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उत्तराखंड: “न पुलिस को किसी का भय और न ही पुलिस से किसी को भय !”

“लुभाती है हरिद्वार के घाटों की शांति और सुरक्षा”

Uttrakhand
“न पुलिस को किसी का भय और न ही पुलिस से किसी को भय !”

स्नेह मधुर
वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ

हमारे समाज में “खाकी वर्दी धारी व्यक्ति” यानी पुलिस की प्रशंसा करना वर्जित है। रोज़ पढ़े जाने वाले अखबार कमज़ोर वर्ग के खिलाफ पुलिस की ज्यादतियों और अत्याचारियों के पक्ष में पुलिस के नतमस्तक हो जाने की अनेक जीवंत कहानियों से भरे होते हैं, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया भी पुलिस की निरंकुशता की सजीव घटनाओं को चीख चीख कर बताता ही रहता है। फिल्मों में पुलिस हमेशा अत्याचार खत्म हो जाने के बाद पहुंचती दिखाई जाती है और सिनेमा हाल में मौजूद हर व्यक्ति पुलिस के प्रति ढेर सारी घृणा लेकर घर वापस लौटता है। यह सिलसिला वर्षों से दोहराया जा रहा है। एक अंतहीन सिलसिला है और उसमें कोई सुधार भी आता नहीं दिखता है। हालांकि मसाला फिल्मों के अलावा पुलिस केंद्रित फिल्में जो अब बनने लगी हैं, उनमें पुलिस के स्याह पक्ष के अलावा उनकी पेशेवर चुनौतियों को भी दिखाया जाने लगा है लेकिन आम जनता का तो चौराहे पर खड़ी पुलिस और एफआईआर लिखने वाली पुलिस से ही साबका पड़ता है और वही पुलिस की असली छवि होती है। विडंबना यह है कि जहां पुलिस न हो, वहां लोग अपराधियों से भयभीत दिखते हैं और पुलिस की मांग करते हैं, वहीं जहां पुलिस मौजूद होती है, वहां पर लोग पुलिस से ही डरते दिखते हैं और पुलिस हटाने की मांग करते हैं। यानी कमी पुलिस प्रणाली में नहीं है बल्कि उस व्यक्ति में है जो वर्दी पहनकर अपनी ड्यूटी को सही ढंग से अंजाम नहीं दे रहा है। या उसके अफसरों का भी दोष हो सकता है! अपराधी तो कुछ पलों में लूटकर चला जाता है लेकिन सामान्य आदमी पुलिस के चपेटे में आ गया तो शारीरिक, मानसिक, आर्थिक और सामाजिक अत्याचार से वर्षों जूझना पड़ सकता है, जान तक गंवानी पड़ सकती है।

एक न्यायाधीश ने भी कभी कहा था कि “पुलिस वर्दीधारी संगठित अपराधियों का गिरोह है”। इसीलिए काफी संख्या में लोग अपराध का शिकार होने के बाद भी न्याय के लिए थाने जाना पसंद नहीं करते हैं। इससे बेहतर वे किसी दूसरे अपराधी के शरणागत हो जाते हैं। मेरे ख़्याल से हमारे देश में पुलिस की यह आम छवि है। अगर पुलिस में आपकी जान पहचान नहीं है तो आपकी सुनवाई होना तो असंभव है, अपमानित होने की गारंटी ज्यादा है।

मैं उत्तर प्रदेश से हूं, कई प्रदेशों में वहां के लोगों के संपर्क में हूं। पुलिस अफसरों के साथ चीज़ों को समझने का भी भरपूर मौका मिला है। चार दशकों के अपने अनुभवों से मैंने भी यही सबकुछ जाना है। यहां तक कि सभी पुलिसकर्मी और अफसर भी मेरी बात से इत्तेफाक रखते हैं, बस सार्वजनिक रूप से कह नहीं सकते हैं।

