
उत्तर दिसि बह सरजू पावन…
रामधनी द्विवेदी, वरिष्ठ पत्रकार
यात्रा वृत्तांत अयोध्या: 2
अयोध्या का कायांतरण हो रहा है। अब वह उस गौरव का पुन: पाने की ओर अग्रसर है जो कभी श्री राम के समय रहा होगा।
अयोध्या को भव्यता प्रदान करने के लिए सड़कें चौड़ी हो रही हैं, इसलिए अभी काफी कुछ अस्तव्यस्त सा दिखता है लेकिन साल भर के भीतर ही जब सब कुछ तैयार हो जाएगा तो अयोध्या स्वर्गादपि गरीयसी हो जाएगी। जन्म भूमि मंदिर अपने पूर्ण आकार और स्वरूप में आने पर देश का ही नहीं विश्व का सबसे सुंदर तीर्थस्थल होगा। अभी निर्माण के समय ही उसे देख कर रोमांच होता है जबकि अभी सिर्फ आधार ही बना है। कड़ी सुरक्षा व्यवस्था में निरंतर निर्माण कार्य हो रहा अविरल और अनथक। चारों ओर सुरक्षा कर्मियों की सतर्क निगाहें और जय श्री राम के बीच रामलला के चल विग्रह का दर्शन करते लोग जो निर्माण स्थल को उसी निगाह से देख रहे हैं जैसे उनका अपना सपना साकार हो रहा हो।

हनुमान गढ़ी में दर्शन कर निकलते ही रमा शरण अवस्थी आ गए। वह हम लोगोंको लेकर राम की पैड़ी में गए और एक रेस्तरां में सुस्वादु भोजन कराया। हम लोगों ने सामान्य भोजन किया और बच्चों ने चाऊमीन, डोसा और पिज्जा भी। अवस्थी जी व्रत थे तो जीरा आलू पर ही रह गए। वहां से हम लोग श्री राम जन्म स्थल की ओर बढ़े। कदम-कदम पर चौकस सुरक्षा कर्मी और नाके। स्थानीय पुलिस के अलावा सीआरपीएफ के जवानों की तैनाती। महिला सुरक्षाकर्मी भी सीआरपी की। आंखें सतर्क और अंगुली राइफल की ट्रिगर पर । हम लोगों की गाडि़यों के नंबर उनके पास थे लेकिन हर नाके पर पूछताछ जरूर हुई। अंतिम नाके के पहले ही गाड़ी सड़क के किनारे रोक और फोन, घड़ी और अन्य इलेक्ट्रानिक सामान ड्राइवर को देकर हम लोग सीआरपीएफ के एक अधिकारी के साथ आगे गए।
काफी चलने के बाद निर्माणस्थल पर पहुंचे। रामलला के दर्शन किए, प्रसाद लेने के बाद वहां बने अस्थायी संग्रहालय में उन अवशेषों को देखा जो वहां खोदाई से मिले थे और जिनके आधार पर ही कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि वहां मंदिर के प्रमाण मिलते हैं। (साथ में दिए चित्रों से आप निर्माण स्थल का अनुमान लगा सकते हैं।)

वहां से निकल कर रमा शरण जी ने गुप्तार घाट चलने का कार्यक्रम बनाया। यह अयोध्या से छह सात किमी दूर है। कहा जाता है कि भगवान श्री राम ने यहीं अपना मानव शरीर त्याग कर अपने धाम को प्रस्थान किया था, इसी से इसे गुप्तार घाट कहते हैं। यह अयोध्या की 24 कोसी परिक्रमा का हिस्सा है। बड़ी ही रमणीय स्थल है।
यहीं एक बांध भी बन रहा है जिसके बनने से सरयू के डूब क्षेत्र की काफी जमीन बच जाएगी और नई अयोध्या बसाने की योजना है। अभी क्षेत्र विकसित नहीं हुआ है तो भी इसकी कल्पना की जा सकती है कि सरयू के तट पर बसा नया शहर कैसा होगा। अब भी लोग यहां टहलने घूमने और पिकनिक मनाने आते ही हैं।
गुप्तार घाट में 19 वीं सदी में राजा दर्शन सिंह द्वारा बनाये गये मंदिरों की श्रृंखला है। यहां के घाट सुव्यवस्थित हैं। यहां सरयू काफी गहरी हो जाती हैं और उनमें पानी भी खूब है। लंबा पाट मन को बांध लेता है। हम लोगों ने वहां वोटिंग का आनंद लिया। गलती यह हो गई कि लाइफ जैकेट नहीं पहनी। जबकि यहां कई दुर्घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन रक्षा करने वाले तो श्री राम ही है न,यह सोच कर लापरवाही की गई।

मेरे दोनों पौत्रों ज्योतिर्मय और पियंवद और नातियों आयुष्मान और मानस ने नौकायन का खूब आनंद लिया। तृप्ति ने वीडियो भी बनाए, इस यादगार यात्रा के। यहां के घाट बनारस के घाटों की याद दिला रहे थे। यहां महिलाओं के लिए चेजिंग रूम तक बने थे हालांकि उनमें बाढ़ का बालू भरा था जिसे साफ नहीं कराया गया था। नौकायन का आनंद सभी ने लिया। मैं नदी आदि में जाने से डरता हूं क्यों कि एक बार बनारस में बढ़ती गंगा में स्नान करते समय डूबने से बचा हूं। जल मुझे डराता है। दक्षिण यात्रा के दौरान भी मैं समुद्र से दूर ही रहने की कोशिश की।
चाणक्य ने जिनपर अविश्वास करने के लिए कहा है उनमें पहले नंबर पर नदी का ही नाम है,
नदीनाम् शस्त्रपाणिनाम् नखीनाम् श्रृंगिगाम् तथा।
विश्वासे नैव कर्तव्यं स्त्री राजकुलेशु च।
नदी हमें जीवन देती है लेकिन अपने उद्दाम रूप में यह निर्मम हो जाती है और किसी का भेद नहीं रखती। कई अच्छे तैराक उसी जगह डूबे हैं जहां वह रोज तैरते थे। जिन नदियों के किनारे लोग सदियों से बसे होते हैं, उन्हें वह एक पल में तबाह कर देती है बिना मोह के।
वहां से लौटते समय शाम के चार बज रहे थे। अवस्थी जी के दफ्तर का समय भी हो रहा था। हांलाकि पूरे समय वह फोन पर समाचारों को लेकर सक्रिय रहे। हम लोग दैनिक जागरण के दफ्तर पहुंचे। वहां पाय पान हुआ और साथियों से परिचय भी। जिनकी रिपोर्ट पढ़ते थे उन्हें देखा समझाा।
जब हम लोग जन्म भूमि का दर्शन कर रहे थे तो उसी बीच डाक्टर चंद्र गोपाल पांडेय जी का फोन आया। वह पूछ रहे थे कि कोई असुविधा तो नहीं हुई। मैने बताया कि रमाशरण जी साथ हैं तो असुविधा कैसी। यह सुन वह आश्वस्त हो गए। सूरज ढल रहा था। हम लोगों की वापसी यात्रा शुरू हुई। (क्रमश:)
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