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बांग्ला उपन्यास “अरब के बद्दू” 24… “अंतिम”/ “स्वाधीन अरब”: सुदेवी गौड़

बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू

लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त

 अनुवादिका 

श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए.

साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

सन 1963 में प्रकाशित

—– गतांक से आगे–

बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहाl

इतने वर्ष पूर्व प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया थाl

घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहा है l उसी संदर्भ में आज अंतिम अर्थात चतुर्विंशति अध्याय प्रस्तुत हैl

 आत्म निवेदन

      विदुषी एवं प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़, जो सौभाग्य से मेरी मातुश्री हैं, के लेखन के कुछ अंशों को पुनः अनुसंधान करके तथा ढूंढ करके घूमता आईना के माध्यम से प्रकाशित कर पाना संभव हुआ l

काल के गर्त में बहुत कुछ विलुप्त हो जाता है l

यद्यपि व्यक्तिगत रूप से मेरा दोष नहीं है किंतु मैं स्वयं को व्यक्तिगत रूप से दोषी मानता हूं कि उनके प्रचुर लेखन का एक अत्यल्प अंश ही मैं बहुत प्रयास करने के बाद सुधि पाठक जनों के अनुरंजन हेतु प्रकाश में ला पाया l

जैसा कि मैंने कहा काल की अवधि के नीचे बहुत कुछ दब जाता है l

उसी प्रकार से उनके लेखन का एक बहुत बड़ा अंश दृष्टि से विलुप्त हो गया है l

यद्यपि मैं प्रयासरत हूं कि उसका भी अनुसंधान करके साहित्यिक संसार के समक्ष प्रस्तुत करूं l

यदि मैं ऐसा कर पाया तो अत्यंत आत्म संतोष की अनुभूति मुझे प्राप्त होगी l तात्कालिक रूप से मैं अपनी मां को , उनके इस अवदान को संसार के समक्ष प्रस्तुत करने के रूप में, भावांजलि अर्पित करता हूं l

इसके अतिरिक्त “घूमता आइना” के प्रधान संपादक श्री स्नेह मधुर , जो मेरे बहुत आत्मीय हैं , ने इस कार्य को करने में जो परिश्रम किया है उसके लिए हार्दिक धन्यवाद एवं साधुवाद के पात्र हैं l

मैं उनके समग्र रूप से उज्जवल भविष्य की मंगल कामना करता हूं जिसके अंतर्गत उनका यह विशेष पोर्टल घूमता आईना भी समेकित है l

यदि ठाकुर जी की इच्छा हुई तो माता जी के कतिपय अन्य साहित्यिक कृति गुण के साथ आप सभी से पुनः भेंट होगी l

ll जय श्री कृष्ण ll

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

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 चतुर्विंशति (24) अध्याय

स्वाधीन अरब

फैसल की भविष्यवाणी पूर्ण रूप से सफल नहीं हुई। सेना ने पुनः यात्रा आरम्भ की। वे पहले डेरा पर दखल करके बाद में दमिश्क की ओर जायेंगे, यही स्थिर हुआ । एक बार यदि तुर्कों के द्वारा सुरक्षित डेरा पर अधिकार हो जाय तो अन्य ओर अग्रसर होने में बाधा नहीं पड़ेगी।

जमील और उसके साथी डेरा की ओर बढ़ने लगे। दूर से दिखाई देनेवाला आकाश जैसे धुएँ से ढका था। जितना ही वे आगे बढ़ने लगे उतना ही एक अस्वाभाविक दृश्य आकर उनके हृदय को भाराक्रांत करने लगा। यहाँ आकर फैसल से उन्हें मालूम हुआ कि तुर्क क्रमश: पराजित होकर हटते जा रहे हैं। ये लोग डेरा पहुँच गये और ब्रिटिश सेना के साथ मिल गये। उनके साथ जमील भी था। डिक की इच्छा नहीं थी कि उसका परिचय प्रकाशित हो। इस बार अन्तिम युद्ध प्रारम्भ हुआ।