उत्तर प्रदेश में श्रीराम अरुण नाम के एक डीजीपी हुआ करते थे। वे तो सार्वजनिक रूप से इसे मानते थे और पुलिसकर्मियों से अपील करते थे कि लोगों की मदद करो, अत्याचार मत करो, अपने थाने में तुम एफआईआर नहीं लिखोगे, तुम्हारे गांव में वहां की पुलिस तुम्हारे परिवार को परेशान करेगी। तुम यहां किसी को पीटोगे, तुम्हारे गांव में वहां की पुलिस तुम्हारे परिवार को पीटेगी।

मेरे एक मित्र सीबीआई में डीआईजी थे। उनके पास मेरठ के एक एसपी पहुंचे और अपना दुखड़ा रोया कि गाजियाबाद में उनके साले की गाड़ी चोरी हो गई और उनके कहने के बावजूद गाड़ी चोरी की रिपोर्ट नहीं लिखी गई। इस पर डीआईजी ने कहा कि तुम भी तो यही करते हो, तुम भी तो एफआईआर दर्ज नहीं करते! वह एसपी खामोश होकर रह गए। कहने का मतलब पुलिस विभाग काजल की कोठरी है और इस हमाम में सभी नंगे हैं और कोई हरिश्चंद्र नहीं बनना चाह रहा है। तो सुधार कैसे हो? सरकार भी पुलिस का उपयोग अपने अनैतिक कार्यों के लिए करती रहती है। 1861 के पुलिस ऐक्ट में संशोधन न होने के कारण पुलिस का दमनकारी रूप अभी भी ब्रिटिश काल की तरह ही यथावत है। राजनैतिक दलों का संकट यह है कि बिल्ली के गले में घंटी कौन बांधे? अगर पुलिस को वह अपना कुत्ता बनाकर नहीं रखेंगे तो पुलिस उन्हीं पर भौंकने लगेगी!

फिर भी कहीं जाओ तो चारों तरफ पुलिस ही दिखाई देती है और पुलिस को देखकर आपके भीतर सुरक्षा का भाव आ ही जाता है। चौराहे पर अगर पुलिस न दिखे तो लोग बेकाबू हो जाते हैं, सारे नियम कानून भूल जाते हैं। अगर चौराहे पर खड़ा पुलिस वाला जरा सा लापरवाह हो जाए या किसी के प्रति उदार हो जाए तो लोग उत्तेजित होने लगते हैं। असल में पुलिस से हमारी दोहरी अपेक्षाएं होती हैं। हमारे साथ वह सेवक की तरह व्यवहार करे और हमारे विरोधी के साथ क्रूरता की सारी सीमाएं तोड़ दे। इसलिए पुलिस को देखकर भय भी लगता है और सुरक्षित होने का भीना भीना अहसास भी होता है।

हरिद्वार मुझे पहली बार जाने का मौका मिला तो मैं यह देखकर चौंक उठा कि वहां पर खाकी वर्दी का कोई खास आतंक नहीं है। हरिद्वार उत्तराखंड में है जो उत्तर प्रदेश से अलग होकर नया प्रदेश बना है। उत्तर प्रदेश में तो हर जगह पुलिस ही पुलिस दिखती है जबकि उत्तराखंड में मुझे हर जगह पुलिस नहीं दिखाई पड़ी। हरि की पैड़ी पर, जहां हर पल हजारों श्रद्धालुओं का जमावड़ा लगा हुआ दिखाई पड़ रहा था, लोगों का आवागमन लगा हुआ था, वहां भी नाम मात्र की ही पुलिस दिख रही थी। सारे काम यंत्रवत होते जा रहे थे। लोग नहा रहे थे, पंडे अपने धार्मिक क्रिया कलापों में व्यस्त थे, पानी के अंदर पैसा ढूंढने वाले लोग गंगा की तलहटी में डुबकियां लगाकर लगाकर कीमती चीज़ें इकट्ठा करने में जुटे हुए थे। पुलिस चौकी में भी मात्र दो तीन पुलिसकर्मी ही मौजूद थे।

