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बांग्ला उपन्यास “अरब के बद्दू” 12: “एक बड़े दुःख की खबर”: सुदेवी गौड़

बांग्ला उपन्यास अरब के बद्दू

लेखक श्री योगेंद्र नाथ गुप्त

 अनुवादिका 

श्रीमती सुदेवी गौड़ एम.ए., साहित्य रत्न, साहित्यालंकार

सन 1963 में प्रकाशित

—– गतांक से आगे–

बांग्ला में लिखित यह पुस्तक “अरब बेदुइन” अरब प्रायद्वीप में तुर्की के उस्मानिया या ऑटोमन साम्राज्य की अधीनता से मुक्त होने की तड़प के कारण होने वाले स्वातंत्र्य युद्ध की पृष्ठभूमि पर आधारित है l इसमें तुर्कों के विरुद्ध अरबों की स्वतंत्र होने की तड़प दिखाई देती है l जिसमें अरब के बद्दुओं का विशेष योगदान रहाl

इतने वर्ष पूर्व प्रयागराज की वयोवृद्ध साहित्यकार श्रीमती सुदेवी गौड़ ने इस पुस्तक का अत्यंत उपयुक्त एवं सजीव अनुवाद कार्य संपन्न किया था l

घूमता आईना में इस उपन्यास का श्रृंखलाबद्ध रूप से निरंतरता में प्रकाशन होता रहेगा l उसी संदर्भ में आज द्वादश अध्याय प्रस्तुत है l

द्वादश अध्याय

एक बड़े दुःख की खबर

उस रात उन्होंने ध्वंसप्राय नगरी के एक ओर, पहाड़ की तलहटी में, तंबू लगाये। उन्होंने जिबार के ऊपर किस प्रकार विजय प्राप्त की, यही बात सबसे अधिक आश्चर्यजनक लग रही थी। शहर में तुर्कों के आग लगा देने से शहर जलकर राख का ढेर हो रहा था l

डिक् तम्बू के अन्दर एक गलीचे पर बैठा था l उसकी बगल में जमील, कासिम और नाछुरी का एक प्रधान मुखिया बैठा था। उसका नाम था इब्नाहाल l उन लोगों के पीछे हाथ में चाँदी का दीपक लिये एक गुलाम खड़ा था । और सामने कितने ही कागज और मानचित्र पड़े थे। डिक् को केवल अपना खोया हुआ नक्शा ही नहीं मिला बल्कि और भी अनेक कागजात मिल गये। तुर्की सेना किस प्रकार आगे बढ़ेगी और किस प्रकार माल और रसद लाई जायगी, ये सब बातें इन कागजों में पाई गई।

डिक् एक मानचित्र देखकर कह रहा था कि मदीना शरीफ अभी तक शत्रुओं के हाथ में है। हेजाज के रेल मार्ग के बहुत से भाग पर उन्हीं का दखल है। मदीना से सौ मील पश्चिम में स्थित येंगबो बन्दर अंगरेजों के हाथ में है। लारेन्स इस समय बिल्ली प्रदेश के उरेज बन्दरगाह की ओर गये हैं। वहाँ से प्रायः चार पाँच सौ मील रास्ता चलकर आकाबात आयेंगे। यदि वे सिरिया की मरुभूमि को निरापद पार कर सके तो दमिश्क आ पहुँचेंगे।

जमील बोला- यदि हम लोग बहुत तेजी से चलें तो भी बीस रोज से पहले लारेन्स के निकट पहुँचना सम्भव नहीं है l

डिक बोला मैंने ठीक हिसाब लगाकर नहीं देखा है। फिर भी मैं समझता हूँ कि इस समय हमारा लारेन्स के पास सीधे जाना ठीक नहीं l जमील रोककर बोला— क्यों, बतलाओ तो।

