
*भारत में पड रही भारी शीतलहर ध्रुवो के साथ हिमालय के ग्लेशियर की बर्फ का तेजी से गायब होना बना कारण*
भरत राज सिंह,
पर्यावरणविद व महानिदेशक,
स्कूल ऑफ़ मैनेजमेंट साइंसेज,
लखनऊ (एकेटीयू से संबद्ध),
e-mail: brsinghlko@yahoo.com
अमेरिकी शीतकालीन विशाल तूफान ने पिछले शुक्रवार दिनांक 22 दिसम्बर 2022 से बिजली के बिना लाखों लोगों को अधेरे में छोड़ दिया है और उनकी सारी छुट्टियों की योजना को रद्द हों गयीं हैं | बिजली की कटौती से 1.4 मिलियन से अधिक घरों और व्यवसायों में अंधेरा छा गया, जबकि हजारो अमेरिकी उड़ानें रद्द कर दी गईं ।

सर्दियों के इस भयंकर तूफान जिसे भविष्यवाणियों ने इलियट कहा गया था, शुक्रवार 22 दिसम्बर 2022 को ग्रेट लेक्स के पास एक बम चक्रवात में तेज हो गया, जिससे उत्तरी मैदानों से लेकर पश्चिमी और अपस्टेट न्यूयॉर्क तक तेज़ हवाएँ और बर्फ़ीला तूफ़ान आया, साथ ही जानलेवा बाढ़, फ्लैश-फ्रीजिंग और यात्रा आक्रंता के रूप में यह विकराल धारणकर चला गया। इससे एयरलाइनों द्वारा 5,700 से अधिक उड़ानें रद्द की गई, जिनमें से हजारों यात्रियों को नाउम्मीदी के साथ हवाई अड्डों पर ही रुकना पड़ा। बर्फीले मौसम या दुर्घटनाओं के कारण सड़कों पर यात्रा बाधित हुई और इंडियाना, मिशिगन, न्यूयॉर्क और ओहियो के कुछ हिस्सों में अधिकारियों ने मोटर चालकों से अनावश्यक यात्रा से बचने का आग्रह किया। तूफान का विनासकारी प्रभाव 3,200 किलोमीटर की चौड़ाई में रहा, अर्थात टेक्सास से मैंनी तक भीषण बर्फवारि तथा और (-) 45 से (-60) 60 डिग्री सेंटीग्रेड तक तापमान में गिरावट आ गयी, जिससे लोगो का जीना दूभर हो गया ।
अधिकारियों ने कारों को सड़कों पर न चलाने का आदेश दिया गया क्योंकि अमेरिकी पूर्वानुमानकर्ताओं ने देश के “मध्य और पूर्वी हिस्सों में संभावित रूप से चक्रवाती वर्फीले तूफान के अत्याधिक प्रभाव की चेतावनी दी थी। आर्कटिक विस्फोट के आगमन ने व्यापक रूप में सभी रहन-सहन व खान-पान की वस्तुओं के लिये भीषण व्यवधान उत्पन्न किया, 1.5 मिलियन से अधिक घरों में बिजली के बिना रहने का अनुमान है। ओहियो में, अंतरराज्यीय 75 मृत्यु, तथा 100 से अधिक वाहनों के ढेर होने की स्थिति घोषित की गयी।
लगभग 60% अमेरिकी आबादी को अर्थात 200 मिलियन से अधिक लोगों को शीतकालीन चेतावनी किसी प्रकार से दी जा सकी । न्यूयॉर्क के गवर्नर कैथी होचुल ने आपातकाल की घोषणा करते हुए कहा कि बाढ़ और बर्फ जाम से नदियों के अवरुद्ध होने का खतरा “हमारे समुदाय में बहुत कहर बरपा गया”। राष्ट्रीय मौसम सेवा ने इस तूफानी मौसम की घटना को “एक पीढ़ी में एक बार” के रूप में वर्णित किया है । फ्लोरिडा में 30 वर्षों में इस वर्ष सबसे ठंडा क्रिसमस का अनुभव किया गया।
क्या हमने कभी सोचा कि यह क्यो हो रहा है – आज पता होगा कि आर्कटिक की समुद्रबर्फ तेजी से गायब हो रही है और उम्मीद किया जा रहा है कि 2040 या उससे पहले आर्कटिक का क्षेत्र, बर्फ से मुक्त होगा और वहां गर्मी का सामना करना पडेगा। यह भी पाया गया है कि आर्कटिक के समुद्रीबर्फ के नुकसान से ध्रुवीय भालू तथा अन्य जीव पहले से ही पीड़ित होकर गायब हो रहे हैं । एक नए अध्ययन से पता चलता है कि आर्कटिक पिछले 43 वर्षों में दुनिया के बाकी हिस्सों की तुलना में लगभग चार गुना तेजी से गर्म हुआ है। इसका मतलब है कि आर्कटिक 1980 की तुलना में औसतन लगभग 3℃ अधिक गर्म है | ग्लेशियर और बर्फ की पहाड़ी तेजी से पिघलने का एक स्पष्ट उदाहरण मोंटाना का ग्लेशियर नेशनल पार्क से मिलता है जहां 1910 में 150 ग्लेशियर उपस्थिति थे जिसकी तुलना में 2014 में केवल 27 ग्लेशियर ही बचे पाये गये थे।
*प्रश्न यह उठता है कि दुनियाँ के सबसे शक्तिशाली देश अमेरिका को क्या इस स्थिति का पता नही था?*