मरुभूमि के विशाल विस्तार के बीच सर्प की तरह बल खाता रेल का रास्ता चला गया है। दाहिनी ओर छोटी-छोटी पहाड़ियों की पंक्ति चली गई थी और उस पहाड़ के सामने और पीछे तीन हजार से अधिक सेना पड़ी थी। यह सारी तुर्की सेना थी। वह युद्ध में पराजित होकर भाग रही थी।

डिक यह अद्भुत दृश्य देखकर आश्चर्य कर रहा था। तुर्कों के समान सुसज्जित सैनिक दल को अरब जैसे लोगों ने, जो गन्दे अच्छी पोशाक न पहननेवाले एवं अस्त्र शस्त्रों से सज्जित नहीं थे, किस प्रकार पराजित किया, यह वह समझ नहीं पा रहा था। डिक ने जमील की ओर देखा l जमील युद्ध के लिए व्यग्र हो उठा था। इन भगोड़े तुर्कों पर कैसे आक्रमण किया जाय ? उसने अपने ऊँट की पीठ पर से बन्दूक आकाश की ओर उठाई। उसके बाद डिक की ओर देखकर बोला- मैं सच कहता हूँ सर्दार, यह वही दल है जिसने हमारा पीछा किया था। जमील के बाद ऊँटों का दल था। उन ऊँटों पर बद्दू लम्बे-लम्बे बर्छे लेकर शत्रु पर आक्रमण करने को तैयार थे और टाल्ला – टाल्ला कहकर विकट स्वर से युद्ध का नारा लगा रहे थे ।

तुर्क अचानक मुड़कर खड़े हो गए । जो भाग रहे थे उन्हें तुर्की सेनापति लोग गोली मार रहे थे ।

भयंकर स्वर से तुर्कों के पक्ष की तोप गरजने लगी। अरब सैनिक कुछ समय के लिए हतबुद्धि हो गये। डिक और जमील ने असाधारण धैर्य के साथ अचानक बिगड़ी हुई परिस्थिति को देखकर अरबों को पीछे हटने का आदेश दिया। डिक जिस पोड़े पर चढ़कर युद्ध कर रहा था वह गोली से आहत होकर गिर पड़ा। बेहोश डिक बालू पर गिर पड़ा। कुछ क्षणों के लिए नहीं बल्कि प्राय: घंटे भर वह जमीन पर पड़ा रहा ।

नीरव अन्धकारमयी रजनी l आकाश में इक्के-दुक्के तारों को छोड़कर और कुछ दिखाई नहीं देता था। चारों ओर नीरव निस्तब्धता छाई हुई थी l डिक को जब होश आया तो उसे लगा मानो दोनों पैर अचल हो गये हैं, पैरों के ऊपर एक मरा घोड़ा पड़ा है। वह सिर में असह्य यंत्रणा का अनुभव कर रहा था। उसने ध्यान से देखा, उसका सिर एक मरे ऊँट की छाती पर था। चारों ओर लाशें स्तूपाकार पड़ी थीं।

अन्धकार में मुर्दे खानेवाले पशु-पक्षियों की आँखें आग के समान जल रही थीं। दो गिद्ध एक लाश के निकट परस्पर पंखों से लड़कर झगड़ा कर रहे थे। उसके काफी निकट एक श्रृगाल एक लाश का हाथ कड़कड़ करके चबा रहा था ।

डिक का हृदय भय और विस्मय से सिहर उठा। उसे लगा, इस भीषण रण क्षेत्र में एकमात्र मैं ही जीवित प्राणी हूं l और सभी मृत्यु के ग्रास बनकर न जाने किस देश में चले गये हैं। डिक सोच रहा था कि मैं पृथ्वी के इस पार हूं या उस पार l

