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श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (4): “दुर्गम दैत्य के वध से मेरा नाम दुर्गा देवी”

श्री दुर्गा सप्तशती कथा तत्व (4)

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दुर्गा सप्तशती एक अद्भुत तंत्र ग्रंथ है l जो भगवती की उपासना हेतु संकेंद्रित है l इसके सुचिंतित पाठ से आत्म चैतन्य की शक्ति प्राप्ति होने के साथ लौकिक हितों की पूर्ति भी होती है l

 किसी ग्रंथ की आंतरिक ऊर्जा तथा रहस्यात्मकता को समझने के पूर्व उसकी विषय वस्तु का ज्ञान होना अत्यंत अनिवार्य है l

सप्तशती व्यक्ति की ऊर्जा को गति प्रदान करते हुए निराशा से आशा की दिशा में गति का संकेत भी प्रदान करती है l

इसी उद्देश्य से उसके मूल संदर्भों का इस निरंतरता के साथ इस चतुर्थ एवं अंतिम अंक में दिग्दर्शन करने का प्रयास करूंगा l


परम पूज्य संत आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज

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भक्ति व मोक्ष की प्रदायक हैं भगवती l भगवती के विविध रूपों का वर्णन एवं प्रत्येक बाधा से मुक्ति का मार्ग है।

श्री दुर्गा सप्तशती एकादश अध्याय

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  एकादश अध्याय स्तुतिः 

मैं भगवती भुवनेश्वरी का ध्यान करता हूँ l उनके श्री अंगों की शोभा प्रभात कालीन सूर्य के समान है। मस्तक पर सुशोभित चन्द्रमा के मुकुट के साथ वह तीन नेत्रों से युक्त हैं। उनकी मंद स्मित छवि है तथा हाथों में वरद अंकुश पाश और अभय मुद्रा शोभा पाते हैं।

मेधा ऋषि कहते हैं महा दैत्य शुंभ के वध के उपरांत इंद्र आदि देवता अग्नि को आगे करके भगवती कात्यायनी की स्तुति करने लगे। उन्होंने कहा ‘भगवती तुम चराचर जगत की अधीश्वरी हो। समस्त जगत का एकमात्र आधार तुम अनंत वैष्णवी शक्ति होने के साथ तुम्हारा परामाया स्वरूप समस्त जगत को मोहित करता है। सम्पूर्ण विद्याएँ तुम्हारा स्वरूप है, जगत की समस्त स्त्रियाँ तुम्हारी ही मूर्तियाँ हैं ।

आचार्य अमिताभ जी महाराज इलाहाबाद

तुम्हारे विराट स्वरूप की हम क्या स्तुति कर सकते हैं। तुम सर्वमंगल प्रदान करने वाली नारायणी, कल्याणदायीनि, शिवा तथा समस्त पुरुषार्थों को सिद्ध करने वाली त्रिनेत्रा गौरी हो । तुम्हारा ब्रह्माणी, माहेश्वरी, कौमारी, वैष्णवी, शक्तिरूपा, नारायणि, वाराही, नारसिंही, शिवदूती, चामुण्डा स्वरूप समस्त विश्व का मंगल एवं कल्याण करने के कारण प्रणाम योग्य है।

तुम समस्त भयों से हमारी रक्षा करो। हे कात्यायनि, हे भद्रकाली, हे चण्डीके हम तुम्हारी शरण चाहते हैं। तुम प्रसन्न होने पर सब विकारों को नष्ट कर देती हो तथा कुपित होने पर मनोवांक्षित कामनाओं का नाश करती हो।

हे विश्वेश्वरी जो तुम्हारी शरण में रहते हैं वह सदैव विपत्ति से रहित रहते हैं। समस्त विश्व की पीड़ा दूर करने वाली हे भगवती हम तुम्हारे चरणों में पड़े हैं l प्रसन्न होकर सबको वरदान प्रदान करो।’

 भगवती ने कहा ‘तुम्हारा इच्छित वरदान मैं प्रदान करूँगी।’ तब देवता बोले ‘हे सर्वेश्वरी तुम इसी प्रकार तीनों लोकों की बाधा शांत करते हुए हमारे शत्रुओं का नाश करती रहो।’ 

भगवती ने कहा ‘वैवश्वत मनवंतर के 28वें युग में उत्पन्न शुंभ-निशुंभ नाम के दो अन्य महादैत्यों का वध मैं नंद गोप के घर उनकी पत्नी यशोदा के गर्भ से उत्पन्न होकर विंध्याचल में निवास करते हुए करूँगी।

उन्होंने अपने अनेक स्वरूपों का वर्णन करते हुए कहा वैप्रचित्त नामक दानवों का भक्षण करते हुए मेरे दाँत अनार के फूल की तरह लाल हो जाएँगे तब मुझे रक्त दंतिका कहा जाएगा। 

फिर पृथ्वी पर सौ वर्षों से लिए वर्षा रुकने पर जल का अभाव हो जाएगा। तब अयोनिजा रूप से उत्पन्न मेरे स्वरूप को सताक्षि कहा जाएगा। उस समय मैं अपने शरीर से उत्पन्न शाकों द्वारा संसार का पोषण करूँगी । अतः मुझे शाकंभरी कहा जाएगा l 

