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बिजनौर कांड: डीजीपी कोर्ट में तलब

 

विधि विशेषज्ञ जे.पी. सिंह की कलम से

बिजनौर कचहरी शूटआउट कांड

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने स्वत:संज्ञान लिया

डीजीपी-गृह सचिव की 20 को पेशी

“यूपी में अदालतें और जज सुरक्षित नहीं हैं तो आम जनता कितनी सुरक्षित होगी”

उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले की सीजेएम कोर्ट में हुए शूटआउट पर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए यूपी सरकार पर सख्त टिप्पणी की है और प्रदेश के डीजीपी ओपी सिंह और होम सेक्रटरी अवनीश अवस्थी को 20 दिसंबर को तलब किया है। हाईकोर्ट ने कहा है कि जब यूपी में अदालतें और जज सुरक्षित नहीं हैं तो आम जनता कितनी सुरक्षित होगी, इसका अंदाजा खुद ही लगाया जा सकता है । अगर यूपी सरकार सुरक्षा नहीं कर सकती है तो वह भी बताए, ताकि फिर केंद्र सरकार से सुरक्षा के लिए कहा जाए।बिजनौर की सीजेएम कोर्ट में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी योगेश कुमार के सामने आरोपी की गोलियां बरसाते हुए हत्या कर दी गई थी और जहाँ कोर्ट में भगदड़ मच गयी थी वहीं सीजेएम को जान बचाने के लिए मेज के नीचे छिपना पडा था ।
जस्टिस सुधीर अग्रवाल और जस्टिस सुनीत कुमार की विशेष पीठ ने सुनवाई के दौरान डीजीपी और होम सेक्रटरी से पूछा कि जिला न्यायालयों में सुरक्षा के लिए सरकार की क्या योजना है। पीठ ने पूछा कि अदालतों में सुरक्षा के चुस्त-दुरुस्त इंतजाम कैसे किए जाएंगे।
सीजेएम कोर्ट में शाहनवाज की पेशी का चर्चित मामला होने के बावजूद पुलिस की सतर्कता कम दिखी। इस बीच बिजनौर कोर्ट में फायरिंग के दौरान मारे गए शाहनवाज के दूसरे साथी जब्बार का अभी तक कुछ सुराग नहीं लग पाया है। हमले के दौरान वह कोर्ट से फरार हो गया था। पुलिस की कई टीम उसकी तलाश में बुधवार को भी जुटी हैं। उसके करीबियों, रिश्तेदारों और साथियों पर नजर रखी जा रही है।
पीठ ने इस मामले में बिजनौर के जिला जज की रिपोर्ट का भी संज्ञान लिया और इस मामले को पीआईएल के तौर पर सुनने का फैसला किया। पीठ ने इस मामले में चिंता जताते हुए इस घटना को निंदनीय बताया है और कहा है कि इससे क़ानून व्यवस्था व सुरक्षा को लेकर गलत संदेश गया है।

पीठ ने इस मामले में प्रोग्रेस रिपोर्ट के साथ यूपी के गृह विभाग के प्रिंसिपल सेक्रेट्री, डीजीपी और एडीजी लॉ एंड आर्डर के साथ ही बिजनौर के पुलिस अफसरों को बीस दिसम्बर को व्यक्तिगत तौर पर कोर्ट में मौजूद रहने को कहा है।अफसरों को कोर्ट में बिजनौर शूट आउट मामले में की गई कार्रवाई की प्रोग्रेस रिपोर्ट पेश करनी होगी। साथ ही अदालतों की सुरक्षा को लेकर उठाए जा रहे एहतियाती क़दमों की भी जानकारी देनी होगी। अफसरों को यह बताना होगा कि बिजनौर जैसी घटना दोबारा न हो इसके लिए अदालतों की सुरक्षा को लेकर क्या इंतजाम किये जा रहे हैं।पीठ ने बिजनौर की बार एसोसिएशन को भी अपना पक्ष रखने का सुझाव दिया है।

