
प्रबोध राज चंदोल
‘चलते-फिरते कोरोना वायरस हो गए हैं लोग’
जिस गांव में मेरा जन्म हुआ था, उसमें मात्र 5वीं कक्षा तक का स्कूल था। उसके बाद गांव से कई किलोमीटर दूर एक कस्बा था, वहां इंटर कॉलेज में जाना होता था। पिताजी दिल्ली में नौकरी करते थे और हम बच्चों का आकर्षण भी शहर की ओर ज्यादा था, तो आगे की शिक्षा के लिए वे हम सबको दिल्ली ले आए।
वहां गांव में बिजली, पानी, बाजार की कोई सुविधा नहीं थी। लेकिन खेत से अनाज, सब्जी, मिर्च आदि सब कुछ मिल जाता था। नमक और कुछ मसाले साल में एक-दो बार खरीद लाते। यहां शहर में सब कुछ सुलभ, किसी भी चीज की जरूरत हो तो बाहर जाओ और दुकान से ले आओ। वहां गांव में छोटी-मोटी बीमारी हो जाती तो कोई डाक्टर या अस्पताल नहीं, बड़े-बूढ़े अपने अनुभव या स्थानीय वनस्पतियों के प्रयोग से इलाज कर देते थे। पर, यहां शहर में जुकाम, खांसी, मौसमी या अप्राकृतिक जीवनशैली की कोई भी बीमारी हो जाए तो आस-पास के डाक्टर या अस्पताल से दवा ले आओ। धन-अर्थ आधारित गांव से बिलकुल अलग भाग दौड़ वाली जीवनशैली!
एक बात मुझे लॉकडाउन में बड़ी अच्छी तरह से समझ में आ गई है कि गांव में सुविधाएं नहीं थीं तो आवश्यकता भी नहीं पड़ती थी। और शहर में सुविधाएं हैं, तो ऐसे मौके भी आते रहते हैं कि उनकी आवश्यकता भी पड़ती है।
दिल्ली में लॉकडाउन की अवधि में कुछ-कुछ ग्रामीण जीवनशैली की झलक दिखाई दे रही है। सीमित आवश्यकताएं, सीमित साधन। 25 मार्च के बाद आज तक मैंने स्वंय घर में रहते हुए पहनने के लिए दो जोड़ी साधारण वस्त्रों का ही प्रयोग किया है। बाकी सब अलमारी में बन्द पड़े हैं, कुछ दिन और ऐसे ही रहा तो समय के साथ वे सब छोटे पड़ जाऐंगे।
यह अप्रैल का महीना है। इस महीने में दिल्ली की सड़कों पर धूल, धुआं और गर्मी का बोलबाला होता था। आसमान गोधूलि की भांति दिखाई देता था। कूलर व ए.सी. चलने के कारण तापमान और अधिक बढ़ जाता था। पर, इस बार मौसम अभी तक इतना गर्म नहीं है कि कूलर या ए.सी. के बिना मुश्किल हो। हवा भी चलती है तो उसमें भी कोई गर्मी नही। प्रदूषण के चलते बरसात के अलावा दिल्ली के पेड़ हमेशा धूल-धूसरित दिखाई पड़ते हैं पर इस बार हर कुछ दिनों बाद वर्षा व बयार की पुनरावृत्ति से पत्ते हरे-भरे और चमकीले दिख रहे हैं।
आसमान नीला दिखाई देने लगा है और यमुना नदी का पानी साफ हो रहा है। यहां शहर के पार्कों में तितलियां कभी दिखाई नहीं देती पर यह परिवर्तन भी हो गया इक्का-दुक्का तितली दिख रही है। प्रदूषण से निपटने का एक नया रास्ता लॉकडाउन ने दिखा दिया है। अब देखना यह है कि इसे हम अपनी इच्छा से अपनाएंगे या प्रकृति इसे अपनाने के लिए हमें विवश करती है।
सुबह सवेरे योग के बहाने से पार्कों में ठहाके और ताली बजाते लोग, सड़कों पर लोगों की भागमभाग, स्कूटी-मोटरसाइकिलों, कारों, ऑटो और धूल-धुआं उड़ाती दिल्ली सरकार की जहाजनुमा बसों की घूं-घूं करती रफ्तार, सीटी बजाते हुए फट-फट सेवा और मिनी बसों की एक दूसरे से आगे निकलने की होड़, सुबह सड़कों के किनारों पर रेहड़ी-पटरी, ठिए लगाने वालों की गतिविधियां, गैस पम्पों पर गैस भरवाने वाले वाहनों की लम्बी कतारें, पैट्रोल पम्प पर दुपहिया वाहनों की भीड़, साइकिलों से और पैदल जाते दिहाड़ी मजदूर, पान की दुकानों पर खड़े होकर पान, गुटका और बीड़ी खरीदते तथा चौराहों पर सामान बेचते या भीख मांगते लोग और ट्रैफिक जाम से वाहनों की लम्बी कतारें, सब देखकर मैं सोचता था कि कैसे शहर में आकर बस गए? अब कहां जाएं? कहीं ओर ठिकाना भी नहीं है। परन्तु लॉकडाउन में सब कुछ बन्द! कोई तनाव नहीं ! सही बता रहा हूं, थोड़ी असुविधा तो है, पर मुझे बहुत अच्छा लग रहा है। न प्रदूषण, न भागदौड़, न इतना शोर, न धूल-धुआं, न झुलसाने वाली गर्मी। बस शान्ति और सुख चैन का जीवन! बस दुख है तो मित्रों से दूर रहने का। न बैठक, न बात, न हंसी ठिठोली, न उत्सव, न समारोह! अब तो सभी पहचान वाले लोग जैसे आदमी ना हुए, चलते-फिरते कोरोना वायरस हो गए हैं।