उसी अवतार में दुर्गम नामक दैत्य का वध करने के कारण मेरा नाम दुर्गा देवी होगा।

 जब मैं भीम रूप धारण करके हिमालयस्थ राक्षसों का वध करूँगी तब मेरा नाम भीमा देवी होगा। 

अरुण नामक दैत्य का वध करने के लिए मैं छह पैरों वाले भ्रमरों का रूप धारण करूँगी तब लोग मुझे भ्रामरी कहेंगे।

 इस प्रकार जब भी संसार में दानवी बाधा उत्पन्न होगी तब अवतार लेकर मैं शत्रुओं का संहार करूंगी।’ 

श्री दुर्गा सप्तशती द्वादश अध्याय

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द्वादश अध्याय स्तुति:

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मैं त्रिनेत्रा दुर्गा देवी का ध्यान करता हूँ, जिनके श्री अंगों की शोभा विद्युत के समान है। सिंह के कंधे पर बैठी माँ दुर्गा की सेवा में हाथ में तलवार और ढाल लिए अनेक कन्याएँ खड़ी हैं। उनके हाथों में चक्र, गदा, तलवार, ढाल, धनुष बाण हैं। अग्निमय स्वरूप से युक्त माता चन्द्रमा के आकार का मुकुट धारण करती हैं।

भगवती ने कहा, देवताओं जो व्यक्ति मधु-कैटभ, महिषासुर, शुम्भ निशुम्भ के वध के प्रसंग का पाठ करेंगे तथा अष्टमी – चतुर्दशी और नवमी को एकाग्र होकर भक्तिपूर्वक मेरे महात्म्य का पाठ करेंगे l वे प्रत्येक आधि-व्याधि तथा विपत्तियों से मुक्त रहेंगे। बाल ग्रहों से आक्रांत बालकों के लिए यह महात्म्य शांति कारक है।

शरद काल में की जाने वाली वार्षिक पूजा में मेरे इस महात्म्य का जो भक्ति पूर्वक पाठ करता है वह मेरे प्रसाद से हर बाधा से मुक्त तथा धन-धान्य से सम्पन्न होगा।

पुष्प अर्घ्य, धूप-दीप, गंध आदि से पूजन करने, ब्राह्मण भोजन कराने, होम करने से मुझे जितनी प्रसन्नता प्राप्त होती है उतनी प्रसन्नता इस महात्म्य के श्रवण करने से हो जाती है।

यह स्तुतियाँ कल्याणमयी बुद्धि प्रदान करती हैं। शत्रु का प्रभाव समाप्त होता है।

मेधा ऋषि ने कहा, यह कहकर प्रचण्ड पराक्रमी भगवती चण्डिका कहीं अंतरधान हो गई। तो समस्त देवता भी प्रसन्न होकर अपने अधिकारों का पालन करने लगे। हे राजन सुरथ ! भगवती इसी प्रकार से प्रत्येक स्थिति का कारण हैं, मूल हैं तथा गतिशील करने वाली प्रेरणाशक्ति हैं। भक्ति के अभ्युदय के समय माता भक्तों में प्रविष्ट होकर उन्नति का मार्ग प्रदान करती है अभाव के समय दरिद्रता बनकर विनाश का कारण बनती है।

श्री दुर्गा सप्तशती त्रयोदश अध्याय 

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त्रयोदश अध्याय स्तुति:

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जो उदय काल के सूर्य मंडल की क्रांति से युक्त हैं, जिनकी चार भुजाएँ और तीन नेत्र हैं तथा जो अपने हाथों में पाश, अंकुश, वर और अभय की मुद्रा धारण करती हैं l उस शिवा देवी की मैं आराधना करता हूँ।

 मेधा ऋषि कहते हैं भगवान विष्णु की माया स्वरूपा रूप भगवती के द्वारा ही सभी को मोहित किए हुए हैं और आगे भी मोहित होंगे। अतः उन्हीं परमेश्वरी की शरण में जाओ। आराधना करने पर वहीं मनुष्यों को भोग, स्वर्ग और मोक्ष प्रदान करती हैं।

 मेधा मुनि के द्वारा निर्दिष्ट किए जाने पर राजा सुरथ तथा समाधि वैश्य ने देवी सूक्त का पाठ करते हुए भगवती की घोर आराधना प्रारम्भ की।

तब प्रसन्न होकर भगवती चण्डिका ने प्रकट होकर कहा मैं तुम्हें अपेक्षित शक्ति प्रदान करूंगी।

तब राजा ने इस जन्म में शत्रुओं की सेना को नष्ट करके पुनः राज्य प्राप्त करने का वरदान माँगा तथा दूसरे जन्म में कभी नष्ट न होने वाला राज्य माँगा, जबकि वैश्य ने ममता और अहंकार रूपी आसक्ति नष्ट करने वाला ज्ञान माँगा।

देवी ने कहा कि राजन थोड़े ही दिन में तुम्हारे हाथ तुम्हारा खोया हुआ राज्य होगा। मृत्यु के बाद तुम भगवान सूर्य की कृपा से जन्म लेकर इस पृथ्वी पर शरणि मनु के नाम से विख्यात होंगे। उन्होंने वैश्य को भी अपेक्षित वर प्रदान किया। मार्कण्डेय जी के अनुसार इस क्रिया के उपरांत देवी अम्बिका अंतर्ध्यान हो गईं।

ll शुभम भवतु कल्याणम ll  

    ll सर्वे भवंतु सुखिनः ll

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