ? जमील ने गर्व से कहा- बद्दू प्राण देना जानते हैं पर किसी से झूठ बोलना नहीं जानते। डिक हँसकर बोला तब तुम उन्हें यह समझा दो कि मैं जिस समय हुक्म दूँ उसी समय शत्रुओं को लक्ष्य करके गोली चलावें ।

इसी समय, खाकी वर्दी पहने तुकों का एक दल संगीनें चढ़ाये तीव्र गति से दोनों पहाड़ों के बीच की भूमि की ओर चला आता दिखाई दिया। दल बड़ा नहीं था l लगता है, तुर्को ने समझा कि यहाँ बद्दू अधिक संख्या में नहीं हैं। सौ से ऊपर तुर्क ट्रेन पर पहरा दे रहे थे ।

कई क्षण सब स्तब्ध रहे। कहीं कोई शब्द नहीं था केवल मरुभूमि की दिगन्त प्रसारित छाती पर किसी की करुण रागिनी गूँज रही थी।

तुर्क श्रेणीबद्ध होकर कायदे से आ रहे थे। लगता है, उन्होंने यह सोचा भी नहीं था कि इस मरुभूमि में उन पर आक्रमण करने के लिए एक दल पहले से ही तैयार खड़ा है।

डिक और जमील अपने दल-बल के साथ ऐसे सुरक्षित पहाड़ पर खड़े थे जहाँ से उन्हें सब दिखाई देता था किन्तु नीचे के आदमी उन्हें नहीं देख सकते थे। डिक ने जैसे ही देखा कि शत्रु सेना उसकी मार के अन्दर आ गई है, वैसे ही जमील की ओर देखकर बद्दुओं को लक्ष्य करके कहा—फायर !

तुरन्त बद्दुओं की सौ बन्दूकें गरजने लगीं। तुर्की सेना ऐसे आक्रमण के लिए तैयार नहीं थी । स्वभावतः वह आक्रमण का सामना करने के विषय में कुछ निश्चय न

कर सकी। कितनी ही सेना आघात पाकर समाप्त हो गई। बहुत-सी प्राण-रक्षा के लिए गाड़ी की ओर भागने लगी। उसकी हिम्मत टूट गयी ।

डिक ने पहले ही सतर्क कर दिया था कि विजयोल्लास में मस्त होकर द्वन्द्व-युद्ध करने के लिए नीचे मत चले जाना। यदि ऐसा किया तो विजय पाना असम्भव हो जायगा। इसलिए उसने कड़ा हुक्म दे दिया था कि अपने-अपने स्थान को न छोड़ें। तुर्कों को पराजित होते देखकर बद्दू पहले की तरह ही लूट-पाट करने को व्यग्र होने लगे। वे किसी भी प्रकार अपने स्थान पर खड़े रहना नहीं चाहते थे l

डिक् उनका मतलब समझ गया था। उसके हाथ में जो मशीनगन थी वह उसी प्रकार बंद रही। वह उसे छोड़ने को व्यग्र नहीं हुआ। वह जानता था कि यह सेना ढोनेवाली ट्रेन ऐसी बनी है कि गोलियाँ किसी प्रकार उसके अन्दर नहीं जा सकतीं। यदि वे किसी प्रकार सम्बलहीन हो गये तो इस मरु-क्षेत्र में सब इस बालुका में मर जायेंगे। कौन जानता है, उस समय क्या होगा । डिक् इस प्रकार जिस समय भविष्य की चिन्ता कर रहा था उसी समय एक बद्दू भागता -भागता अपना स्थान छोड़कर डिक के निकट आया और उत्तेजित होकर बोला— सुनो सरदार, हमारे दल के लोग उत्तेजित हो रहे हैं। वे कहते हैं, तुम उन्हें लड़ाई जीतने के गौरव से वंचित करना चाहते हो।

डिक् गरजकर बोला— उन बेवकूफों से समझाकर कहो कि वे भूल रहे हैं। इस समय लड़ाई करने जाने से हमें पीछे हटना पड़ेगा। जैसे भी हो, रात तक उन्हें इसी प्रकार चुपचाप रहना पड़ेगा ।

‘वे लोग बहुत कम है’ डिक ने बात समाप्त न होने देकर कहा—-‘भूलो मत, मैं तुम्हारा सर्दार हूँ ।’ पता नहीं, क्यों डिक् की भर्त्सना से वह विचलित हो गया और धीरे-धीरे वापिस चला गया । डिक् ने भी आश्चर्य से देखा कि उसके दल के लोगों ने उसका आदेश मान लिया है। कोई भी शत्रु का पीछा करने नीचे नहीं उतरा ।

डिक उत्सुक होकर फौजी ट्रेन को देख रहा था। इंजन का काफी धुआँ आकाश में मेघ के समान फैल रहा था। ट्रेन में बहुत-सा युद्ध का साज-सामान और रसद थी । यदि किसी प्रकार इस गाड़ी पर कब्जा हो जाये तो बहुत लाभ हो सकता है। क्या अस्त्र-शस्त्र, क्या खाद्य सामग्री उन्हें फिर किसी का अभाव नहीं रहेगा। फिर भी क्या यह सम्भव है ?

डिक् ने देखा, मरुभूमि के दूर दिगन्त में पश्चिम की ओर आकाश में रक्त के समान लाल आभा फैली हुई है। प्रकाण्ड गोलाकार सूर्य धीरे-धीरे डूब रहा है । अस्तगामी सूर्य की शेष लोहित रश्मि से सारे पहाड़ पर गुलाबी आभा फैली हुई है ।

जल्दी रात्रि हो जायगी। रात के पहले ही किस प्रकार इस गाड़ी पर कब्जा किया जाय, इसके लिए कोई उपाय करना पड़ेगा। वह चंचल और व्यग्र हो उठा। क्या करे, किस प्रकार जीवन को संकट में डालकर दुःसाहस के साथ इस ट्रेन पर आक्रमण किया जाय ?

क्यों नहीं कर सकता। यदि गाड़ी पर कब्जा कर सकूं तो युद्ध के इतिहास में मेरा नाम अमर हो जायेगा । तुर्की सेना संख्या में तीन-चार सौ से कम नहीं होगी। उसके साथ आमने-सामने युद्ध नहीं हो सकता! तब उपाय क्या है ? वह उत्तेजित कंठ से बोल उठा ‘जमील!” जमील निकट आकर बोला क्या आदेश है सर्दार ?

डिक बोला मैं तुम्हारा परामर्श चाहता हूं। तुम अपने दल में से चुने हुए बारह जवान दे सकते हो ?

जमील ने कठोर दृष्टि से एक बार डिक की ओर देखा। उसके बाद गम्भीर होकर बोला- तुम क्या इस गाड़ी को भी उड़ा देना चाहते हो ? – ‘हां, यही बात है।’

किन्तु समझ लो, बड़ी जिम्मेदारी का काम है और अत्यन्त शीघ्रता से करना होगा। इसी लिए अत्यन्त चतुर बारह आदमियों के लिए तुमसे कह रहा हूँ ।

जमील एक क्षण चुप रहकर बोला देखो, मैं तुम्हें आदमी दूँगा। बारह आदमी ही मिलेंगे पर उनसे यह न कहा जायगा कि तुम उन्हें किस काम के लिए ले रहे हो। मैं जानता हूँ कि मेरे हुक्म को मानने में वे हानि-लाभ का विचार नहीं करेंगे। तुम्हारा उद्देश्य क्या है— किस प्रकार कार्य करोगे, अब यह बताओ l

डिक हँसकर बोला-तब सुनो—

शेष आगामी अंक में—–

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