
“धर्म गुरु” आसाराम को एक बार फिर निराशा ही मिली !
वरिष्ठ पत्रकार के. विक्रम राव Twitter ID: @Kvikramrao

सर्वोच्चय न्यायालय ने फिर एक बार प्रवचक आसाराम बापू की जमानत याचिका पर सुनवायी कल (18 नवंबर 2022) टाल दी। अगली सुनवाई दो माह के बाद होगी। नौ वर्षों से कारागार में हैं। सातवीं बार उनकी जमानत की मांग खारिज हुई, हालांकि आसाराम के पक्षकार भारत के बड़े नामी-गिरामी विधिवेक्ता हैं। कहा जाता है कि इन लोगों के कोर्ट मे पेश होने मात्र से आधा मुकदमा यूं ही जीता माना जाता है।
इनमें रहे स्व. राम जेठमलानी, डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी, पूर्व कांग्रेसी सांसद केटीएस तुलसी, मुकुल रोहतगी, सिद्धार्थ लूथरा, सोली सोरबजी, पूर्व कांग्रेसी मंत्री सलमान खुर्शीद, तथा सबके शीर्ष में थे, वकील यूयू ललित, पूर्व प्रधान न्यायाधीश। इक्यासी वर्षीय इस हिंदू धर्मगुरु पर नाबालिग से रेप का आरोप है। आसाराम के राष्ट्रव्यापी प्रशंसकों में हैं : अटल बिहारी बाजपेयी (नृत्य करते चित्र देखें)। लालचंद किशिनचंद आडवाणी, कमलनाथ और दिग्विजय सिंह, मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री इत्यादि।
जोधपुर न्यायाधीश श्रीमती निर्मलजीत कौर की अदालत में सुनवाई के दौरान अभियोजन पक्ष की ओर से (1 अक्टूबर 2013) आरोप लगाया गया था कि आसाराम बाल यौन शोषण (पीडोफीलिया) नाम की बीमारी से ग्रस्त हैं। साक्षियों की गवाही अधूरी थी अतः इस मुद्दे को देखते हुए जज ने आसाराम की जमानत याचिका खारिज कर दी थी।
आसाराम को जोधपुर जेल की सींखचों के पीछे पहुंचाने वाले अधिवक्ताओं में खास रोल था : सरकारी अधिवक्ता (रिटायर्ड) प्रमोद कुमार वर्मा तथा उनके सहायक वकील पीसी सोलंकी। एक वक्तव्य में सोलंकी ने कहा : “जब जोधपुर कोर्ट में फैसला सुनाकर जज उठे तो लोग मुझे बधाइयां देने लगे। मेरा गला रुंध गया था। मैं वकील हूं, मुकदमे लड़ना, कोर्ट में पेश होना मेरा पेशा है। लेकिन जिंदगी में आखिर कितने ऐसे मौके आते हैं, जब आपको लगे कि आपके होने का कोई अर्थ है। उस क्षण मुझे लगा था कि मेरे होने का कुछ अर्थ है। मेरा जीवन सार्थक हो गया।”
वकील सोलंकी ने कहा कि : जब जज का निर्णय उनके पक्ष में आया और आसाराम दोषी करार दिया गया, “तो मेरी आंखों के सामने पीड़िता बालिका का चेहरा घूम गया। उनकी कौटुंबिक दशा सुनकर हर एक स्तंभित हो जाएगा। जब मैंने आसाराम के खिलाफ पीड़िता की तरफ से यह मुकदमा लड़ने का फैसला किया तो बहुत धमकियां मिलीं। पैसों का लालच दिया गया। तमाम कोशिशें हुईं कि किसी भी तरह मैं ये मुकदमा छोड़ दूं। लेकिन हर बार मुझे वह दिन याद आता, जब पीड़िता के पिता पहली बार मुझसे मिलने कोर्ट आए थे। साथ में वो लड़की थी। बेहद शांत, सौम्य और बुद्धिमान। उसकी आंखें गंभीर थीं और चेहरे पर बहुत दर्द। पिता बेहद निरीह थे, लेकिन इस दृढ़ निश्चय से भरे हुए कि उन्हें यह लड़ाई लड़नी ही है। मैं यह लड़ाई इसलिए लड़ पाया क्योंकि पीड़िता और उसका परिवार एक क्षण के लिए अपने फैसले से डिगा नहीं। लड़की ने बहुत बहादुरी से कोर्ट में खड़े होकर बयान दिया। जिस दिन 2014 में वकालतनामे पर मै ने साइन किया, उस दिन के बाद से यह मुकदमा ही मेरी जिंदगी हो गया।”
