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“मानवता जोखिम में है”: जलवायु परिवर्तन की हालिया रिपोर्ट 2021

*जलवायु परिवर्तन की Latest रिपोर्ट 2021: मानवता जोखिम में है*

दुनिया को अभी भी गुमराह किया जा रहा है –प्रोफ. भरत राज सिंह

प्रोफ. भरत राज सिंह
पर्यावरणविद व महानिदेशक, स्कूल ऑफ मैनेजमेंट साइंसेज, लखनऊ (एकेटीयू से सम्बद्ध)

हालकि आईपीसीसी की रिपोर्ट के अनुसार, जुलाई, 2021 के पहले सप्ताह के दौरान आर्कटिक की समुद्री बर्फ की मात्रा में हो रही कमी काफी तेज थी, लेकिन बाद में धीमी हो गई। जुलाई 2021 की मासिक औसत सीमा 76,69,000 वर्ग किलोमीटर (29,70,000 वर्ग मील) थी । यह 2020 में निर्धारित महीने (जुलाई 2000) के रिकॉर्ड के निचले स्तर से 4,00,000 वर्ग किलोमीटर (154,000 वर्ग मील) अर्थात 80,69,000 वर्ग किलोमीटर से 5.21% कम हुई और 1981 से 2010 के औसत से 17,80,000 वर्ग किलोमीटर (687,000 वर्ग मील) अर्थात 94,49,000 वर्ग किलोमीटर से 30.22% कम पाई गई । निष्क्रिय माइक्रोवेव उपग्रह रिकॉर्ड में महीने की औसत सीमा चौथी सबसे कम है।

लापतेव सागर में पिघलते मौसम की शुरुआत में जो तेजी से बर्फ का नुकसान हो रहा था, धीमा हो गया है, लेकिन लापतेव में सीमा औसत से काफी नीचे है, परंतु ब्यूफोर्ट और चुच्ची समुद्र में बर्फ की सीमा लंबी अवधि के औसत के करीब बनी हुई है। यद्यपि बर्फ की मात्रा में हो रही कमी अब अगस्त में धीमी हो गई और यह स्थिति सितम्बर 2021 में न्युनतम हो जायेगी, इससे हम कल्पना कर सकते है कि 1981 से 2010 के तीन महीनो के सापेक्ष 53.8 से 60.52% बर्फ की मात्रा में कमी हो चुकी है ।

इससे यह भी स्पष्ट है कि हो रहे कार्बन उत्सर्जन से, 2030 के दशक में तापमान 1.5 – 1.6 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाएगा । जबकि इससे पहले यह कहा गया था कि सदी के अंत में तापमान 1.4 डिग्री सेल्सियस तक गिर जाएगा । रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि भारत के ऊपर वैश्विक वार्मिंग औसत को ट्रिगर करने का अनुमान है और इसके कारण गर्मी आवृत्ति अपनी चरम सीमाओं और इसकी गंभीरता में वृद्धि देखने की उम्मीद है और मॉनसून की बारिश भी तेजी से बढ़ने का अनुमान है जिससे वार्षिक औसत वर्षा में वृद्धि होग़ी।

रिपोर्ट में कहा गया है कि हिंद महासागर में वैश्विक औसत समुद्र स्तर सालाना 3.7 मीटर की दर से बढ़ रहा है। रिपोर्ट के अनुसार, दक्षिण-पश्चिमी तट पर 1850-1900 के सापेक्ष वर्षा में लगभग 20 प्रतिशत की वृद्धि हो सकती है। यदि ग्रह 4 डिग्री सेल्सियस गर्म होता है, तो भारत में सालाना वर्षा में लगभग 40 प्रतिशत की वृद्धि देखी जा सकती है । वर्षा में वृद्धि देश के दक्षिणी भागों में अधिक गंभीर होगी। दक्षिण एशिया में मध्य से लंबी अवधि में मानसून की वर्षा बढ़ने का अनुमान है। विश्व स्तर पर, गंभीर, भारी वर्षा की घटनाएं जो अब औसतन हर दस साल में एक बार होती हैं, जो अभी 1.7 गुना है । परन्तु 2 डिग्री सेल्सियस पर दस साल अवधि में, आवृत्ति में लगभग दोगुनी होने का अनुमान है तथा 4 डिग्री सेल्सियस पर, इन घटनाओं की संभावना दस साल की अवधि में 2.7 गुना तक बढ़ जाएगी, रिपोर्ट के लेखकों ने चेतावनी दी है।