मैंने घाट पर लोगों से पूछा कि कहीं कोई मेटल डिटेक्टर नहीं लगा है, कहीं आने जाने पर कोई रोक टोक नहीं है, क्यों? लोगों ने बताया कि यहां पर ऐसी कोई जरूरत ही नहीं पड़ती है। शाम की विश्व प्रसिद्ध आरती के समय सिर्फ एक पुल को वीआईपी पुल बना दिया गया था जिसके स्टेप्स पर कुछ लोग बैठकर आरती का आनंद ले रहे थे। इस पुल पर कुछ पुलिसवाले और कुछ कमांडोज मौजूद थे जो पूरे क्षेत्र का जायज़ा ले रहे थे। बगल में ही वॉच टॉवर था और आरती स्थल के ठीक सामने मीडिया फोटोग्राफर्स के लिए थोड़ी सी ऊंचाई पर एक स्थान सुनिश्चित किया गया था। इसके चारों तरफ भीड़ ही भीड़ थी और इस भीड़ में कुछ नीली वर्दीधारी स्वयंसेवी लोग आरती की महिमा बताकर श्रद्धालुओं को अधिक से अधिक धनराशि चंदे के रूप में देने के लिए प्रेरित कर रहे थे। ऐसे नीली वर्दीधारी स्वयंसेवियों की संख्या काफी थी जो भीड़ के बीच में रसीद बुक लेकर इस तरह से खड़े थे जिससे उनकी नज़र सब पर थी और एक तरह से वे अघोषित रूप से पुलिस का ही काम कर रहे थे। यह अच्छा प्रयोग है क्योंकि भीड़ में कोई खाकी वर्दीधारी खड़ा हुआ होता तो स्वाभाविक रूप से वह भीड़ की घृणा का पात्र बना होता और भीड़ उससे चुहलबाज़ी कर जानबूझकर उसे उत्तेजित करती होती। मेरे ख्याल से भीड़ में प्रशिक्षित नागरिकों को इस्तेमाल कर भीड़ के विश्वास को जीतने का प्रयोग सार्थक हो सकता है।


मैंने देखा है कि लोग पुलिस से डरते जरूर हैं लेकिन आक्रामक भीड़ देखकर पुलिस की भी सिट्टी पिट्टी गुम हो जाती है। पुलिस को अकेला और असहाय पाकर उनकी हत्या कर दिए जाने की भी घटनाएं मैंने देखी हैं। इसीलिए शायद हमेशा दो पुलिसकर्मियों की एकसाथ ड्यूटी लगाई जाती है। प्रतापगढ़ के कुंडा में एक डिप्टी एसपी को अकेला पाकर कुछ नाबालिग लड़कों ने मार डाला था।
हरिद्वार में गंगा आरती के समय वीआईपी पुल पर अचानक एक व्यक्ति कहीं से छुपकर आ ही गया। वहां मौजूद स्वयंसेवी ने उसे वहां से भगाने की कोशिश की, लेकिन वह नहीं माना। हम लोगों को लगा कि सुरक्षा व्यवस्था को धता बताकर इसी तरह से अराजक तत्व या आतंकवादी कभी घुस आ सकते हैं। स्वयंसेवी ने वहां पर मौजूद पुलिस वालों से भी शिकायत की कि इसे बाहर निकालो, यह जबरदस्ती आ गया है। लेकिन पुलिसवालों ने कोई रुचि नहीं दिखाई। शायद उन्हें उससे कोई भय नहीं दिख रहा था। वहां पर मौजूद लोगों के मन में भी इस व्यक्ति के प्रति दया भाव उपजने लगा था। पुलिसवालों को किसी तरह के खतरे का अनुभव न होने के कारण इस तरह की लापरवाही हो ही जाती है। पता नहीं यह पुलिस की लापरवाही थी या संवेदनशीलता! स्वयंसेवी बार बार चिल्ला रहा था कि इस तरह से तो कोई भी कहीं से घुस आएगा!