डिक् बोला- तुम्हारी इच्छा हो तो जा सकते हो। तुर्की के हाथ में जो रेल का रास्ता है उस पर मैं दखल करना चाहता हूँ l यदि खूब साहसी और युद्ध में दक्ष सौ व्यक्ति मिल जायें तो इस संकल्प में सफलता मिल जायगी । बात यह है कि यदि हम रेल मार्ग हाथ में ले लेंगे तो तुर्कों की सेना, रसद आदि उत्तर से इधर न लाई जा सकेगी।

जमील भीत स्वर से बोल उठा किन्तु सर्दार, मैं तुम्हारे साथ रहूँगा ।—’मैं भी’ कासिम बोला l

डिक बोला—जैसी तुम्हारी इच्छा l हमारे साथ हमारे मित्र इब्नाहाल नाछुरियों के नेता और चुने हुए सौ योद्धा होंगे। तुर्कों के साथ बहुत-सी तोप बन्दूकें आदि और शिक्षित सेना है।

जमील बोला- तुम्हें हमारे दल से सौ चुने हुए योद्धा मिल जायेंगे। कब रवाना होना चाहते हो ?

डिक् बोला- कल खूब सुबह मैं रेल के रास्ते पर दखल करने जाऊँगा मेरी इस व्यवस्था से किसी का विरोध तो नहीं है ?

काफी रात तक सलाह-मशविरा होता रहा। दूसरे दिन सुबह जब वे अपने लक्ष्य की ओर बढ़ रहे थे, जमील बोला- एक दुखद संवाद है सरदार ।

डिक् व्यग्र भाव से बोला—- क्या है वह दु:खद समाचार ?

जमील बोला—- पता लगा है कि मृत व्यक्तियों में रशीद – बे नहीं है। डिक हँसकर बोला—- तो वह भाग गया।

जमील क्रुद्ध स्वर में बोला— बच्चू अधिक दूर नहीं जा पायेंगे। मरुभूमि के रास्ते में कहीं न कहीं खोज लेंगे।

सूर्य की किरणों से चमकता हुआ रेल का रास्ता ऐसा लग रहा था कि एक लम्बा-सा साँप टेढ़ी-मेढ़ी चाल से चल रहा है। उस रास्ते के दोनों ओर पर्वत- श्रेणी थी। उस पहाड़ पर पेड़-पौधा कुछ भी नहीं था। मरुभूमि की प्रकृति ने वहाँ के पहाड़ों को भी अनुर्वर और डरावना बना दिया था। डिक एक स्थान पर ऊंट से उतरा। उतरकर वह उस स्थान की जाँच विशेष रूप से करने लगा।

डिक बोला— यह जगह ठीक है। जमील ने आश्चर्य से उसके मुंह की ओर देखा । वह जैसे उसकी बात ठीक से समझ नहीं सका था। आजकल के समय में युद्ध भी वैज्ञानिक हो चला है। पुराने समय की तरह परस्पर आमने-सामने लड़ना युद्ध का ढंग नहीं रह गया है। मरुभूमि का निवासी जमील, चिरकाल से अरब के प्रचण्ड सूर्य के तेज से दीप्त मरुभूमि की छाती पर जीवन काटता आ रहा है। वह नहीं जानता था कि अरब के बाहर भी पृथ्वी है, मनुष्य है, विज्ञान है एवं विज्ञान नये-नये आविष्कार कर रहा है। पश्चिम के युद्ध की, बम फेंक कर रेलगाड़ी का रास्ता नष्ट करने की बात वह नहीं जानता था।

संगी बद्दू एक के बाद एक ऊँट पर बैठे आ रहे थे। वे सूर्य के प्रखर प्रकाश से अपनी आँखों को बचाने के लिए हथेली से आँखें ढक कर दूर से नहीं समझ पा रहे ये कि डिक यहाँ क्यों रुका है। बद्दू लोग समझ गये थे कि यह बालक उम्र में छोटा होते हुए भी मानों एक जादूगर है।