प्रोफ. भरत राज सिंह पर्यावरणविद, एसएमएस, लखनऊ (एकेटीयू से संबद्ध), जिन्होंने विगत 1995 से जलवायु परिवर्तन और वैश्विक तापमान वृद्धि पर अपने लेखो व जर्नल पेपर्स के माध्यम से आगाह कर चुके है कि जलवायु परिवर्तन की विभीषिका मानवजाति व अन्य जीव-जन्तुओ के संरक्षण के लिए बहुत ही भयावह है| उनका कहना है कि विश्व की स्नो व ग्लेशियर, जलवायु परिवर्तन व वैश्विक तापमान नियंत्रण से सम्बंधित संस्थानों ने पेरिस समिति में भी 2014 में इसे पुरजोर तरीके के साथ नहीं रखा | यद्यपि भारतवर्ष के प्रधानमंत्री ने 2% कार्बन घटाने के लिए सहमति दी और सभी देशो से अपील की | परन्तु अमेरिका ने पेरिस समिति के सुझाव को मानने से असहमति जताई | यंहा तक की IPCC की 2007 की रिपोर्ट में कहा गया था, की वह 1.5 डिग्री सेल्सीयस तापमान की वृद्धि, जो घातक है, उसे 2015 तक रोकने में सफल होगे |

प्रोफ. सिंह के यदि कुछ पूर्व के सचेतक सुझाओ को देखे तो आज जो 2021 रिपोर्ट में कहा जा रहा वह उन्होंने 2012 से 2016 तक इलेक्ट्रोनिक अथवा प्रिंट मीडिया, पत्रिकाओं और जरनल में छपे पेपर्स आदि के माध्यम प्रसारितकर सम्पूर्ण विश्व को जगाने की कोशिश की है, जिसके कुछेक उदाहरण प्रस्तुत हैं-

1). डा. सिंह का एक बुक-चैप्टर जो अमेरिका में कक्षा 10-12 में पाठ्यक्रम में 2014 में सामिल किया गया है उस पुस्तक का शीर्षक :“ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के साथ वापस नहीं किया जा सकता” है, के सारांश में लिखा गया है कि- बर्फ की चादरें और हिमनद पहले के अनुमान की तुलना में जलवायु-परिवर्तन के प्रति अधिक संवेदनशील हैं। हाल के एक अध्ययन के अनुसार, यदि पूर्व-औद्योगिक स्तर (-) 0.8 डिग्री सेल्सियस की वृद्धि जो पहले ही दर्ज की जा चुकी है, से तापमान 1.6 डिग्री सेल्सियस सीमा से ऊपर पहुँच जाता है, तो ग्रीन-लैंड की बर्फ की चादरे पूरी तरह से पिघल सकती है । उपग्रह से लिए गए चित्रों से यह भी पता चलता है कि आर्कटिक समुद्री बर्फ अगस्त 2012 में रिकॉर्ड निचले स्तर पर आ गया है, और वैज्ञानिकों का अनुमान है कि यहाँ की वर्फ की चट्टाने अगले दो-दशकों में (2030 तक) गर्मियों के दौरान गायब हो जाएगा। शोध से पता चलता है कि आर्कटिक में समुद्री बर्फ का 70 प्रतिशत मानव निर्मित परिणाम है। हो रहे जलवायु परिवर्तन से यह निष्कर्ष निकलता है कि कार्बन उत्सर्जन में महत्वपूर्ण कमी करने और नवीकरणीय ऊर्जा स्रोतों पर ध्यान देने के लिए यह एक अलार्म कॉल हैं।(सन्दर्भ- ग्लेशियरों का पिघलना ग्लोबल वार्मिंग के साथ वापस नहीं किया जा सकता-2014, ग्रीन हैवन पब्लिशिंग, न्यूयार्क, यूएस, चैप्टर-7 पृष्ठ 56-63)

