आचार्य अमिताभ जी महाराज
गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि तुम किसी भी प्रकार से मुझे भजना प्रारंभ करो। मैं तुमको किसी न किसी रूप में अवश्य प्राप्त हो जाऊंगा, अर्थात ईश्वर का नाम तो लेना प्रारंभ करो भले ही किसी कामना से, किसी लालसा से, किसी सुख की अपेक्षा से लेकिन उस नाम को लेते-लेते एक समय ऐसा आएगा जब वह नाम ही अस्तित्व में रह पाएगा और तुम्हारे हृदय से कामना विषयक समस्त इच्छाएं और अपेक्षाएं अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे।
“भक्ति का तात्पर्य”: 1

हम सभी अपने जीवन में बहुत सारे उतार-चढ़ाव का सामना करते हैं। कभी हम प्रसन्न होते हैं, कभी हम विषाद ग्रस्त होते हैं। कभी हम अपनी भावनाओं को अन्यों के साथ बांटते हैं तथा कई बार कतिपय विवशताओं के कारण हम उन्हें अपने हृदय में ही समेटे रखते हैं।
इन समस्त परिस्थितियों में किसी न किसी प्रकार से यदि हम अनुभव करें तो हम ईश्वर की दिशा में उन्मुख होते हैं क्योंकि हमारे भावों की अभिव्यक्ति को जिस प्रकार से हम अपने इष्ट देव के समक्ष प्रकट कर सकते हैं वैसा हम किसी के भी समक्ष प्रकट करने की स्थिति में नहीं होते क्योंकि ईश्वर का हमसे कोई स्वार्थ का संबंध नहीं होता जबकि संसार में प्रत्येक संबंध के पीछे किसी न किसी प्रकार का कोई न कोई हित तो अस्तित्व अवश्य रखता है।
जिस प्रकार से व्यक्ति अपनी मां की गोद में सिर रखकर के रोता है तथा अपनी भावनाओं की अभिव्यक्ति करते हुए संसार के कष्टों से स्वयं के मुक्त होने की प्रार्थना करता है या इसको दूसरे शब्दों में कहें तो समस्त संसार के कष्टों को वह यह मानकर मां की गोद में अपना सिर छुपा लेता है कि वहां पर वह उसको कष्ट प्रदान नहीं करेंगे और मां भी उसको अपने अंक में समेट लेती है। उसी प्रकार से अपने भक्ति भाव के वशीभूत होने के उपरांत ठाकुर जी जब व्यक्ति के भाव का परीक्षण करते हैं तो वह उसको सहज ही स्वीकार करते हैं।
किंतु यहां पर एक बात समझने की बहुत आवश्यक है कि भक्ति करने का तात्पर्य कष्ट से मुक्ति नहीं है, भक्ति करने का तात्पर्य संसाधनों से युक्त होना नहीं है अपितु अपने कार्यों को करते हुए उनके दूषित प्रभावों से मुक्त होने में तथा जीवन के उतार-चढ़ाव के प्रभाव से व्यक्तित्व के खंडित हो जाने की स्थिति को भक्ति के द्वारा निवृत्त किया जा सकता है।
यह अत्यंत जटिल मनोवैज्ञानिक विषय है जिसके कतिपय सूत्रों के संदर्भ में कुछ चर्चा करने का आज प्रयास करूंगा शास्त्रों में भक्तों एवं भक्ति के अनेकानेक भेदों एवं वर्गीकरण की चर्चा की गई है। श्रीमद भगवत गीता में आर्त, अर्थआर्थी, जिज्ञासु एवं ज्ञानी चार प्रकार के भक्तों का उल्लेख किया गया है। प्रथम तीन श्रेणियों के भक्तों को बहुत महत्वपूर्ण नहीं माना गया है अपितु चतुर्थ श्रेणी का भक्त साक्षात ईश्वर की आत्मा के रूप में ही स्वीकार किया गया है। क्योंकि जब व्यक्ति किसी प्रकार के कष्ट से पीड़ित होता है, अस्वस्थ होता है या जीवन की प्रतिकूलताओं का सामना करता है और उस से मुक्त हो जाने की उत्कट इच्छा के कारण ईश्वर भक्ति करता है तब अर्थ की कामना से युक्त भक्त होता है। इसी प्रकार से जब व्यक्ति इस लोक या परलोक के किसी आनंद को, किसी भोग को, किसी सुख को प्राप्त करने के लिए भक्ति करता है तब वह अर्थ की कामना से युक्त भक्त होता है। यह दोनों ही भक्ति राजसी भक्ति के वर्गीकरण के अंतर्गत आती हैं। वास्तव में तो भगवान की भक्ति में किसी प्रकार की कामना का लेश मात्र भी नहीं होना चाहिए क्योंकि फिर तो वह एक प्रकार का प्रतिदान युक्त व्यापार ही हो जाएगा।

किंतु फिर भी शास्त्र कहते हैं और स्वयं गीता में भगवान श्रीकृष्ण ने कहा है कि तुम किसी भी प्रकार से मुझे भजना प्रारंभ करो। मैं तुमको किसी न किसी रूप में अवश्य प्राप्त हो जाऊंगा, अर्थात ईश्वर का नाम तो लेना प्रारंभ करो भले ही किसी कामना से, किसी लालसा से, किसी सुख की अपेक्षा से लेकिन उस नाम को लेते-लेते एक समय ऐसा आएगा जब वह नाम ही अस्तित्व में रह पाएगा और तुम्हारे हृदय से कामना विषयक समस्त इच्छाएं और अपेक्षाएं अपने आप ही समाप्त हो जाएंगे।
जो व्यक्ति ईश्वर के स्वरूप को समझने के लिए जिज्ञासु भाव से उनकी दिशा में उन्मुख होता है तथा यह आग्रह करता है कि जब तक मैं उसको न समझ लूं तब तक उसका भजन कैसे करूं वह इन दो उपर्युक्त श्रेणियों से तो श्रेष्ठ होता है किंतु ईश्वर के वास्तविक स्वरूप के साथ तादात्म्य स्थापित न कर पाने के कारण वह श्रेष्ठ वर्गीकरण के अंतर्गत नहीं आता है।
मैं यहां पर आप सभी का ध्यान श्रीमद्भागवत के एक सूत्र की और आकर्षित करना चाहता हूं। श्रीमद्भागवत का स्पष्ट संकेत है कि जब आप अपनी इंद्रियों से और मंत्रों के माध्यम से परमात्मा का अनुसंधान करना चाहेंगे तो आपको जड़ तत्व की प्राप्ति होगी। जब आप बुद्धि के आश्रय से विचार करके उसका अनुसंधान करेंगे तो शून्य तत्व की प्राप्ति होगी।
जब श्रद्धा के साथ, अपने भाव के साथ, उसका अनुसंधान करेंगे, तब ईश्वर की प्राप्ति होगी और जब अनुभव के द्वारा अनुसंधान करेंगे तब अपने आत्म चैतन्य में व्याप्त अनुभव स्वरूप आत्मा ही अद्वितीय रूप से परमात्मा के रूप में सिद्ध होगा। क्योंकि वासुदेव तो हृदय में ही निवास करते हैं। वह हमारी साधना के अनुपात में हम को प्रकाशित करने का प्रयास निरंतर करते हैं। अतः जो जिस दृष्टि से आत्मा का अनुसंधानकर्ता है, उसे उसी रूप में परमात्मा की, परमात्मा तत्व की प्राप्ति होती है।
शुभम भवतु कल्याणम!

आचार्य श्री अमिताभ जी महाराज
941 530 85 09
E.Mail maharajshree19@gmail.com
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