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‘बीता जमाना बचपन का’ वाया दशहरा: राहुल द्विवेदी

‘बीता जमाना बचपन का’ वाया दशहरा

राहुल द्विवेदी

लेखक भारत सरकार में अवर सचिव हैं


त्यौहार अब उदास कर जाते हैं । अक्सरहाँ नई-नई ज्ञान विज्ञान की बातें सुनने को मिल ही जाती हैं, कमोवेश हर त्यौहारों पर..नए-नए वाद-प्रतिवाद ….नई-नई विचारधाराएँ !

एक वह भी दौर था जब त्यौहार मन में उत्साह भरते थे । एक त्यौहार खत्म हुआ नहीं कि दूजे के बारे में सोचने लगते । दशहरा हमें बहुत पसंद था, कारण इलाहाबाद (अब का प्रयागराज) की गलियाँ, सड़कें सजावटी झालरों, लाउडस्पीकरों से कई दिनों पहले से ही सजने लगते थे । हम बच्चों की टोली स्कूल से घर तक पहुँचने में अक्सर लेट हो जाते थे क्योंकि मौका मुआयना शुरू हो जाता था कि मुन्ना स्वीट भंडार के सामने लाइटिंग अच्छी लग रही कि रसराज के पास कि लेबर चौराहे पर ज्यादा बेहतर है कि जमुना स्वीट हाउस की…? बस यहीं तक की अपनी दुनिया होती थी ।

अब लगता है कि वो बचपना निश्छल था, सारी दुनियावी प्रपंच से दूर …..इसीलिए विह्वल हो रो पड़ते थे हम । लक्ष्मण जी को शक्ति लग गई तो तब तक चुप नहीं होते जब तक कि संजीवनी ले हनुमानजी आ नहीं जाते …!

अल्लापुर में रहते थे, वहाँ की रामलीला पर अपना हक था। माँ अपनी सहेलियों के साथ और हम अपनी सेना के साथ । पर हम लोगों का रामलीला दर्शन कम ही होता। कुछ गिने चुने प्रसंग, जैसे कि धनुष भंग के बाद की परशुरामी, लक्ष्मण जी द्वारा की गई चुहल —

नाथ संभु धनु भंज निहारा/होहिहैं कोउ एक दास तुम्हारा

फिर परशुराम का तड़कना, भड़कना । फिर लक्ष्मण का मुस्करा कर कहना

इँहा कुम्हण बतिया कोई नाहीं ….।

(इसका असर ये होता था कि गाँव जाकर खेतों में प्रैक्टिकल किया जाता था, वह भी इस तरह कि खेतों में कोहड़े की बतियाओं को तर्जनी उँगली दिखा भाग आते … फिर लुके छिपे मौका-मुआयना होता कि कौन कौन सी बतिया मुरझा गईं ? फिर सलाह होता कि लक्ष्मण सहियै कहले रहन देखा मर्दे …। कोई बुद्धिवादी बालक जब बोलता कि चुप रहता मर्दे उ वाला त ना मुरझाइल तो पहले उसे गुस्से से देखा जाता और फिर उसे समझा ही दिया जाता कि उसे तर्जनी नहीं दिखाई थी .. आस्था और विश्वास तर्कों से परे होते हैं और यही विश्वास ही तो जीने का रास्ता दिखाते हैं शायद….है न…)

फिर हनुमान जी की कलाकारी रही हो या शबरी के मीठे बेर , या फिर राम जी का वन वन सीता मइया को ढूढ़ना । कई कई बार तो हम रोने लगते भाव विभोर होकर…. तो “हे बानर तू कौन है?” .. पर हनुमानजी की तरह उत्साहित हो जवाब देने के लिये तत्पर ….याकि रावण हमारा भी उतना ही शत्रु….। अब लगता है कि वो बचपना निश्छल था, सारी दुनियावी प्रपंच से दूर …..इसीलिए विह्वल हो रो पड़ते थे हम । लक्ष्मण जी को शक्ति लग गई तो तब तक चुप नहीं होते जब तक कि संजीवनी ले हनुमानजी आ नहीं जाते ….। बड़ी छोटी सी दुनिया थी, पर पाक साफ थी…..।

एक और आकर्षण होता था वह था दशहरे के बाद कवि सम्मेलन । छुटपने से कवियों और कविताओं में एक अजीब सा आकर्षण । तब से जब शायद शब्दों को समझने की कूबत भी न रही हो ।