2). डा. सिंह अपने पुस्तक, ग्लोबल वार्मिंग-2015 के एक शोध चैप्टर के माध्यम से दुनिया के लोगो को बताया कि पृथ्वी की भूमि 1489,40,000 वर्ग-किमी (29.2%) और पानी 3611,32,000 वर्ग-किमी. (70.8%) द्वारा कवर की गई है यानी समुद्र में प्रत्येक मिमी की वृद्धि से बर्फ के पिघलने का पानी में बदलाव होगा। अंटार्कटिका और ग्रीनलैंड को कवर करने वाली बर्फ की चादर में लगभग 99.5 प्रतिशत भाग होता है, पृथ्वी की ग्रीनलैंड व ध्रुवो की ग्लेशियर बर्फ की मात्रा में समुद्र के स्तर को 63 मीटर (लगभग 200 फीट) तक बढ़ाने की क्षमता है, अगर वह पूरी तरह से पिघल गयी । ग्रीनलैंड में बर्फ का द्रव्यमान 680,000 क्यूबिक मीटर तक फैला है, जिसकी मोटाई औसतन 3 मील (4.8 किमी), जो द्वीप के तीन-चौथाई हिस्से को कवर करता है। कुछ हिमनद, विशेष रूप से दक्षिण-पूर्व और उत्तर-पश्चिम में, पिछले 20 वर्षों की अवधि में आस-पास के समुद्र में, डंप हुई बर्फ की बढ़ती मात्रा से 15% तक पानी के स्तर को बढाने का कारण बन गया है | इस पर की गयी गणना से पता चलता है कि अप्रैल 2003 और अप्रैल 2012 के बीच, इस क्षेत्र से प्रति वर्ष 10 बिलियन टन की दर से बर्फ पिधल रही है, जिससे वर्ष 21वी सदी के अंत तक, न्यूनतम पिघलने वाली बर्फ 397.245 ट्रिलियन टन या अधिकतम 1100-1450 ट्रिलियन टन हो सकती है, जो क्रमशः 3.6 फीट (1.1 मीटर) से अधिकतम 10-13 फीट (3.4 मीटर) समुद्र के स्तर में वृद्धि कर सकता है | इससे उत्तरी / दक्षिणी तट से समुद्र की ओर भार परिवर्तित हो कर मध्य रेखा समुद्री भाग में आ जायेगा और पृथ्वी के घूर्णन कोण में जो 23.43 डिग्री है में (+) अथवा (-) का परिवर्तन हो सकता है | वह इस सुंदर पृथ्वी ग्रह का एक काला दिन हो सकता है जब पूरे जीव-जंतुओ को अपने अंत के गंभीर परिणाम भुगतना पड़ सकते हैं। डा. सिंह के इस शोधकार्य को आगे बढ़ाते हुए अल्वारटा विश्वविद्यालय, कनाडा के प्रोफ. मैथुई ने दिसम्बर 2015 में पृथ्वी की गति में 1.7 मिली सेकंड धीमी पड़ने का संकेत दिया है| (सन्दर्भ- ग्लोबल वार्मिंग-2015, इंटेक प्रकाशक, चैप्टर-3 पृष्ठ 65-67)

3). डा. सिंह अपने पुस्तक, ग्लोबल वार्मिंग-2015 में अपने दूसरे शोध चैप्टर यह भी लिखा है कि 2020 से लेकर 2030 तक यह वास्तविकता से परे नहीं होगा, जबकि अधिकांशतः ध्रुवो की वर्फ महासागरीय बेसिन पर मिलेगी तथा उत्तरी अमेरिका के नक्शे से वह गर्मियों से मुक्त पाया जाएगा और भारी बर्फ की चादरों के कारण उत्तरी तटों के पास ग्लेशियर बनने की संभावनाएं हैं | यह भी आशा है कि 2040 तक ग्रीनलैंड, यूएसए के उत्तरी तटों के साथ कनाडा क्षेत्र में केवल थोड़ी मात्रा में समुद्री बर्फ रहेगी | चुकि समुद्र के पानी से मिलने वाली बर्फ की चादरें जो माइनस (-) 60-70 डिग्री सेंटीग्रेड तह होगी, जल्दी से पानी में परिवर्तित नहीं हो सकेगी और दबाव ड्रॉप बना सकती हैं | जिससे अत्यधिक तापमान गिरकर हिमपात का रूप लेगा । यही नहीं, संयुक्त राज्य अमेरिका और ब्रिटेन का उत्तरी क्षेत्र शीत लहरों, आपदाओं, तीव्र तूफानों से प्रभावित हो सकता है, भारी हिमपात के कारण जीवन जीने के लिए अनुकूल नहीं हो सकता है। शीत लहरो से, तापमान में अत्यधिक गिरावट होगी उत्तरी अमेरिका में और यूरोपीय क्षेत्र में रहने वाली आबादी को अपने निवास को छोड़ने और नए स्थान खोजने के लिए मजबूर कर सकती है।