डा. भरत राज सिह का कहना है कि 2014 में दुनिया के वैज्ञानिको व डा. सिह ने अनुमान लगाया था कि अगले दसक की अवधि में (अर्थात 2024 तक) आर्कटिक समुद्री बर्फ का आवरण गर्मियों में लगभग 6 मिलियन वर्ग किलोमीटर से घटकर 2 मिलियन वर्ग किलोमीटर तक रह जायेगा । वर्ष 2022 में गर्मियों के अंत तक, लगभग 2.5 मिलियन वर्ग किलोमीटर समुद्री बर्फ बची पायी गयी । अगले वर्षों की स्थिति इससे भी बदतर होने की सम्भावना है । इसी के साथ अंन्टार्कटिका प्रति वर्ष लगभग 150 बिलियन टन की औसत दर से बर्फ द्रव्यमान (पिघल) रहा है या कम हो रहा है, और ग्रीनलैंड प्रति वर्ष लगभग 280 बिलियन टन कम हो रहा है, जिससे समुद्र का स्तर भी बढ़ रहा है।
डा. सिह का कहना है कि उन्होने अपनी किताब ग्लोबल वार्मिंग -2015 इस विषय पर खुलकर आने वाले आपात स्थिति का न्यूयार्क व पूर्ण अमेरिका, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, इटली , चीन, जापान व भारत में जलवायु परिवर्तन से आने वाली विभीसिका अनुमान लगाया था वह सत्य हो रही है ।
*जलवायु परिवर्तन के भयावह स्थिति से सख्ती से निपटने के उपाय*
डा. भरत राज सिह बताते है कि उनके इस अध्ययन से पता चला है कि विशेष रूप से ग्रीष्मकाल में आर्कटिक सागर (ध्रुवीय बर्फ) जलवायु परिवर्तन के कारण बहुत तेजी से सिकुड़ रही है जोकि मानव जनित केवल वैश्विक तापमान में वृद्धि के प्रभाव के कारण हों रही है । इस प्रकार जलवायु परिवर्तन के भयावह स्थिति से सख्ती से लड़ने के लिए वैज्ञानिको द्वारा निकाले गये निष्कर्ष को अमली जामा पहनाने की आवश्यकता हैं ।
*आर्कटिक सागर और समुद्र के स्तर में वृद्धि के प्रभावों का अध्ययन*
आर्कटिक समुद्र के तेजी से सिकुड़ने, ग्लेशियरों की बर्फ पिघलने व निरंतर सिकुड़न पर पिछले एक दशक के परिणाम देखने से पता चला कि समुद्री बर्फ परिवर्तन की दर में पहले बहुत अधिक सिकुड़ने के संकेत देखे जा चुके हैं । इससे अनुमान लगाया जा सकता है कि-
*एशियाई क्षेत्र विशेष रूप से भारत*
भारतवर्ष तीन तरफ से समुद्र से और चौथी ओर हिमालय की पहाड़ियां से घिरा हुआ है, भी भारी शीत लहर, विनाशकारी व तीव्र गति के तूफान से बुरी तरह प्रभावित हो सकती हैं । हिमालयी ग्लेशियर क्षेत्र के पास बर्फ गिरती है; आजीविका को भारी नुकसान हो सकता है। यह उम्मीद की जाती है कि अगले दशक तक हर साल स्थिति बद से बदतर होती रहेगी । पहाडिया व वर्फीले चट्टाने टूट-टूट कर खाडियो में गिरती रहेगी; इससे पहाडी क्षेत्र में रहने वालो के अन्यत्र विस्थापित करना होगा । शीतकाल में हिमालय की पहाड़ियां पर पड रही वर्फ मैदानी इलाको में पश्चिमी विक्षोभ की हवाओ के कारण दिल्ली से लेकर उत्तर-प्रदेश, मध्यप्रदेश व विहार तक भीषण शीतलहर के चपेट में आ गया है । जो अपने पुराने सभी रिकार्ड को तोड चुका है । स्कूल-कालेज बंद हैं । व्यवसाय पर भी भारी असर पड रहा है ।
चूकि आर्कटिक ग्लेशियर क्षेत्र की 60 प्रतिशत से अधिक वर्फ पिघल चुकी है । वहा पर्माफ्रॉस्ट प्रक्रिया प्रारम्भ हो चुकी है, जिससे मीथेन की भारी उपलब्धता ग्लोबल वार्मिंग में तेजी से वृद्धि होरही है और आर्कटिक क्षेत्र में गर्मी तीन से चार गुना बढ गयी है । इसके कारण जहाँ समुद्र की सतह में वृद्धी हो रही है वही पृथ्वी के चारो तरफ पानी की भाप भी 8-10 किलोमीटर की ऊचाई पर एकत्रित होने से चक्रवाती वर्फ़वारी हो रही है । इसको रोकने के लिए आज युद्धस्तर पर कार्य करने की आवश्यकता है तथा अपने रहन-सहन में परिवर्तनकर जलवायु परिवर्तन की विभीषिका से जीवन को बचाने के उपाय अपनाने से ही “पृथ्वी को बचाया तथा सुखी जीवन को” पुनः वापस लाया जा सकेगा अन्यथा वर्ष 2050 तक पृथ्वी के 60 प्रतिशत से अधिक जीव-जन्तुओ के समाप्त होने की सम्भावना से नकारा नही जा सकता है ।
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