क्या श्रम क़ानूनों में सुधार करते समय इन बातों का समावेश नहीं करने चाहिये – श्रमिकों का शोषण न हो, नियोक्ताओं पर बिला वजह दबाव न बने, किसी आपदा की स्थिति में नियोक्ताओं का दायित्व एवं कर्तव्य परिभाषित हो, श्रमिक श्रम क़ानूनों का दुर्पयोग न कर सकें, दिहाड़ी श्रमिकों के लिए विशेष प्रावधान हों आदि ? क्या श्रमिकों की कार्य कुशलता एवं उत्पादकता बढ़ाने पर राज्यों को विशेष ध्यान नहीं देना चाहिये जैसा कि प्रधानमंत्री जी अनेकों बार कह चुके हैं?

कृष्ण मोहन अग्रवाल
लॉक डाउन और श्रमिक
भाग: 4
वरिष्ठ पत्रकार रतिभान त्रिपाठी ने अपने लेख, “श्रमिकों के लिए कहीं यह बदलाव की आहट तो नहीं”, “घूमता आईना” पर प्रकाशित, में श्रमिकों के विषय में आज कल जो राजनीति गर्म हो रही है, बिलकुल सही कहा है कि लगभग 4 दशकों बाद “श्रमिक राजनीति” में यह उबाल आया है। उन्होंने 1970-80 के दशक से प्रारम्भ हो कर 1990-2000 के दशक तक “श्रमिक संघों” और “श्रमिक नेताओं” के बढ़ते हस्तक्षेप से किस प्रकार देश के विभिन्न राज्यों में कल कारखाने और उत्पादन प्रभावित हुआ, श्रम सुधार कानून आने और उदारीकरण के उदय से किस प्रकार से इन “श्रमिक संघों” और “श्रमिक नेताओं” के वर्चस्व में ह्रास हुआ और उत्तर प्रदेश एवं बिहार में “समाजवाद” और “बहुजनवाद” की राजनीति के उदय से श्रमिकों का पलायन एक राज्य से दूसरे राज्य में होना आरंभ हुआ, का सिलसिलेवार चित्रण किया है।
निष्कर्ष यह है आज जो करोना महामारी के चलते देश भर में लॉक डाउन के कारण इन अंतर्राज्यकीय श्रमिकों के घर वापसी की समस्य्या उत्पन्न हुई है उसके परिपेक्ष्य में जो इतिहास छिपा है, उस पर दृष्टि डालना अति आवश्यक है।
रतिभान त्रिपाठी जी ने भी इन श्रमिकों को “प्रवासी” कह कर संबोधित किया है, जो अनुचित है । “घूमता आईना” पर ही प्रकाशित मेरे लेख, “लॉक डाउन और श्रमिक (2)” का संदर्भ लें ।
2001 की जनगणना के अनुसार (https://census।nd।a.gov.।n/Data_Products/Data_H।ghl।ghts/Data_H।ghl।ghts_l।nk/data_h।ghl।ghts_D1D2D3.pdf)
दूसरे राज्यों में आने वाले श्रमिकों की संख्या और उसमें 1191 की तुलना में 2001 में हुई % वृद्धि । स्पष्ट है बिहार में सबसे ज्यादा श्रमिक आये। इसके पश्चात क्रमानुसार महाराष्ट्र, यूoपीo, हरियाना, गुजारत और दिल्ली में श्रमिक दूसरे राज्यों से आये ।

दूसरे राज्यों में जाने वाले श्रमिकों की संख्या और उसमें 1191 की तुलना में 2001 में हुई % वृद्धि । स्पष्ट है बिहार से सबसे ज्यादा श्रमिक दूसरे राज्यों में गये। इसके पश्चात क्रमानुसार यूoपीo, दिल्ली, गुजरात, महाराष्ट्र और हरियाणा से श्रमिक बाहर दूसरे राज्यों में गये।

विभिन्न राज्यों के कुल एक राज्य से दूसरे राज्य में आने – जाने वाले श्रमिकों की संख्या और उसमें 1191 की तुलना में 2001 में हुई % वृद्धि । स्पष्ट है बिहार प्रथम स्थान पर आता है। इसके पश्चात क्रमानुसार यूoपीo, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, दिल्ली आते हैं।

PT। New Delh. Oct 25 के अनुसार पलायन करने वाले श्रमिकों की संख्या 2001 से 2011 के दशक में
(https://econom।ct।mes.।nd।at।mes.com/news/pol।t।cs-and-nat।on/।nterstate-m।grat।on-।n-।nd।a-doubled-between-2001-2011-wef/art।cleshow/61225119.cms?from=mdr)
