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Corona war: लॉक डाउन, मैं और आसपास: 42

प्रबोध राज चंदोल

“पेड़ों के रक्षक ही बन गए उनके भक्षक “

नौकरी करते करते हुए पिछले कुछ दिनों से मैं यह देख रहा हूं कि प्रशासन की ओर से लॉकडाउन में अब वैसी सख्ती नहीं रह गई है, जैसी कि शुरू में थी। हॉं, स्थानीय आवास समितियां अभी भी जागरूक हैं, बाहरी लोगों का प्रवेश कॉलोनी में न होने पाए इसके लिए कुछ लोग लगातार नजर बनाए रखते हैं। जब से लॉकडाउन चालू हुआ तब से हमारी कॉलोनी के पार्कों में जगह-जगह अनचाही घास पैदा हो गई, पेड़ों की छटाई न होने से कुछ पेड़ एक ओर झुकने लगे थे।

प्राकृतिक रूप से हरे-भरे वन क्षेत्रों में वनस्पतियों की विविधता बनाए रखने के लिए प्रकृति की अपनी व्यवस्थाएं हैं। जैसे कुछ पेड़ों के फूल परिपक्व होकर फलियों के रूप में परिवर्तित हो जाते हैं और पकने पर अपने आप फटकर उनमें से रूई जैसे रेशां का एक पुंज आकाश में उड़ जाता है और उस पुंज के बीच में उस पेड़ का एक छोटा सा बीज सुरक्षित होता है। वह पुंज हवा के साथ उड़ता हुआ न जाने कहां जाकर गिरेगा और पुंज में स्थित बीज उपयुक्त पर्यावरण मिलते ही अंकुरित होकर एक नए पेड़ का रूप ले लेगा। ऐसे ही जब प्रवासी पक्षी एक स्थान से दूसरे स्थान पर जाते हैं तो रात्रि में विश्राम के लिए जहां भी रुकते हैं तो वहां के स्थानीय पेड़-पौधों के फल-फूल खाकर अपना पेट भरते हैं तथा इस प्रक्रिया में पक्षियों के पेट में उन पेड़ों के बीज भी चले जाते हैं। अगले दिन जब कहीं दूर जाकर वे पक्षी बीट करते हैं तो पेड़ का बीज पक्षी की बींट के साथ बाहर आ जाता है और बीट के बीच में रखे बीज को जैसे ही उपयुक्त वातावरण मिलता है तो स्फुटित होकर पेड़ का रूप ले लेता है। प्रकृति की इस अनोखी व्यवस्था का उल्लेख मैंने यह बताने के लिए किया कि कोरोना वायरस भी उसी प्राकृतिक व्यवस्था का हिस्सा है। लॉकडाउन उस वायरस को एक स्थान पर सीमित रखने का मनुष्य का एक प्रयासभर है लेकिन इसका यह मतलब तो नहीं कि प्रकृति अपना काम करना छोड़ देगी।
मेरे क्षेत्र के एक पार्क में कुछ गिनी-चुनी किस्म के पेड़-पौधे हैं और उनमें भी फाइकस जैसे गैरउपयोगी पेड़ काफी अधिक संख्या में लगाए गए हैं। लॉकडाउन की अवधि में पार्क बन्द रहा और किसी ने पार्क की खरपतवार को साफ भी नही किया था तो प्रकृति ने कुछ नए पौधे अपने आप पैदा कर दिए थे। जो पौधे पहले कभी दिखाई नहीं देते थे, वे भी अब उगते हुए दिख रहे थे।

अचानक एक दिन मैंने देखा कि कुछ लोग उस पार्क में कई तरह के काम कर रहे हैं: जैसे पानी के पाइप से पैदल पथ को धोना, अनचाही घास को उखाडना़, पेड़ों की कटाई-छंटाई आदि। दूसरे कुछ लोग पर्यवेक्षक का काम करते हुए निर्देश दे रहे थे जिनमें आवासीय जनकल्याण समिति का एक पदाधिकारी भी दिखाई दे रहा था। उन लोगों की कार्यशैली से मुझे लगा कि जैसे वे कोरोना वायरस-मुक्त अभियान दल के लोग हों। मैं पार्क में कुछ समय प्रतिदिन व्यतीत करता हूं, पर उस दिन उन्हें काम करते देखकर मैं घर लौट आया।