घाट के प्रवेश द्वारों पर गाड़ियों को रोकने वाले बैरिकेड्स लगे थे। लोग बताते हैं कि घाट के पास गाड़िया ले जाने पर रोक है लेकिन येन केन प्रकारेण गाड़ियां भीतर पहुंच ही जाती हैं। वहां पर तैनात पुलिसवाले भी स्मार्ट कम आलसी ज्यादा लग रहे थे। हो सकता है कि जनता से ज्यादा उलझने का अनुभव न होने के कारण उनके सामने कोई चुनौती नहीं रह गई है।

मंशा देवी मंदिर में भी काफी भीड़ थी। लेकिन भीड़ को नियंत्रित करने के लिए कोई खास पुलिस व्यवस्था नहीं दिखी। न ही कोई किसी से उलझ रहा था। न ही पुलिस डंडे फटकार रही थी, न ही आने जाने से रोक रही थी, न ही कोई चीख पुकार हो रही थी और न ही कहीं भगदड़ मच रही थी। लगता था जैसे कि राम राज्य आ गया है! श्रद्धालु भी बहुत खुश थे।

“भारत माता मंदिर” गया जहां हुजूम के हुजूम लोग चले आ रहे थे लेकिन एक भी सिपाही मौजूद नहीं मिला। श्री दक्ष यज्ञ कुंड गया तो वहां भी कोई सिपाही नहीं मिला। सप्तऋषि घाट गया तो लगा जैसे हिमालय जैसी निस्तब्धता में पहुंच गया हूं। कल कल करती गंगा की धारा और चारों तरफ सिर्फ रेत ही रेत, साथ में दूर दूर तक शांति ही शांति! अद्भुत नीरवता और सुरक्षा का वातावरण! एक भी सुरक्षाकर्मी नहीं! वहां मौजूद कुछ लोगों से पूछा कि यहां पर डर नहीं लगता?

उन लोगों आश्चर्यमिश्रित नजरों से मुझे देखते हुए पूछा कि किस बात का डर? एक पत्रकार से पूछा कि क्या पर्यटकों के साथ यहां पर कोई लूट या दुराचार की घटना नहीं घटती? उन्होंने कहा कि आमतौर पर ऐसा तो कुछ सुना नहीं जाता। मुझे याद आया कि जब नॉर्दन आयरलैंड में मैं रात में तीन चार किलोमीटर तक पैदल टहलता था मुझे रास्ते में एक दो बिल्ली के अलावा कोई कुत्ता भी नहीं नज़र आता था। फिर भी मैं डरा डरा सा टहलता था। लौटकर जब मैं गेस्ट हाउस में अपने अंग्रेज मित्र से जब यह बताता था तो वह हंसते हुए पूछते थे कि इसमें डरने की क्या बात है? क्या भारत में ऐसा सन्नाटा नहीं मिलता? मैं उन्हें बताता कि हम लोग हर समय शोर शराबे के बीच ही रहते हैं, सन्नाटे वाली जगह से गुजरते हुए डर लगता है, क्या यहां सन्नाटे में कोई अपराध नहीं होता है? उन्होंने बताया था कि साल दो साल में किसी के साथ कुछ लूट हो जाती है तो इसमें भयभीत होने की क्या बात है? भीड़ से बचकर भागने वाले लोगों को अचानक मिली शांति में भी डर लगता है। ऐसी निरापद शांति देखकर लगा कि यहीं पर बस जाऊं तो कैसा रहेगा? क्या इतनी शांति और सुरक्षा बर्दाश्त कर पाऊंगा?