अकस्मात् वह किसी शब्द से चौंक उठा। पीछे फिरकर देखा कि एक अरब है। उसके बाद ध्यान से देखा कि अरब नहीं, तुर्क है। वह अपनी तलवार निकालकर मारने आ रहा है। डिक ने मृत्यु के उस काले देश में अपने को असहाय समझकर देखा कि तुर्क और कोई नहीं, स्वयं रशीद- बे है।

तुर्की सेनापति किस प्रकार यहाँ आया, यह बात वह समझ ही नहीं सका। जिस दुर्द्धर्ष व्यक्ति ने जिबार और हाजाब शहर को नष्ट किया, अरबों के सैकड़ों गाँवों को जला कर नष्ट कर दिया, उसके साथ इस मुर्दों के राज्य में डिक का सामना हो गया l

इसी समय एक बद्दू ने आकर रशीद-बे पर पीछे से आक्रमण कर दिया ।

रशीद- बे फिर उठकर खड़ा हुआ किन्तु उसके आत्मरक्षा के लिए तैयार होने के पहले ही उस अरब ने रशीद- बे की छाती में छुरा भोक दिया। नितांत निष्ठुर के समान उसने एक बार नहीं, दो बार रशीद-बे के ऊपर चोट की। साधारण एक करुण चीत्कार ! उसके बाद चारों ओर रक्त की धारा बहने लगी। रशीद-बे ने हमेशा के लिए आँखें बन्द कर लीं।

थोड़ी देर के बाद विस्फोट का शब्द आकाश और वायु में प्रतिध्वनित हो उठा । डिक ने अचानक आकाश की ओर देखा—- जैसे किसी ने आकाश में आग लगा दी है।

चलो दमिश्क की ओर चलें। किसी ने परिचित स्वर में उससे कहा l डिक ने मुड़कर देखा जमील तीक्ष्ण दृष्टि से उसकी ओर देख रहा है । अरबों और तुर्कों के साथ जिस समय युद्ध चल रहा था उस समय जमील कहाँ अन्तर्ध्यान हो गया, यह डिक न जान सका ।

डिक और जमील दोनों ही इस युद्ध में बहुत आहत हो गये थे; फिर भी वे दूसरे दिन रणक्षेत्र से दो घोड़े ले करके दमिश्क की ओर रवाना हुए।

इतने दिनों से डेरा शहर तुर्कों और जर्मनों के अधिकार में था। तुर्क और जर्मन शहर छोड़ने के समय शहर को बिलकुल बर्बाद कर गये थे ।

अरबों के इस स्वाधीनता संग्राम में जिन्होंने योग दिया था वे आज कितने प्रसन्न हैं । विजय का गौरव तिलक आज विधाता ने उनके ललाट पर लगा दिया। आज वे तुर्को के अधीन नहीं हैं। आज अरब अपने देश का शासन स्वयं करेंगे। यह कैसा आनंद है ।

डिक दमिश्क शहर देखकर मुग्ध हो गया। सचमुच यह अरब की एक स्वप्नमयी नगरी थी। चौड़ी-चौड़ी सड़कें मस्जिदें, मीनार, हरी-भरी लताएँ, फूल-फलों से भरे उद्यान आदि से इस नगरी ने सभी को मुग्ध कर लिया। विजय उत्सव से आज नगरी ने अपूर्व शोभा धारण की है। रास्ते रास्ते में पताकाएँ उड़ रही हैं, फूलों की मालाएँ शोभा पा रही हैं। जयध्वनि करते-करते नागरिक चारों ओर फिर रहे हैं।

स्वाधीनता ! विजय ! स्वाधीनता ! रास्तों से विजयी सैनिक वीर गर्व से चल रहे थे । भारतीय सैनिक, अरब की विभिन्न जातियों के सैनिक, बद्दू, अँगरेज, उपनिवेशों के सैनिक सब पंक्तियाँ बनाकर रास्ते में चल रहे थे। बाजे बज रहे थे । अश्वारोही और ऊँटों के सवार सैनिक रंग-बिरंगी टोपियों और पोशाक पहने, सैनिकाध्यक्ष लोग मोटर गाड़ी पर सवार हो इस जलूस के पीछे-पीछे चल रहे थे।