1991-2001 के दशक की तुलना में दो गुणी हो गई अर्थात लगभग 224.14 लाख हो गई ।
अनुमानत: 2020 में अंतर्राज्यकीय श्रमिकों की संख्या लगभग 3 करोड़ तो अवश्य होगी। स्पष्ट है इतनी वृहत संख्या के श्रमिकों की घर वापसी का इंतजाम करना, वो भी करोना महामारी के समय जब कि हर पल संक्रमण बढ़ने का खतरा, एक दुष्कर कार्य (Herculean Task/ भागीरथ प्रयत्न) था । कितनी ट्रेन, कितनी बस, कितना समय वांछित है? अत: जिस प्रकार से इस प्रकरण का सारा ठीकरा केंद्र सरकार के ऊपर फोड़ा जा रहा है, वह सर्वथा अनुचित है। राज्य सरकारों ने इस प्रकरण में वांछित सहयोग नहीं दिया यह अकाट्य सत्य है।
हाँ यह सच है आज इन श्रमिकों के विषय में लॉक डाउन 1 के प्रारंभ होने पर एक चूक केंद्र सरकार से अवश्य हुई। केंद्र सरकार को उसी समय इस संदर्भ में ठोस कदम उठाना चाहिए था। संभवत: केंद्र सरकार यह अनुमान नहीं लगा पाई कि लॉक डाउन इतने लंबे समय तक के लिए बढ़ाना पड़ सकता है। परंतु इसका सुधार तो केंद्र सरकार ने देर-सबेर कर लिया, परंतु राज्य सरकारों ने वांछित सहयोग नहीं दिया और इस प्रकरण पर जिस प्रकार से इन श्रमिकों के नियोक्ताओं ने उदासीनता दिखाई और साफ पल्ला झाड कर खड़े हो गये, बड़े सामाजिक संगठनों ने उनकी सामर्थ्यानुसार आपेक्षित सहयोग नहीं दिया विभिन्न राजनैतिक दलों ने समस्या के समाधान में अपना सक्रिय सहयोग देने के स्थान पर अपनी राजनीति चमकाने के अवसर के रूप में देखा और केंद्र विरोधी बयानबाजी की। पत्रकारों ने जिस प्रकार से समस्य्या के नकारात्मक पक्ष को श्रमिकों के मार्मिक चित्रों के माध्यम से बढ़ा-चढ़ा कर प्रसारित किया जब कि पत्रकारिता का धर्म था कि इन्हीं मार्मिक दृश्यों को सकारात्मक सोच से प्रसारित करते, समस्य्या का समाधान सुझाते जिससे समाज के प्रति नकारात्मक सोच उत्पन्न करने के स्थान पर समाज में सहृदयता का संचार होता, बहुत बड़ी चिंता का विषय है (लेखक का “घूमता आईना” में प्रकाशित लेख “लॉक डाउन और श्रमिक (3)”)
यदि निष्पक्ष दृष्टि से देखा जाय तो आज जो करोना महामारी के चलते देश भर में लॉक डाउन के कारण इन अंतर्राज्यकीय श्रमिकों के घर वापसी की समस्य्या उत्पन्न हुई है उसके परिपेक्ष्य में जो हमारी पूर्ववर्ती सरकारें, हमारी पूर्व नीतियाँ ही जिम्मेदार हैं। जिस प्रकार पिता एवं पूर्वजों के कार्यों का हानि लाभ प्राय: पुत्र को मिलता है, उसी प्रकार पूर्ववर्ती सरकार के गलत कार्यों, गलत नीतियों का दंश भी वर्तमान सरकार को झेलना पड़ता है और उनके अच्छे कार्यों, अच्छी नीतियों का लाभ भी वर्तमान सरकार को ही मिलता है। इस प्रकार के राजनैतिक हानि-लाभ के अनेकों अनेक उदाहरण हैं। उनमें से ज्वलन्त उदाहरण अंतर्राज्य श्रमिकों की घर वापसी का है जिसके लिए अनेकों कार्य करने के बावजूद केंद्र सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है।
आज हमको ज्ञान हो रहा है कि इन श्रमिकों का देश की अर्थव्यवस्था में कितना महत्वपूर्ण योगदान है। अभी तो इन श्रमिकों की घर वापसी ही पूरी नहीं हो पाई है और इस समय प्रत्येक अंतर्राज्यकीय श्रमिक की प्राथमिकता यह है वह कैसे न कैसे शीघ्र अति शीघ्र अपने परिवार के पास पहुँच जाये, यह जानते हुए भी कि वहाँ भी उसके लिए कोई जीविका का साधन नहीं है।