कांच के जादुई मंदिर “पावन धाम” में एक तरफ भीड़ का रेला लगा हुआ था और दूसरी तरफ सब कुछ अनुशासित! अनुशासन सिखाने वाला कोई खाकीवर्दीधारी नहीं! यह देखकर ऐसा लगा कि क्या समस्या की जड़ “खाकी वर्दी” ही है जिसकी मौजूदगी से लोगों में दुष्टई करने का कीड़ा रेंगने लगता है? या फिर यहां के लोग बहुत शरीफ़ होते हैं और साथ में पर्यटक भी बिलकुल भेंड़ बन जाते हैं? राजाजी नेशनल पार्क और पिरान कलियर में भी पुलिस अदृश्य ही रही। सिर्फ भीम गौड़ा बैराज में ही पुलिस की एक गाड़ी नजर आई बैराज की सुरक्षा में लगी दिखी।

2009 बैच के Ips अफसर ददन पाल 40वी वाहिनी पीएसी के कमांडेंट हैं। वह मूलतः प्रतापगढ़ के निवासी हैं और लखनऊ, इलाहाबाद में शिक्षा ग्रहण करने के बाद 1988 में पीपीएस बनें। उत्तर प्रदेश में उन्होंने बीस वर्षों तक धुंआधार नौकरी की और फिर छह वर्ष पूर्व उन्हें उत्तराखंड भेज दिया गया। वह बताते हैं कि उत्तर प्रदेश में बहुत क्राइम है। पेशेवर  पुलिसिंग सिखाने के लिए उत्तर प्रदेश की पुलिस सर्वोत्तम है। उत्तराखंड तो बहुत ही शांत प्रदेश है क्योंकि यहां के मूल निवासी शांतिप्रिय हैं। पुलिस में कांस्टेबल इन्हीं शांत इलाकों के हैं, इसलिए वे सबसे अच्छा व्यवहार करते हैं, सबकी मदद करते हैं। अच्छे अफसरों का उन्हें संरक्षण भी मिलता है। यही कारण है कि उत्तराखंड के अधिकांश इलाके आमतौर पर अपराध मुक्त होते हैं। हरिद्वार और ऊधमसिंह नगर जैसे जिलों में कुछ अपराध है और उसका कारण यहां के लोगों का बाहरी दुनिया से संपर्क में आना और मोबाइल है जिसने उन्हें अपराध की दुनिया से रूबरू करा दिया है। जहां तक पुलिस के रवैए की बात है, जैसा समाज होगा, वैसी ही पुलिस होगी। प्रशिक्षण से मन बदला जा सकता है लेकिन उसके लिए अधिक समय और माहौल की जरूरत होती है।

हरिद्वार के वरिष्ठ पत्रकार रामशरण कन्नौजिया का अनुभव भी बताता है कि उत्तराखंड की पुलिस की छवि उत्तर प्रदेश जैसी नहीं है। रामशरण कन्नौजिया उत्तर प्रदेश के हरदोई और लखनऊ में रहकर पत्रकारिता कर चुके हैं और आजकल हरिद्वार में रहते हैं। उनका कहना है कि उत्तराखंड की पुलिस की मानवीय छवि बनाने में उत्तर प्रदेश के उन पुलिस अफसरों का ही हाथ है जो उत्तर प्रदेश में नौकरी करने के बाद उत्तराखंड में नियुक्त हुए। ऐसे संवेदनशील और जिम्मेदार पुलिस अफसरों ने उत्तराखंड पुलिस का चेहरा ही बदल दिया और देश की सबसे अच्छी पुलिस बना दिया, छोटी मोटी गड़बड़ियां तो होती रहती हैं लेकिन आमतौर पर उत्तराखंड की बेदाग छवि ही है, पीड़ित लोगों की सुनवाई हो ही जाती है।

