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“आलोचना साहित्य का मस्तिष्क है और यह पाठक के लिए भी महत्वपूर्ण है”

Prayagraj.

हिन्दी विभाग, इलाहाबाद विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित व्याख्यानमाला के प्रथम सत्र में बोलते हुए संत तुकड़ोजी महाराज नागपुर विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डॉ. मनोज पाण्डेय जी ने कहा कि आलोचना साहित्य का मस्तिष्क है और यह पाठक के लिए भी महत्वपूर्ण है तथा आलोचक के लिए भी। रचना और आलोचना का परस्पर महत्वपूर्ण सम्बन्ध है और आलोचना रचना की अनुगामिनी नहीं होती। 1960 के बाद से हम आलोचना के कालखंड को समकालीन आलोचना कह सकते हैं जहां साहित्य समाज से निरपेक्ष नहीं है, जहां संस्कृति चेतना महत्वपूर्ण है, जहां अस्मिता की समस्या पर विस्तार से विचार विमर्श है, जहां भाषा के वितंडावाद से मुक्ति का आग्रह महत्त्वपूर्ण है।

व्याख्यानमाला के दूसरे सत्र में बोलते हुए महात्मा गांधी चित्रकूट ग्रामोदय विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग के डॉ ललित कुमार सिंह जी ने कहा कि साहित्य के राष्ट्रीय सन्दर्भ अचानक आए सन्दर्भ नहीं हैं। भारतेन्दु की विदेश जाते धन को देखकर पीड़ा भावना से लेकर प्रसाद की प्रबुद्ध शुद्ध भारती और निराला की जागो फिर एक बार की भावना, माखनलाल चतुर्वेदी और भवानी प्रसाद मिश्र से होते हुए शमशेर और अटल जी की कविताएं राष्ट्रीय सन्दर्भ को उदबुद्ध करने वाली कविताएं हैं ।

विभागाध्यक्ष प्रोफेसर कृपाशंकर पाण्डेय जी ने कहा कि सांस्कृतिक चेतना आज आलोचना और कविता का महत्वपूर्ण अंग बना हुआ है।

व्याख्यानमाला के संयोजक डॉ. राजेश कुमार गर्ग ने कहा कि रामविलास शर्मा, कृष्णदत्त पालीवाल, रमेश चंद्र शाह आदि आलोचक इसी सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करने वाले आलोचक हैं जो प्रश्नांकित अस्मिता के दौर में भी जन मन की समस्या और भूमिका पर चर्चा में पूर्ण मनोयोग से प्रवृत्त रहे।

व्याख्यानमाला हेतु देश के 24 राज्यों सहित नेपाल आदि देशों से कुल 489 नामांकन निवेदन प्राप्त हुए जिनमें 133 प्राध्यापक 72 शोध छात्र और 284 छात्र शामिल हैं। इनमें 298 पुरुष और 189 महिलाएं शामिल हैं।

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