जिबार छोड़कर आये उन्हें काफी दिन हो चुके थे। नाछुरी के निवासी बद्दू उनका साथ छोड़कर चले गये थे। सम्भव है, इतने दिनों में इब्नाहाल के साथ लॉरेंस की मुलाकात हो गई हो। डिक् ज्यादा शीघ्रता से आगे नहीं बढ़ रहा था। वह सोच रहा था कि इन बुद्धिमान साहसी’ बलवान् बद्दुओं को किस प्रकार मशीनगन आदि चलाना सिखाया जाय ।

इतने दिनों से मन में जो गुप्त इच्छा थी उसके पूर्ण होने का सुयोग उपस्थित हो गया l अरब के एक स्थान का नाम एजेरा है। यह जगह अच्छी है। यहाँ की मिट्टी में विस्फोटक पदार्थ सरलता से छिपाया जा सकता है। चारों ओर छोटे बड़े पहाड़ है। इससे सहसा शत्रुपक्ष की दृष्टि में आने की कोई सम्भावना नहीं। डिक ने जमील से कहा इस पहाड़ के चारों ओर लोगों के ठहरने की व्यवस्था करो। पहाड़ पर, जगह-जगह, मशीनगने लगानी होंगी, इस प्रकार से कि शत्रु आगे पीछे जिधर से भी आये, उसी ओर से उसको रोका जा सके ।

जमील रोककर बोला- ‘शत्रु! यहाँ शत्रु आयेंगे कहाँ से ? तुम मशीन गनों से आकाश की ओर मार करोगे क्या ?” उसने अपने दोनों हाथ आकाश की ओर उठाकर दिखलाया ।

डिक हँसकर बोला- तुम जिस बात को असम्भव समझकर हँसी में उड़ा देते हो देखना, उसके विपरीत बात होगी।

जमील अपने सरदार डिक का आदेश पालन करने को तैयार हो गया।

कासिम तथा और भी कई बद्दू उसका साथ देने लगे। उन लोगों ने कार्य आरम्भ कर दिया। कार्य कठिन था। मिट्टी के अन्दर सुरंग खोदकर उसमें विस्फोटक इस प्रकार रक्खे जायेंगे जिससे किसी को सन्देह न हो। जिस मिट्टी के ऊपर से रेल की पटरी थी वह कठोर और शिलाओं से पूर्ण थी। इसलिए विस्फोटकों को छिपाने में बहुत समय लगा l विस्फोटकों के साथ संयुक्त तार को पहाड़ के एक गुप्त स्थान में छिपा दिया। उसके ऊपर मिट्टी डाल दी। इस प्रकार रेल के रास्ते के नीचे विस्फोटकों को पूर्ण रूप से गाड़ करके, वे पहाड़ पर वहाँ जाकर बाट जोहने लगे, जहाँ उन्होंने तम्बू लगा रक्खे थे कि रेल आने पर वहाँ की क्या हालत होती है।

रात हुई किन्तु ट्रेन के आने का कोई लक्षण दिखाई नहीं दिया l तम्बू के अन्दर किसी ने भी आग नहीं जलाई l प्रत्येक घाटी में उपयुक्त साहसी प्रहरी नियुक्त कर दिये जिससे किसी प्रकार की विपत्ति की सम्भावना देखते ही उन्हें संवाद मिल सके l उस रात डिक आराम से सोया। दूसरे दिन सुबह उसे लगा कि उससे एक गलती हो गई है।

कैसा भीषण स्थान है मरुभूमि का यह भाग l कहीं भी जीवन का चिह्न नहीं है। रेल के रास्ते की ओर देखकर उसे लगा कि इस रास्ते से ट्रेन का आना-जाना नहीं होता l तब क्या इधर से ट्रेन नहीं आयेगी ?