अगले दिन सुबह जब मैं दूध लेने गया तो पार्क में हुए परिवर्तन को देखने का मन किया। मैंने देखा कि अनेक वृक्षों की कटाई-छंटाई बड़े ही बेढंगे तरीके से की गई थी। मोलसरी, अर्जुन जैसे पेडों़ को भी छांटकर छोटे पेड़-पौधों के समूह में जोड़ दिया गया था, कुछ पेड़-पौधों की पू्रनिंग की जानी चाहिए थी, पर नहीं की गई। खरपतवार में पक्षियों की बीट से पैदा हुए कुछ अलग किस्म के पेड़, जो आस-पास के पार्कों में नहीं थे, तथा जिन्हें बचाया जाना चाहिए था, पर उन सभी को क्रूरता से उखाड़कर फेेंक दिया था। यह मालियों की गैर-जिम्मेदारी या अल्पज्ञान दोनों में से किसी एक के कारण हुआ होगा, नहीं तो जो नए किस्म के पेड़ पार्क में स्वयं उग आए थे उनको बचाया जाना चाहिए था। पेड़ों के रक्षक ही उनके भक्षक बन गए थे।


मुझे याद आती है भारतीय संस्कृति में ज्ञान एवं कौशल को सहेजने की वह परंपरा जिसमें अनेक जातियों का उद्भव हुआ था। हमारे देश में कुछ जातियों का उद्भव उनके काम-धन्धों के आधार पर हुआ था: जैसे कुम्हार, धोबी, लुहार, हलवाई, माली आदि। वंशावली की दृष्टि से देखें तो इन जातियों में अनेक परिवार प्राचीन राजवंश परिवारों के भी मिल जाएंगे। परन्तु समय बीतने के साथ पारिवारिक परिस्थितियां बदलती गईं और जब जिसे जो काम मिला उसने वही अपना लिया और केवल अपनाया ही नही बल्कि उस काम में पारंगत भी हो गए तथा पीढ़ी-दर-पीढ़ी अपने कामकाज की परंपरा आगे बढ़ाते भी रहे।

धीरे-धीरे जाति व्यवस्था में भेदभाव जैसे दोष आ गए और अनेक लोगों ने अपने पुश्तैनी काम को त्यागकर अन्य दूसरे कामों को अपनाना शुरू कर दिया या नौकरी के माध्यम से सेवा के क्षेत्र में चले गए। इस समय के समाज में अनेक परिवर्तनों के साथ मैं देखता हूं कि जिन धन्धों पर कभी जाति विशेष का अधिकार हाता था, वह अब अन्य वर्गों के लोगों ने भी अपना लिए हैं। बाजारों में जैन फर्नीचर, अग्रवाल स्वीट्स, मित्तल शू स्टोर, नरूला ड्राईक्लीनर, गुप्ता बर्तन भंडार आदि आम देखने को मिलते हैं और इन सब के सामान में पारंपरिक दर्शन कम और आधुनिकता अधिक झलकती है। आज का जमाना यूज़ एण्ड थ्रो का है जिसमें न तो पारंपरिक कलाशैली है और न ही वैसी मजबूती और स्थायित्व। हमारे देश में आज भी अनेक कामगार जातियां समाज में और कागजों में दिखाई तो देती हैं, परन्तु उनके पुश्तैनी कामों की निपुणता अब उन जातियों के लोगों में नही बची है। समाज की जातियों में ऊंच-नीच का भाव पनप जाने के कारण विभिन्न जातियों के जातकों ने अपने पुश्तैनी कामों को त्याग दिया और उन कामों को करने की जो कार्यकुशलता अनुभव के माध्यम से एक लम्बे समय में बनी थी वह सब नष्ट हो गई।
मेरे एक मित्र अनेक वर्षों से राजनैतिक और सामाजिक कार्यकर्ता हैं। उन्होंने समाज में विभिन्न क्षेत्रों के गुणियों को खोजकर पारंपरिक ज्ञान को संकलित करने का विचार किया तो मेरी ’पेड़ पंचायत’ नामक संस्था की ओर से मालियों का काम करने वाली ’माली’ जाति के लोगों का एक सम्मेलन बुलाने का सुझाव दिया जिससे कि कृषि और पेड़ पौधों से संबन्धित पारंपरिक ज्ञान और उनके रखरखाव के पारंपरिक तरीकों को जान-समझकर संकलित किया जाए। इस हेतु मैंने माली जाति से सम्बन्ध रखने वाले हजारों लोगों के पते एकत्रित किए और उन सभी को विषयवस्तु सहित पत्र द्वारा सम्मेलन में आमंत्रित किया। परंतु खेद के साथ कहना पड़ रहा है कि बहुत कम संख्या में लोग आए और जो आए, वे भी बड़े रोष में थे। उनका कहना था कि आप लोग क्या चाहते हैं कि हमारा समाज पढ़-लिखकर आगे न बढ़े और हम उसी पुश्तैनी काम को करते हुए पिछड़ेपन में रहकर जीवन व्यतीत करते रहें!