एक परीक्षा केंद्र पर जाना हुआ। देखा कि वहां पर भी कोई पुलिस नहीं। परीक्षा शुरू होने की घंटी भी बज गई लेकिन कोई अफरातफरी नहीं। मैंने देखा कि केंद्र व्यस्थापक किसी पुलिस अफसर को फोन करके कह रहे हैं कि परीक्षा शुरू हो गई है और अभी तक कोई पुलिस नहीं आई है। जल्दी भेजिए ताकि कागज़ पर लिखापढ़ी पूरी हो जाए। थोड़ी देर में दो सिपाही आ गए और पांच मिनट में चले भी गए! सबकुछ सामान्य था, पुलिस की मौजूदगी सिर्फ औपचारिकता भर थी, न कोई नकल हो रही थी और न ही कोई शोर शराबा। मुझे तो रामराज्य ही लग रहा था।

उत्तराखंड के वर्तमान डीजीपी अशोक कुमार ने अपनी शुरुआती नौकरी के बारह साल उत्तर प्रदेश में गुजारे थे और हर तरह के अपराधों और आतंकवादियों से उनका पाला पहले ही पड़ चुका था। वह खाकीवर्दीधार ज़रूर हैं लेकिन उन्होंने “खाकी में इंसान” पुस्तक लिखकर यह धारणा बदलने की कोशिश की है कि “खाकी के अंदर राक्षस” होता है। उन्होंने यह धारणा मीडिया प्रबंधन के माध्यम से नहीं बल्कि खाकी के भीतर मौजूद व्यक्ति को प्रशिक्षित करके और उसके भीतर की संवेदनशीलता को जागृत करके की है।

आईपीएस अशोक कुमार बताते हैं कि उन्होंने स्मार्ट पुलिसिंग के साथ ही संवेदनशील और victim oriented police यानी पीड़ित व्यक्ति के प्रति सहानुभति रखने वाली पुलिस की कल्पना कर उसे मूर्त रूप दिया। चूंकि वह डीजीपी बनने से पूर्व साढ़े तीन वर्ष तक डीजी लॉ एंड ऑर्डर भी थे, इसलिए उन्हें अपनी कल्पना को साकार करने का लंबा वक्त मिल ही गया।

वह बताते हैं कि पुलिस के पास अधिकतर पीड़ित व्यक्ति ही आता है और उन्होंने पुलिसकर्मियों को उस पीड़ित के साथ सहानुभूतिपूर्वक व्यवहार करने पर जोर दिया। उसकी शिकायत हर हाल में दर्ज़ करने के आदेश दिए। वह कहते हैं कि अफसरों को हर जगह साहेब कहा जाता है। उनका मकसद यह “साहबियत” दूर करने की है। “जनता और पुलिस के बीच की दूरी खत्म होनी चाहिए, हम सेवा के लिए पुलिस विभाग में आए हैं, हमारे बैज पर लिखा होता है पुलिस सेवा”।

डीजीपी अशोक कुमार कहते हैं कि पुलिस के रवैए में यह बदलाव योजनाबद्ध तरीके लाया गया है। उत्तराखंड की पुलिस का लोगो ही “मित्रता, सेवा और सुरक्षा” है। हमारी कोशिश पुलिस की संस्कृति में बदलाव लाना था, “तू तड़ाक” की भाषा खत्म करनी थी। यानी अच्छी यूनिफॉर्म के साथ अच्छा व्यवहार भी होना चाहिए। उन्हें अपनी योजना को लागू करने के लिए समुचित समय लग गया और यह प्रयोग सफल हो गया। वह कहते हैं, ” हम पेशेवर पुलिस हैं, पूरे देश में नॉर्थ ईस्ट को छोड़कर सबसे कम क्राइम रेट उत्तराखंड में है और वर्कआउट रेट 80% और संपत्ति रिकवरी रेट 67% तक है।