धीरे-धीरे दिन चढ़ने लगा। असह्य उत्ताप, दुर्दान्त बद्दू उत्साहित होकर बैठने के बजाय कुछ करने को व्यग्र हो रहे थे ।

उन्हें सचमुच झक – झक शब्द करते एक इंजन के आने का शब्द सुनाई दिया । एक प्रहरी यह शब्द सुन निशाना साधने लगा। डिक् उठकर खड़ा हो गया। वह उत्सुकता से गाड़ी के आने की प्रतीक्षा करने लगा। पहाड़ की ओट में से उसने देखा कि इंजन तीव्र वेग से ऊपर से नीचे उतर रहा है। वह जिस जगह खड़ा था उससे थोड़ी ही दूरी पर रेल की लाइन का मोड़ था। कुछ क्षण के लिए इंजन दृष्टि से ओझल हो गया l

डिक घबराकर चारों ओर देखने लगा। वह सोचने लगा कि यदि मेरा अनुमान गलत हुआ तो ?

यह चिन्ता उसने जबर्दस्ती मन से निकाल दी। उसने जिस प्रकार से कई विस्फोटकों को रेल के रास्ते में रखने को कहा था उसी प्रकार यदि रक्खे गये हैं तो उनके व्यर्थ होने की सम्भावना बहुत कम है । उसके दल के लोग इस प्रकार छिपे थे जिससे गाड़ी के यात्री उन्हें किसी प्रकार नहीं देख सकते थे। सहसा इंजन की सीटी का कर्कश स्वर निस्तब्ध पहाड़ में चारों ओर प्रतिध्वनित हो उठा ।

अब डिक को इंजन दिखाई दिया। बिल्कुल पुराने ढंग की बनावट की गाड़ी थी। इंजन चलानेवाले के डिब्बे में तीन सैनिक दिखाई दे रहे थे। साथ की गाड़ी में से निकली बन्दूकों की नली स्पष्ट दिखाई दे रही थी। डिक् समझ गया कि यह सैनिक गाड़ी है। जहाँ उन्होंने विस्फोटक लगा रक्खे थे वहाँ गाड़ी आई l डिक के शीघ्रतापूर्वक विद्युत् यंत्र का बटन दबाते ही भीषण धड़ाका करता हुआ विस्फोटकों का स्फोट हो गया। इंजन शून्य में उड़ गया। बालू और पत्थर चारों ओर तीव्र वेग से छिटक कर गिरने लगे। इंजन में से लोहे के पत्तर और पहिये चारों ओर बिखरकर उड़ने लगे।

पुनः वज्र का सा धड़ाका हुआ ! और एक बम फट गया। कुछ क्षणों तक धुएँ के अतिरिक्त कुछ नहीं दिखाई दिया । आवाज गूँजकर समाप्त हो गई। फिर देखा गया कि इंजन एक ओर पड़ा है। इंजन के पीछे बँधे डब्बे टूट-फूटकर चूर-चूर हो गये हैं । नष्ट हुई गाड़ी के अन्दर से लोग बाहर निकलने के लिए पागल के समान चिल्ला रहे हैं। किन्तु बाहर कौन निकले ? किसी की छाती में लोहे की छड़ घुस गई है, किसी का हाथ कट गया है और बहुत से बम छूटने के साथ ही मिट्टी के नीचे दब गये हैं।

केवल एक डिब्बा खड़ा था। उस डिब्बे से लोग बाहर निकल रहे थे। वे बंदूक लिये हुए मरुभूमि के रास्ते में उन्मत्त के समान भाग रहे थे। इसी समय जमील ने अपने दल के लोगों को संकेत किया।

पलक मारते ही दो मशीनगनें गरजने लगीं, साथ ही निरुपाय सेना छिन्न-भिन्न होकर चिरकाल के लिए बालू में विश्राम करने लगी।

कैसा बीभत्स था यह दृश्य l किन्तु इसी का नाम है युद्ध l तुकों के साथ निर्बल अरब किस प्रकार जूझ सकते ? केवल कौशल से ही वे इस बार विजयी हुए।

अरब इस विजय में ऐसे उन्मत्त हो गये कि अपने शिविरों से बाहर निकल आये— बन्दूकें और तोपें वहीं पड़ी रह गई। हाथ में तलवार लेकर वे गाड़ी की ओर जाने लगे। उन्होंने समझा कि जिस प्रकार गाड़ी में तोप- बन्दूक आदि युद्ध का सामान है उसी प्रकार रुपये-पैसे भी हैं।

जमील ने व्यग्र होकर पूछा- क्या हम नीचे उतरें ?