धीरे-धीरे लॉक डाउन के प्रत्येक विस्तार के साथ कुछ न कुछ अतिरिक्त छूट की घोषणा सरकार करती है जिससे चरण बद्ध तरीके से व्यावसायिक गतिविधियां, निर्माण कार्य, औद्योगिक उत्पादन……….आदि शुरू हो सकें और देश की अर्थ व्यवस्था पटरी पर आना शुरू हो। परंतु यह कहने की आवश्यकता नहीं है कि कोई भी व्यावसायिक गतिविधि बिना श्रमिकों के संभव नहीं है। चूंकि घर वापस गये श्रमिकों का तुरंत काम पर आना संभव नहीं है इसलिए सभी व्यावसायिक गतिविधियां, निर्माण कार्य, औद्योगिक उत्पादन……….आदि शुरू होने में विलंब होगा। और अर्थ व्यवस्था को पटरी पर आने में ज्यादा समय लगेगा।
अत: अब सभी राज्य सरकारों को चाहिए कि जो गलतियाँ 1970-2011 के बीच हुईं जिनके कारण श्रमिकों का अंतरराजकीय पलायन हुआ, उनका विश्लेषण करके उन्हें दूर कर अपने अपने राज्यों में अधिक से अधिक कल कारखाने लगाने, अन्य विविध निर्माण कार्यों की समयबद्ध ठोस योजना कार्यान्वित करें जिससे उनके राज्य के श्रमिकों को अधिक से अधिक संख्या में अपने ही राज्य में काम मिल सके और उन्हें दूसरे राज्य में जाने की आवश्यकता न पड़े। श्रमिक जब अपने गृह राज्य में अपने घर परिवार के साथ रहेगा तो उसे अपने घर परिवार की चिन्ता नहीं होगी, काम पर ज्यादा ध्यान केन्द्रित होगा और उत्पादकता में वृद्धि होगी।
उत्तर प्रदेश ने तो इस दिशा में कदम उठा लिया है और कई घोषणायेँ कर दी हैं और अपनी प्रतिबद्धता जता दी है ।
श्रमिकों के श्रम का अधिकतम लाभ नियोक्ता लेते हैं। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकार भी उत्पादन के ऊपर विभिन्न प्रकार के कर (उत्पाद शुल्क, सेल्स टैक्स/ जीएसटी, इंकम टैक्स…..) लगा कर उनके श्रम का लाभ लेती हैं फिर श्रमिकों के घर वापसी की सम्पूर्ण ज़िम्मेदारी केंद्र सरकार पर ही क्यों?
यदि घरेलू कामगार को और व्यापारिक प्रतिष्ठानों में काम करने वाले कामगारों को लॉक डाउन अवधि की सैलरी उनके नियोक्तता दें, ऐसा प्रधान मंत्री ने अपने राष्ट्र के नाम सम्बोधन में कहा था, तो फिर क्यों इन अंतर राजकीय श्रमिकों को उनके नियोक्ता उनकी दिहाड़ी का भुगतान न करें?
यक्ष प्रश्न:
क्या प्रत्येक राज्य को अधिक से अधिक संभावनाओं का सृजन नहीं करना चाहिए जिससे उनके राज्य के श्रमिकों को दूसरे राज्यों में कम से कम जाना पड़े? क्या श्रम क़ानूनों में सुधार करते समय इन बातों का समावेश नहीं करने चाहिये – श्रमिकों का शोषण न हो, नियोक्ताओं पर बिला वजह दबाव न बने, किसी आपदा की स्थिति में नियोक्ताओं का दायित्व एवं कर्तव्य परिभाषित हो, श्रमिक श्रम क़ानूनों का दुर्पयोग न कर सकें, दिहाड़ी श्रमिकों के लिए विशेष प्रावधान हों आदि ? क्या श्रमिकों की कार्य कुशलता एवं उत्पादकता बढ़ाने पर राज्यों को विशेष ध्यान नहीं देना चाहिये जैसा कि प्रधानमंत्री जी अनेकों बार कह चुके हैं? क्या कल कारखानों में उत्पादकता बढ़ाने के लिए आटोमेशन कि आवश्यकता और श्रमिकों की संख्या में, भारत वर्ष की जन संख्या के परिपेक्ष्य में,संतुलन बनाना आवश्यक नहीं है?
मोo – 8510851450
ईमेल – krishnam.agrawal@gmail.com
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