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Ayodhya: “साधु-संत तो मयूर की तरह कर रहे थे नृत्य, बह रहीं थी अश्रु धाराएं””

भव्य अयोध्यापुरी में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के सजल दृष्टांत 

मयूर की तरह मगन हो नृत्य करने वाले साधु-संत, रामभक्त और कारसेवक ही नहीं मेहमान भी हो रहे थे भाव विह्वल

रामभक्तों के चेहरे और आंखों का भाव यह बता रहा था, उनकी वर्षों का तप हो गया साकार

कारसेवकों, रामप्रेमियों के त्याग, पीड़ा, वेदना, जलालत और उन पर ढाए गए जुल्मों- अत्याचार का हुआ शमन

यह तब हुआ, जब भव्य,दिव्य और नव्य अयोध्या में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा से उनका तादात्म्य हो रहा था स्थापित

रामानुज

जब भारत ही नहीं समूचा विश्व श्रीराम लला के आगमन से राम मय था, तो अयोध्या में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में हजारों की संख्या में उपस्थित साधु-संत, रामभक्त कारसेवक और मेहमान ही नहीं भाव विह्वल हो रहे थे, अपितु भारत के गौरवशाली, ऐतिहासिक और सांस्कृतिक उत्थान-प्रतिष्ठान के शुभ अवसर पर 22 जनवरी-2024 को श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के पूर्व तक जो साधु-संत, रामभक्त और कारसेवक मयूर की तरह मगन हो नृत्य कर रहे थे, वे आज भावुक हो गए थे और कई साधु-संतों की आंखों से तो अश्रु की धाराएं बह रही थीं। कुछ अपनी सुध-बुध ही खोए हुए थे तो कई लोग राम लला के आगमन से मगन हो नृत्य कर रहे थे। इनमें रामकाज और कारसेवा से जुड़े साधु-संत, रामभक्त, कारसेवक ही नहीं, बल्कि आमजन और विभिन्न क्षेत्रों के मशहूर और प्रबुद्ध लोग भी शामिल थे।

ऐसा लग रहा था कि रामभक्तों-राम प्रेमियों, कार सेवकों के वर्षों के त्याग, पीड़ा, वेदना, जलालत और उन पर ढाए गए जुल्मों-अत्याचार का अब शमन हो गया है। इन रामभक्तों के चेहरे और आंखों का यह भाव साफ बता रहा था, उनके पूर्वजों, अग्रजों के वर्षों का तप साकार हो गया है। ऐसा हो भी क्यों नहीं, जब भव्य, दिव्य और नव्य अयोध्या में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा से उनका जो तादात्म्य स्थापित हो गया था।

श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह में पहुंचे जिन साधु-संत, रामभक्त और कारसेवकों का मन उत्साह, उल्लास, उमंग से मगनमय होकर आसमान तक हिलाेरें मान रहा था। उनका हृदय प्राण प्रतिष्ठा समारोह के आरंभ होते ही श्रीराम लला के अनुराग, श्रद्धा, आस्था और प्रेम के ऐसे सागर में गोते लगाने लगा कि वे भाव विह्वल हो गए और उनकी आंखों से झर-झर आंसू बहने लगे। वे चाहे राम मंदिर आंदोलन के समय देश-दुनिया के रामभक्तों, कारसेवकों और युवाओं में भगवान श्रीराम के प्रति प्रेम, ऊर्जा और जोश को भरने साध्वी ऋतंभरा हों, उमा भारती हों और चाहे रामानंद संप्रदाय के संत, जगदगुरु शंकराचार्य स्वामी रामभद्राचार्य जी हों।