बिजनौर जिले की सीजेएम कोर्ट में हुए सनसनीखेज शूटआउट के मामले में पुलिस पर गाज गिरी है। कचहरी पुलिस चौकी बिजनौर को सस्पेंड कर दिया गया है। यहां चौकी इंचार्ज समेत 14 पुलिसकर्मी तैनात थे। इसके अलावा कोर्ट परिसर के आसपास तैनात चार अन्य पुलिस कर्मियों को भी निलंबित किया गया है। इन पुलिसवालों ने सुरक्षा में कोताही की और कचहरी जाने वालों की चेकिंग नहीं की गई।

बिजनौर के एक अदालत कक्ष के अंदर हत्या के आरोपी की गोली मारकर हत्या किए जाने के एक दिन बाद उत्तर प्रदेश पुलिस ने बुधवार को कहा कि उसने 18 पुलिस अधिकारियों को निलंबित कर दिया है।
यह घटना मंगलवार दोपहर तब हुई जब कैदी को बिजनौर जिला अदालत में मुख्य न्यायिक दंडाधिकारी के सामने पेश किया जा रहा था।तीनों आरोपियों ने अदालत कक्ष के अंदर अपनी पिस्तौलें निकालीं और अंसारी को गोली मार दी।,तीनों हमलावरों को अदालत के अंदर मौजूद पुलिसकर्मियों गिरफ्तार कर लिया।
28 मई को नजीबाबाद में प्रॉपर्टी डीलर हाजी एहसान और उनके भांजे शादाब की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। मामले में बिजनौर पुलिस ने कनकपुर निवासी शूटर दानिश और दिल्ली पुलिस ने इस गैंग के सरगना शाहनवाज और शूटर अब्दुल जब्बार को पकड़ा था। मंगलवार को तीनों को सीजेएम कोर्ट में पेशी पर लाया गया था, जहां पहले से परिसर में घात लगाकर बैठे शॉर्प शूटरों ने ताबड़तोड़ गोलियां बरसा दीं। फायरिंग में दो पुलिसकर्मी घायल हुए, जबकि बदमाश शहनवाज की मौत हो गई। मौका पाकर जब्बार और दानिश फरार हो गए।


उच्चतम न्यायालय ने इसके पहले 18 अक्तूबर 2019 को एक एनी मामले की सुनवाई में तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा था कि हम उत्तर प्रदेश सरकार से तंग आ चुके हैं। ऐसा लगता है यूपी में जंगलराज है। आखिर ऐसा क्यों होता है कि अधिकतर मामलों में यूपी सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास संबंधित अथॉरिटी का कोई उचित निर्देश नहीं होता। बुलंदशहर के सैकड़ों वर्ष पुराने एक मंदिर से जुड़े प्रबंधन के मामले की सुनवाई के दौरान पीठ ने यह टिप्पणी की।
जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली पीठ ने यूपी सरकार की ओर से पेश एडिशनल एडवोकेट जनरल से पूछा था कि क्या यूपी में कोई ट्रस्ट या सहायतार्थ ट्रस्ट एक्ट है? क्या वहां मंदिर व सहायतार्थ चंदे को लेकर कोई कानून है? यूपी सरकार के वकील ने कहा कि इस बात की उन्हें कोई जानकारी नहीं है।इस पर नाराज होकर पीठ ने कहा, ऐसा लगता है कि राज्य सरकार चाहती ही नहीं कि वहां कानून हो।

पीठ ने कहा, लगता है वहां जंगलराज है। हम यूपी सरकार से परेशान हो गए हैं। हर दिन ऐसा देखने को मिलता है कि सरकार की ओर से पेश वकीलों के पास उचित निर्देश नहीं होते हैं। फिर चाहें वह दीवानी मामला हो या आपराधिक। पीठ ने पूछा कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है?

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