यह हमारे देश की विडंबना है कि पीढ़ी दर पीढ़ी हम अपनी पुरातन गुणता की धरोहर को खोते जा रहे हैं और उसे सहेजने का कोई उपाय भी नही कर पा रहे हैं।


लॉकडाउन प्रारंभ हुआ तो लाखों श्रमिकों के अपने गांव लौटने की खबरें भी आईं। इनमें निश्चित ही अनेक श्रमिक ऐसे होंगे जो वर्षों से अपने-अपने कामों को करते हुए पारंगत हो गए होंगे और इस संकटकाल में अपने मूल निवास लौट रहे हैं। यह भी बहुत हद तक संभव है कि इनमें से कई अब पुनः लौटकर अपने कामों पर कभी वापिस नही आएंगे। हमारे देश में कामगारों की कमी नही है, लेकिन निपुणता वाले कामगारों की कमी है। धनपतियों की ऐसी मानसिकता बन गई है कि यदि पुराना श्रमिक चला गया तो नया रख लेंगे परन्तु यह कोई नही सोचता कि पुराने श्रमिक जैसी निपुणता कहां से लाएंगे? उचित तो यह था कि कोरोना वायरस के कारण हुए लॉकडाउन में सभी व्यापारी, उद्यमी और धनाढ्य अपने साथ जुड़े कामगारों को आश्रय देते और उनकी दैनिक राशन आदि की आवश्यकताएं पूरा करते ताकि संकटकाल समाप्ति के बाद उनकी सेवाएं फिर से मिल सकें, परन्तु ऐसा नही हुआ। लॉकडाउन हटने के बाद जब पुनः सब काम-धन्धें चालू होंगे तो मजदूरों की खोज होगी और जब पुराने अनुभवी श्रमिक नही मिलेंगे तो गैर-अनुभवी से काम लेना होगा, तो काम की गुणवत्ता तो प्रभावित होगी ही।
लॉकडाउन काल में ही केन्द्र सरकार ने भारत स्वावलम्बन का अभियान चलाया है। यदि इस अभियान के अन्तर्गत भारत सरकार स्थानीय लघु उद्योग और कृषि आधारित कुटीर उद्योगों को पुनर्जीवित कर इन पलायन कर गए श्रमिकों के कौशल का उपयोग उनके पैतृक स्थान पर ही ले सके तो न केवल स्थानीय ग्रामीण स्तर पर रोजगार का सृजन होगा बल्कि समस्त भारत में एक स्वावलंबी अर्थव्यवस्था भी विकसित होगी। फिर किसी को यह कहने का अवसर भी नही मिलेगा कि लॉकडाउन के कारण घर लौटे श्रमिकों के कौशल को गांव में ही घोटकर मार दिया गया।

प्रबोध राज चंदोल
मोबाईलः 9873002562
मई 16, 2020

prchandol@gmail.com

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