आसाराम से जुड़ी हुई एक निजी घटना भी मुझे याद आ गयी। अहमदाबाद संस्करण (टाइम्स ऑफ इंडिया) में तब मैं रिपोर्टर था। हवाई जहाज से दिल्ली होता हुआ लखनऊ घर जा रहा था। प्रथम पंक्ति में सीट मिली। बगल वाली सीट पर धवल परिधान धारण किये श्वेत दाढ़ी-केश वाले साधु आसाराम विराजे थे। देवतुल्य लगे। बड़ी प्रभावी शक्ल थी। मेरी प्रथम भेंट थी, पर नाम कई बार सुना था। उन्होंने मुझे अपने दिल्ली प्रवचन में आमंत्रित भी किया। तभी अचानक हमारा जहाज जोधपुर हवाई अड्डे पर उतरा, जबकि अहमदाबाद से दिल्ली की सीधी उड़ान थी। मुझे कौतूहल हुआ, पर पाइलेट ने बताया कि : “बापू” (आसाराम का उपनाम) को प्रतीक्षारत शिष्यों को दर्शन देना है।” एक रिपोर्टर की छठी इंद्रिय कौंधी। मैं उनके प्रवचन में नहीं गया। दिल को गवारा नहीं था। बल्कि उनके “धर्म” से ही मेरा कर्म तमाम हो जाता। इतना दिमागी उद्वेलन तो मुझे आपातकाल में भारत की पाँच जेलों मे बिताये वक्त भी नहीं हुआ था। मैं समझ गया कि दुनिया से भी ऊपर वालों तक “बापू” पहुंच रखता होगा। मैं ठहरा अदना रिपोर्टर, श्रमजीवी पत्रकार, और यूनियन कार्यकर्ता। क्या बिसात मेरी ? अब जाकर सारा माजरा समझा।
आखिर क्या पृष्ठभूमि है आसूमल सिरुमलानी हरपलानी की ? सिंध के नवाबशाह जिले के बेराणी गाँव, जो अब पाकिस्तान में है, में जन्मे (17 अप्रैल 1941) वे थाऊमल सिरूमलानी के आत्मज हैं। भारत विभाजन के बाद वे और उनका परिवार अहमदाबाद में बसा। बड़ा आर्थिक संकट था। आजीविका के लिए थाऊमल ने शक्कर विक्रय व्यवसाय आरम्भ किया। उनकी मृत्यु के बाद अपनी माँ से आसूमल ने ध्यान और आध्यात्मिकता की शिक्षा प्राप्त की। घर छोड़कर, देश भ्रमण पर निकल पड़े। स्वामी श्री लीलाशाहजी महाराज के आश्रम नैनीताल चले गये। वहां लक्ष्मी देवी से विवाह कर लिया जिससे उनके एक पुत्र नारायण साईं और एक पुत्री भारती देवी हुए। नैनीताल में गुरू से दीक्षा लेने के बाद गुरु ने नया नाम दिया आसाराम। घूम घूम कर आध्यात्मिक प्रवचन के साथ-साथ वे स्वयं भी गुरु-दीक्षा देने लगे। उनके सत्संग कार्यक्रमों में श्रद्धालु भारी संख्या में पहुँचने लगे।
“बापू” के रसूखदार मित्रों ने उनको जेल से बचाने मे बड़ी कोशिश की थी। डॉ. सुब्रमण्यम स्वामी ने कहा भी कि आसाराम को सुनियोजित षडयंत्रपूर्वक जेल भिजवाया गया है। उन्होने तत्कालीन गृहमंत्री राजनाथ को बताया भी था कि “बापू” को जेल में डालना व्यर्थ होगा।
आसाराम को 25 अप्रैल 2018 बुधवार को जोधपुर की विशेष अदालत ने आरोपी मानते हुए दोषी करार दिया गया। इस फैसले के बाद जोधपुर की सुरक्षा कड़ी कर दी गई है। सजा के खिलाफ हाई कोर्ट में याचिका दायर की गई है जिसको हाई कोर्ट ने भी सुना था। अब सुप्रीम कोर्ट जनवरी मे जमानत याचिका पर निर्णय लेगा।
K Vikram Rao
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