दिल्ली में घर में आराम करना ही लोगों के लिए सबसे बड़ी सजा है। अधिकतर बस्तियों में घनी बसावट है। छोटे-छोटे मकानों में कई-कई परिवार! जिसमें छोटे-बड़े सभी तरह के पुरुष व महिलाएं, छोटी-छोटी गलियों में नालियों से बाहर आता गंदा पानी, जगह-जगह कूड़े के ढेर हैं। ऐसी जगह रहने वाले लोग घर से बाहर आकर गली-मोहल्ले के लोगों के साथ या पार्कां में अपना समय बिता लेते थे, जो कोरोना वार से उपजी घरबंदी में घुटकर रह गए हैं।
फिर भी कुछ लोग हैं जो आस-पास के पार्कों में समय बिताने निकल आते हैं, लेकिन वहां भी पुलिस का सायरन सुनकर लोग धीरे-धीरे मन मारकर घर जाने पर मजबूर हो जाते हैं। कई बार तो कुछ लोग पुलिस का सायरन सुनकर पेड़ों के पीछे छिप जाते हैं कि संकट टल जाएगा पर दिल्ली की पुलिस है, सब जानती है! एक दो जवान वैन से उतरकर पार्क में आकर ढूंढ ही लेते हैं! ऐसे में तो घर जाना ही पड़ता है। इन दिनों बाजार, धार्मिक-राजनैतिक मीटिंग व जुलूस आदि सभी कुछ बन्द है तो लोग घरों में कैद रहने के लिए मजबूर हैं।
हमारी कॉलोनी में अपने-अपने घरों की बालकोनी में कुछ लोग ऐसे बैठे रहते हैं जैसे पिंजरे में तोता। घर में रहकर कैदी जैसा अनुभव करना और बाहर आकर कोरोना से संक्रमित होने का भय! ऐसे में उनकी शारीरिक और मानसिक स्थिति अब गड़बड़ाने लगी है। संक्रमण से बचने के लिए मास्क को नाक-मुंह पर लगाना है या ठोड़ी पर लगाना है, यह भी भूल रहे हैं! कुछ लोग तो धोती को सिर से लेकर गर्दन तक ऐसे लपेट लेते हैं जैसे अंतरिक्ष यात्री चांद पर जा रहे हों।
भारतीय ऋषिमुनि और मनीषियों ने अपनी तप-साधना के बल पर ऐसा ज्ञान अर्जित कर लिया था जिससे वे वर्षों तक रोगमुक्त रहकर अपने कर्तव्यों का पालन करते रहते थे। आमजन के लिए भी उन लोगों ने कुछ नियम और रीति-नीतियां बनाई जिससे समाज में स्वच्छता, पवित्रता और प्रकृति के साथ जीने की विधि बनी रहे और लोग शतायु होकर निर्वाण प्राप्त करें। उनके द्वारा स्थापित परम्पराऐं सदियों से हमारी संस्कृति का हिस्सा रही हैं। तन, मन और वाणी की पवित्रता, भोजन, आपसी तथा प्रकृति के साथ व्यवहार के नियम आदि जीवन के अनेक आयाम उन्होंने निर्धारित कर दिए थे।
आश्रम व्यवस्था में सर्वप्रथम विद्या, शास्त्र, शस्त्र, ध्यान, यज्ञ आदि समस्त जीवनोपयोगी ज्ञान की शिक्षा दी जाती थी और तत्पश्चात् गृहस्थ जीवन। इन नियमों का पालन करने के लिए समाज में अनेक रीति-रिवाज बन गए थे। यह बात अलग है कि बाद में कुछ स्वयंभू विद्वानों ने उन नियमों व रीति-रिवाजों में फेर-बदल करके उनमें दोष उत्पन्न कर दिए। इसके बावजूद भी भारतीय सनातन संस्कृति के अनेक नियम आज भी अकाट्य हैं। मुझे तो लगता है आज उसी जीवनशैली को पुनः अपनाने की आवश्कता आ पड़ी है।
आप मानें या न मानें, मेरा तो यह अटल विश्वास है कि हमारे प्राचीन साहित्य में जीवन के हर एक पहलू से सम्बन्धित हर समस्या का समाधान है। चाहे वह निजी समस्या हो, समाज की हो, राष्ट्र की हो या समस्त विश्व की। हमारे पूर्वज तो हमें बहुत पहले ही बताकर जा चुके हैं कि यह समस्त विश्व एक परिवार है- ’वसुधैव कुटुम्बकम’ और विश्व माने या न माने हम तो आज भी उसी का अनुसरण कर रहे हैं।
लेखक: प्रबोध राज चंदोल, +919873002562

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