डिक् ने रोका। दुर्दान्त बद्दू वेग से घटना स्थल की ओर चले गये ।

उन्होंने लूटना आरंभ कर दिया। वे आनन्द से चिल्लाने लगे। लगता है, १०-१२ आदमियों से अधिक इस दुर्घटना में नहीं बचे थे। वे मरुभूमि की ओर भाग रहे थे किन्तु दुर्दान्त बद्दू विजयोल्लास में इतने उन्मत्त थे कि उन्होंने किसी को भी नहीं बचने दिया।

जमील ने प्रसन्न दृष्टि से डिक् की ओर देखा। उसकी आँखें आनन्द से चमक रही थीं। उसने कहा- अल्लाह हमारा सहायक हो ! हम इस प्रकार विजयी होंगे यह हमने सोचा भी नहीं था। हमारे साथ इस समय भी काफी बम हैं।

डिक बद्दुओं की लूट-पाट देख रहा था। लोग ऊँटों के ऊपर बोझे पर बोझा रखते जा रहे थे। डिक ने कहा— कैसा अन्याय है। यह सब सामान कहाँ जायेगा ? किस प्रकार ले जायेंगे ? मेरे साथ तो ले चलने की सुविधा होगी नहीं l

जमील हँसकर बोला—बेचारों को जरा आनन्द करने दो सर्दार । उसी समय उन्होंने देखा कि कासिम, दो बद्दुओं की सहायता से, एक भारी बक्स को खींच रहा है। कासिम के सिर पर तुर्की टोपी है। वह जोर-जोर से वाह वाह कर रहा था। जमील ने पूछा—बात क्या है ?

‘कासिम आनन्द से हाथ-पैर हिलाकर जमील की ओर देखकर बोला— शेख ! सोना, सोना, सोना देख रहे हो कितना भारी है ?

कासिम का अनुमान गलत नहीं था। बक्स को तोड़कर देखा गया कि उसमें नीचे, थैली में स्वर्ण मुद्राएँ भरी थीं। इतना धन कि इसको देकर अन्य कबीलों को अपनी ओर मिलाया जा सके।

डिक कुछ नहीं बोल रहा था। वह गम्भीरता से बद्दुओं के कार्य को देख रहा था। वह स्तब्ध हो गया। यह क्या आश्चर्य है ?

इसी समय दूर से पुनः इंजन की सीटी सुनाई दी। सङ्ग- सङ्ग देखा गया कि तीव्र-वेग से एक गाड़ी आ रही है।

डिक् दो हाथ पीछे हट गया। वह कम्पित स्वर से बोला- फिर गाड़ी आ रही है। यदि इस गाड़ी में सेना हुई तो ?

जमील ने माथा हिलाया। उसने शीघ्रता से अपनी तलवार की मूठ पर हाथ रक्खा। बद्दू इधर-उधर बिखरे हुए थे। मशीनगन के निकट कोई आदमी नहीं था । ऊँट भय से चीत्कार करते भाग रहे थे l यदि सचमुच इस गाड़ी के अन्दर सेना हुई तो क्या होगा?

दूसरे क्षण गाड़ी मोड़ को पार करके एक स्थान पर आकर खड़ी हो गई।

इंजन के पीछे बड़े-बड़े डिब्बे थे। गाड़ी के जंगलों में से बन्दूक की संगीनें धूप की किरणों में झिलमिल कर रही थीं। l

शेष आगामी अंक में—–

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