चाहे रामायण में मां सीता का किरदार निभाने वाली दीपका चिखलिया हों, चाहे आम साधु-संत, रामभक्त और आम कारसेवक हों। इन सभी के नेत्रों से निरंतर बह रहे अश्रु किसी शब्द और भाव के मोहताज नहीं थे। यह उनके श्रीराम लला के प्रति अगाध प्रेम,अनुराग, आस्था और श्रद्धा के मनोभावों को सहज ही अभिव्यक्त कर रहा था। कुछ सिने अभिनेता तो मगन होकर नाच रह थे तो कुछ जयकारा लगा रहे थे। कुछ घंटी बजा कर मगन थे तो कुछ श्रीराम लला की धुन में ताली बजा रहे थे।

रामानंद सागर के सुप्रसिद्ध धारावाहिक रामायण में मर्यादा पुरुषोत्तम श्री रामचंद्र की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल तो श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा के गौरवपूर्ण पलों के समय घंटी बजा रहे थे तो लक्ष्मण जी भूमिका निभाने वाले सुनील लहरी श्रीराम प्रेम में मगन थे।

बालीबुड अभिनेता अनुपम खेर दोनों हाथ जोड़कर प्रभु श्रीराम के ध्यान में खोए हुए थे तो दक्षिण के सुपर स्टार रजनीकांत और बालीबुड अभिनेत्री कंगना रनौत श्रीराम का जयकारा लगा रही थीं। यही नही बालीबुड कलाकार राजपाल यादव श्रीराम का झंडा लेकर नाच रहे थे। ये हाल तो जहां इस समारोह में खास लोगों का था वहीं आम लोगों, श्रीराम प्रेमियों और रामभक्त-कारसेवकों की भी मनोदशा इससे कुछ कम नहीं थी। वे भी निरंतर रोये जा रहे थे और जयकारा लगा रहे थे।

इन्हीं में से एक थीं झारखंड के धनबाद की सरस्वती देवी जो पिछले तीस वर्षों से श्रीराम लला के भव्य मंदिर के लिए मौन व्रत धारण किए हुईं थीं। कोलकाता के कोठारी बंधु राम कुमार कोठारी और शरद कोठारी और उनके परिवार के त्याग-समर्पण का तो कोई पारावार नहीं। दोनों भाई राम कुमार और शरद कोठारी को श्रीराम मंदिर आंदोलन के समय अयोध्या में जिस निर्ममता के साथ पुलिस बलों ने सीने में गोलियां बरसाकर मौत दे दी थी। उससे सारा हिन्दू-सनातन समाज स्तब्ध था। उनके त्याग और बलिदान को अंजाम तक पहुंचाने में उनके माता-पिता और बहन का असीम योगदान रहा। इसके बाद कोठारी बंधुओं की बहन पूर्णिमा कोठारी ने उनके अधूरे कार्य को अपनाया और उसमें सहभागी बनीं। इस समय उनकी मनोदशा भी बहुत अधिक भाव विह्वल थी, लेकिन उन्हें भव्य, दिव्य और नव्य अयोध्या में श्रीराम के लला के विराजने से परमानंद और गर्व का अहसास भी हो रहा था।

बैकुंठपुर, भव्य अयोध्यापुरी में श्रीराम लला की प्राण प्रतिष्ठा समारोह के ये सजल दृष्टांत बरबस ही सनातनियों और दुनिया के लोगों को अपनी ओर आकृष्ट कर रहा था। भारत देश के मित्र देशों की जनता ही नहीं धुर विरोधी राष्ट्रों के लोगों का दिल भी भारत की धरा को धन्य, धन्य कह रहा था। यही राम की माया है। यही राम हैं, भारत के प्राण हैं, यही श्रीराम हैं, यही मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीरामचंद्र हैं। यही है राम से बड़ा राम का नाम। यही भारत के राम हैं। यही केवट के राम हैं। यही शबरी के राम हैं। यही भक्त हनुमान के श्रीराम हैं। यही जय श्रीराम हैं।

रामचंद्र कृपालु भज मन हरण भवभय दारुणं।

नवकंज लोचन कंज मुखकर कंज पद कंजारुणम्।।

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