एक प्रसंग याद आता है । सन 1980 या 81 का साल रहा होगा । उस बार अल्लापुर कवि सम्मेलन के मुख्य आकर्षण श्री श्याम नारायण पांडेय जी थे । बाबू जी अमृत प्रभात में सीनियर सब या चीफ सब थे शायद उस समय। पत्रकार होने के नाते और मोहल्ले के कई नामचीनो से परिचित होने के कारण जो कि रामलीला कमेटी के मेंबर भी थे , कवि सम्मेलन का वी आई पी पास मिल जाता था । ( मेरे जूनियर हाई स्कूल तक आने से पहले तक वो पास बाबू जी किसी न किसी को भेंट कर दिया करते थे । उसके बाद तो उन पासों पर मेरा कब्जा रहा जबतक मैं इलाहाबाद में रहा….. आज भी दशहरा इस मामले में बहुत मिस करता हूँ पता नहीं आज भी कवि सम्मेलन होता है या नहीं ..) । तो , बाबू जी ड्यूटी से आये, मैं बेखबर सो रहा था । मुझे उठाये, कहे चलो कवि सम्मेलन चलते हैं । दर्जा दो या तीन में पढ़ता रहा होऊंगा । कवि सम्मेलन की तो क्या जानू पर घूमने के मौके को छोड़ना कहीं से भी श्रेयस्कर नहीं सोच चल पड़ा । रामलीला मैदान पूरा भरा हुआ था तिल रखने की भी जगह नहीं । उतनी भीड़ मुझे नहीं याद आता कि किसी राजनैतिक रैलियों में भी रहती होगी जहाँ किराए पर भीड़ बुलाये जाते हैं । बाबूजी के पास पर माताश्री पहले ही वीआईपी स्टैंड में जा चुकी थीं अपनी किसी सहेली के साथ । बाबूजी मुझे लेकर बाउंड्रीवाल पर बैठ गए । श्यामनारायण पांडे जी का काव्य पाठ शुरू होने वाला था।

अपरम्पार जनसमूह कोलाहल कर रहा था , कई लोग कुर्सियों पर खड़े हो गए ,मुझ अकिंचन को दिखना बन्द हो गया । बाबूजी ने मुझे अपने कंधे पर बैठा लिया (जबकि उनका दाहिना कंधा कमजोर था और दो- तीन बार उस कंधे का बाउल डिसलोकेट हो चुका था..)। छोटे कद के श्यामनारायण बाबू ने , धोती कुर्ता पहने सर पर खादी की टोपी लगाए , जब “रण बीच चौकड़ी भर भर कर …” शुरू किया तो कोलाहल का जो दुंदुभिनाद हुआ कि लगा हम हल्दी घाटी पहुँच गए । फिर पाण्डे जी ने “राणा प्रताप सिर काट काट/करता था सफल जवानी को ” शुरू किया , तो सबके चिल्लाहट भरी उत्तेजना में मैं भी भूल ही गया कि मैं बाबू जी के कंधे पर बैठा हूँ …….खैर !!

अब समय बदल गया है मेरे बेटे दशहरे के मेले के नाम पर पिज्जा-बर्गर खाना पसंद करते हैं । और हम भी अपने पिता होने की कर्तव्यपूर्ति कर उन्हें यह सब खिला ही देते हैं । झूले झूल लिए , सेल्फियां ले लीं , बस हो गया मेला …।

अब न तो वो दौर रहा …न ही अपनी संततियों को कई घण्टे तक कंधे पर बिठा पाने का हौसला । हम उस पीढ़ी में आ गए हैं जहाँ हर त्यौहार प्रश्न के साथ हमारे बीच आते हैं । और हम बुद्धिवादी उसी पर तर्क वितर्क कर खुद को बड़ा और दूजे को छोटा साबित कर अपना त्यौहार मना लेते हैं । यदि तर्क वितर्क बढ़ गया तो हमारे पास “ब्लॉकास्त्र ” तो हइये है और तुर्रा यह कि यह दौर बहुत गलीच हो गया है असहिष्णुता बढ़ गई है …यू नो…!!

…… दशहरा के बहाने बहुत कुछ याद आ गया । राम बारात में निकलने वाली चौकी । चौकियों की लाइटिंग का फुल प्रदर्शन । हमारी तफ़रियाँ । दुर्गा पंडालों तक की धमा चौकड़ियाँ । बचपने में घूम आये कुछ झाकियां ताजी हो गई और रावण को मुँह चिढ़ाने की बदमाशियां भी । घंटो का वह तर्क वितर्क भी कि राम जी हमे देख मुस्कराए थे …साथ मे यह भी उस दरोगा ने तुम्हें धकियाया था ।
…अक्सर , त्यौहारों के बीत जाने के बाद उसका उजड़ापन बहुत सालता था …वहाँ की वीरानियाँ कचोटती थीं । पर अब तो त्यौहारों का आना उदासी लाता है । डर लगता है कि अब त्यौहार ही समरसता नहीं, कोई नया विवाद लेकर ही न आ जाए …। बीती सदी के अस्सी के ही दशक में, उसी अल्लापुर के कवि सम्मेलन में एक कवि आये थे अंजान । उनकी एक  तुकबंदी अनायास ही याद आती है, अकसर ही,
अल्लापुर का मंच देखो दशहरा हो गया
रावण मरा मगर घर-घर उसका पहरा हो गया …।’

सचमुच कितने तो रावण हैं हम सब में ! उस युग में तो बस एक ही रावण था …। न जाने कितने राम की जरूरत पड़ेगी …….!

#दशहरे-दीपावली_की_शुभकामनाएं

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