एशियाई क्षेत्र विशेष रूप से भारत जो समुद्र से तीन तरफ से और चौथी तरफ हिमालय की पहाड़ियाँ से घिरा हुआ है, क्रमशः विनाशकारी तीव्र तूफानों, शीत लहरों, व भारी वारिस से बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं, और हिमालय में ग्लेशियर क्षेत्र के आस-पास भारी बर्फ की चट्टानें गिरती रहने की संभावना है जिससे जन-जीवन तथा आजीविका को भारी नुकसान होता रहेगा। यह उम्मीद की जाती है कि स्थिति हर साल खराब से बहुत खराब हो सकती है और अगले दशको तक जारी रहेगी। सर्दियों के दौरान, न्यूयॉर्क, ब्रिटेन और कनाडा यानि उत्तरी बेल्ट, चरम मौसम की स्थिति जैसे: तीव्र तूफान, भारी हिमपात और बिजली व्यवधान से पीड़ित होते रहेंगे। (सन्दर्भ- ग्लोबल वार्मिंग-2015, इंटेक प्रकाशक, चैप्टर-2 पृष्ठ 38-40)

उपरोक्त डा. सिंह द्वारा दिए गए तथ्यों व रिपोर्ट -2021 को गहन अध्ययन करने से आपको स्पष्ट होगा कि रिपोर्ट की सारी बाते पहले ही दुनिया के सामने लायी जा चुकी हैं और अभी भी जुलाई-2021 की रिपोर्ट में जुलाई, अगस्त और सितम्बर जब आर्कटिक समुद्र की वर्फ न्यूनतम स्तर पर पहुँच जाती है, का अकडा नहीं प्रस्तुत किया गया है और उसे 20% (प्रतिशत) बताकर तथ्यों को छुपाने का प्रयास किया गया प्रतीत होता है|

नासा के उपग्रह से 2019 में लिए गए चित्रों को देखकर स्वतः आप समझ सकते है कि 1980 में 70,00,000 वर्ग किलोमीटर से घटकर 1990 में 58,00,000 वर्ग किलोमीटर, 2000 में 52,50,000 वर्ग किलोमीटर, 2012 में 30,00,000 वर्ग किलोमीटर और 2019 में 35,50,000 वर्ग किलोमीटर न्यूनतम बची थी, जो 2020 में बढकर 41,50,000 वर्ग किलोमीटर आ गयी | यह कोरोना में हुए लाकडाउन के कारण जलवायु परिवर्तन में सुधार और 2020 में 1980 के सापेक्ष 40.7% और 2012 में 1980 के सापेक्ष 57.1% ग्लेशियर समाप्त होना दर्शाता है |

यदि हम कार्बन को तेजी से नहीं घटाए व वेकल्पिक ऊर्जा का अधिक से अधिक 70-80% तक उपयोग में नहीं लाये तो 21वी सदी का अंत तक जीव-जन्तुओ के समाप्ति का अंत होने से नकारा नहीं जा सकता है| इसके अतिरिक्त सभी सड़को चाहे वह प्रदेश राजमार्ग, राष्ट्रीय राजमार्ग अथवा एक्सप्रेस-वे सड़क हो, दोनों किनारों पर तीन लाइनों में पेड़ लगाना व वाहनों में जीरो प्रदूषण की तकनीक का उपयोग करना ही इस खतरे को टालने में विकल्प बन सकता है|

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