सबके पीछे एक मोटर में सफेद पोशाक पहने एक सज्जन जा रहे थे l चेहरे से मालूम होता था कि वे अँगरेज हैं। सूर्य की प्रखर किरणों से उनका मुँह काला हो गया था। ये धीर-गम्भीर भाव से रास्ते के दोनों ओर की घनी जनता की ओर कौतूहल से देख रहे थे और बीच-बीच में जनता की आनन्द-ध्वनि के बीच आदरपूर्वक हंसकर अभिवादन स्वीकार करते जा रहे थे।

डिक सोच रहा था, ये सज्जन कौन है, जिनके लिए सारे अरब देश के लोग ऐसी श्रद्धा प्रदर्शित कर रहे हैं। उसे याद आई, उस हाजाज पहाड़ की बात l अपने विपत्ति के सहायक कासिम की याद आई , और जमील ! वह सौभाग्य से आज भी जीवित है l उसके मन में एक और प्रश्न जाग उठा l कैसा है वह शक्तिधर, जिसकी असाधारण शक्ति के प्रभाव से अरबों के समान दुर्द्धर्ष जाति आज एकता में बंधकर एक बन गई ।

डिक की आँखें अश्रुसिक्त हो गई। उसके मन में आज चाचा की और कासिम की याद विशेष रूप से आ रही थी। डिक सोच रहा था, वह जो इतनी विपत्तियों के बाद भी आज जीवित है, इसमें पता नहीं विधाता की क्या इच्छा है। अब मैं क्या करूंगा l

उसे याद आया उस पहाड़ में झरने की धारा के पास रुपयों का संदूक छिपा आया हूँ। वहाँ एक बार जाने से ही उस गुप्त धन को लाया जा सकता है। किन्तु उसके बाद ?

वह मस्तक हिलाने लगा। खेल समाप्त हो चुका था। जो उस समय बालक वे इस युद्ध के तूफान को पार करते हुए आज युवक बन गये हैं। जमील उसके निकट एक सफेद घोड़े पर बैठा था राजपथ के दोनों ओर से स्त्रियाँ फूलों की वर्षा कर रही थी। गुलाबपाश से गुलाबजल उनके ऊपर छिड़का जा रहा था। सभी के कंठ से एक ही आवाज निकल रही थी – जय, जय, स्वाधीनता की जय !

जनता के विजय-नाद से डिक की नस-नस में रक्त की ऊष्ण धारा धारा प्रवाहित हो रही थी। उसके मन में जो भी अशान्ति एवं वेदना सघन हो गई थी, वह न जाने कहाँ चली गई। उसे लगा इतने दिनों का एक महत् कार्य पूर्ण हो गया। दीर्घ रात्रि के अवसान के बाद आज सूर्य जैसे नवीन आलोक से चारों ओर चमक रहा है । सारी पृथ्वी पर आज आनंद की धारा प्रवाहित हो रही है।

दमिश्क की विशाल मस्जिद के मीनार से मधुर स्वर में अपूर्व वाणी ध्वनित हो रही थी—- ईश्वर महिमामय है। वह मनुष्य के लिए मङ्गल-विधान करता है। वह नियति का सहायक और पृथ्वी पर सभी का एकमात्र अवलम्बन और आश्रय है। ऐ दमिश्क निवासियो । आज तुम उस ईश्वर का गुणगान करो।

ईश्वर की कृपा और तलवार की अपूर्व शक्ति से अरबों ने शत्रु पर विजय प्राप्त की; स्वाधीनता की अमृत धारा से अभिषेक हुआ।

अरब के बद्दू उपन्यास की पूर्व काल से घूमता आईना में निरंतरता में चली आ रही श्रृंखला आज विश्राम ले रही है l

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