अशोक कुमार ने नए बैच के आईपीएस अफसरों को संबोधित करते हुए कहा था कि उन्हें गर्व करना चाहिए कि उन्हें पुलिस की नौकरी मिली है जो किसी अन्य नौकरी से तीन गुना अधिक शक्तिशाली है। इसमें आपको वर्दी मिलती है जो आपकी पहचान बनाती है। दूसरा, आपको शस्त्र मिलता है अपनी और संकटग्रस्त लोगों की रक्षा के लिए और तीसरा यह कि कानूनी अधिकार भी। आपको चाहिए कि आप इन अधिकारों का दुरुपयोग न करें। आपको इस नौकरी में पैसा तो मिलता ही है, शोहरत भी मिलती है और सम्मान भी मिलता है। आप सम्मान के लिए काम करिए, न कि पैसे के लिए और शोहरत के लिए। आप दूसरों की जितनी मदद करेंगे, उतना ही अधिक सम्मान मिलेगा।
अशोक कुमार ने नए अफसरों को बताया कि इस नौकरी में हर रोज़ करीब सौ लोग मिलेंगे आपसे अपनी समस्याएं लेकर जो विभिन्न तबकों के होंगे। आपको उनकी मदद करनी ही होगी। आप यह नहीं कह सकते कि इतना समय कहां से लाऊं? टाइम मैनेजमेंट आपको सीखना होगा, वरना कोई भी आपके दर से निराश लौटा तो आपकी सारी मेहनत पर पानी फिर जाएगा।
अशोक कुमार यह स्वीकार करने से नहीं हिचकिचाते हैं कि पुलिस अब तक प्रभावशाली और अमीरों की ही सेवा करती रही है। प्रभावशाली और अमीर लोग तो कई अन्य माध्यमों से भी अपने काम करा लेने में सक्षम होते हैं। अगर कमज़ोर वर्ग के पीड़ित व्यक्ति की हम नहीं सुनते हैं और उसे न्याय नहीं दिला पाते हैं तो हमारे पुलिस में होने से क्या फायदा? इस भावना को ध्यान में रखकर उन्होंने “खाकी में इंसान” की कल्पना की और उन्हें प्रशिक्षित करना शुरू किया जिसका फल अब मिलने लगा है और यही कारण है कि उत्तराखंड में पुलिस ज्यादतियों की संख्या लगातार कम होती जा रही है और पुलिस की गैर मौजूदगी में भी लोगों में यह विश्वास भर गया है कि पुलिस उनके साथ खड़ी है। खासकर कोरोना काल में तो पुलिस ने “मिशन हौसला” के तहत दो लाख लोगों की मदद की, रात दो बजे घरों में गैस सिलेंडर पहुंचाए। इन सबने पुलिस की जनता के प्रति सोच और जनता की पुलिस के प्रति धारणा में काफी बदलाव लाया है। शायद यही कारण है कि देश के सबसे बड़े राज्यों की तुलना में उत्तराखंड में अपराध सबसे कम है और प्रॉसिक्यूशन रेट सबसे अधिक है।
यह अज़ीब सी बात है। आज से तीस वर्ष पूर्व उत्तर प्रदेश के प्रथम पुलिस महानिरीक्षक रहे बी एन लाहिड़ी साहब से मिलना हुआ था। तब उत्तर प्रदेश में डीजीपी की पोस्ट नहीं होती थी। उनसे खूब मुलाकातें हुई थीं। वह कहते थे कि “पुलिस पीएसी को जनता से दूर रखना चाहिए और खासकर पीएसी को तो बुलडॉग की तरह पिंजरे में रखना चाहिए। पिंजरा खोला नहीं कि वह जनता पर टूट पड़े, न कि दोस्ती निभाए।”
वक्त बदल गया है। पहले की सोच ऐसी थी और आज अशोक कुमार जैसे डीजीपी जनता के साथ पुलिस की मित्रता पर जोर दे रहे हैं। शायद, आज की मांग यही है कि पुलिस स्पाइडरमैन की तरह जनता की सेवा करे!

Sneh Madhur, 9415216045

madhursneh@gmail.com

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