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सूफियाना अंदाज में शास्त्रीय नृत्य पेश किया

लखनऊ में होने वाले समस्त संगीत सम्मेलनों में विक्टर नारायण विद्यांत ने खुले दिल से धन व श्रम के साथ योगदान दिया

शास्त्रीय नृत्य ने बांधा शमां

डॉ दिलीप अग्निहोत्री

महान शिक्षाविद विद्यांत जी बहुआयामी व्यक्तिव के धनी थे। वह शिक्षा के साथ ही संगीत के भी विशेषज्ञ थे। यही कारण था कि उनकी एक सौ पच्चीसवीं जन्म जयंती पर इन दोनों तथ्यों का ध्यान रखा गया। स्थापना दिवस समारोह में जहां राष्ट्रीय स्तर के विद्वानों का व्याख्यान हुआ,वहीं विद्यांत जी को प्रिय संगीत का भी प्रदर्शन किया गया। विद्यांत जी ने सम्पूर्ण भौतिक सम्पदा समाज के हित में दान कर दी थी। इसके बाद भी वह अपनी प्रतिभा से सम्पन्न ही बने रहे। यही सम्पदा उन्हें आनन्दित करती थी। उनके व्यक्तिव के अनेक पहलू थे।


उन्होंने छह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की, देश की अनेक संस्थाओं का वह नियमित वित्त पोषण करते थे। लेकिन शैक्षिणिक प्रतिभा के साथ वह उच्च कोटि के संगीतज्ञ भी थे।
उन्होंने भौतिक विज्ञान के परास्नातक और और एल एल बी किया था। इसके अलावा वह साहित्य और संगीत की प्रतिभा से भी सम्पन्न थे। सितार और तबला में उन्हें महारथ हासिल थी। सितार वादन में उन्होंने भातखंडे से विशारद पास किया था। उनका सितार वादन प्रसिद्ध था।
विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में अर्थशास्त्र के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ शतदल मित्रा ने बताया कि उन्हें कई बार विद्यांत जी का मंच पर तबला वादन सुनने का अवसर मिला था। उच्च तान, झाला, विलंबित या द्रुत लय दोनों में वह पारंगत थे। उनका स्वयं का संगीत ग्रुप था जिसमें प्रसिद्ध बैरिस्टर व बंगला साहित्य के कवि संगीतकार ए पी सेन,वर्तमान प्रबंध समिति के सदस्य अरूप सान्याल के पिता द्विजेंद्र नाथ सान्याल, मुम्बई फिल्म उद्योग के संगीतकार व लखनऊ रेडियो स्टेशन के प्रोड्यूसर विनोद चटर्जी जैसी संगीत की चर्चित हस्तियां शामिल थी।

लखनऊ में होने वाले समस्त संगीत सम्मेलनों में विद्यांतजी ने खुले दिल से धन व श्रम के साथ योगदान दिया। उन्होंने शशीभूषण महिला महाविद्यालय की छात्राओं को सम्मिलित करते हुए एक नृत्य संगीत का ग्रुप बनाया था। इस ग्रुप द्वारा मुख्यता रविन्द्र नाथ टैगोर के गीतों पर आधारित नृत्य नाटिकायों का मंचन किया जाता था। इस ग्रुप की लोकप्रियता कश्मीर, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, आसाम, उड़ीसा आदि प्रदेशों में भी थी। वहां इस ग्रुप द्वारा अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया जाता था। आजकल जिस प्रकार समर कैंप का प्रचलन है,उसी प्रकार विद्यांत जी विद्यर्थियो को बालिकाओं के गर्मी व शीत अवकाश संगीत की शिक्षा प्रदान करते थे। जीवन के अंतिम दशक में विद्यान्त जी प्राचीन भारतीय कर्मकांड, तंत्र विद्या में संगीत के प्रयोग पर शोध में लगे रहे। यह विद्यांतजी की रुचि का क्षेत्र था।

विद्यांतजी की जन्म जयंती पर विद्यांत हिन्दू पीजी कालेज के पूर्व छात्र सिद्धार्थ राय ने गायत्री मंत्र को कत्थक के माध्यम से अभिव्यक्त किया। इसके बाद उन्होंने सूफी मुर्शिद खेले होली पर शास्त्रीय नृत्य किया। पूर्व छात्र राहुल ने प्रीति की ऐसी मोहे लागी…
गीत पर नृत्य किया। यह नृत्य सूफियाना अंदाज में था। अविनाश ने धमाल ताल कत्थक शास्त्रीय नृत्य किया। इसमें शिव जी की वंदना की गई थी। इसके अलावा अनन्त दत्ता और साथियों ने ए वतन और तेरी मिट्टी समूह गान पेश किया।

पांच जनवरी को विद्यांतजी की जन्म जयंती मनाई जाती है। छह शिक्षण संस्थाओं के संस्थापक

विक्टर नारायण विद्यांत  की एक सौ पच्चीसवीं जयंती उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाई गई। इस अवसर पर विद्यांत हिन्दू पीजी कॉलेज में समारोह का आयोजन किया गया। जिसमें विद्यांत पर व्याख्यान के अलावा सांस्कृतिक कार्यक्रम भी आयोजित किया गया। महाविद्यालय की वार्षिक पत्रिका का लोकार्पण किया गया। उत्कृष्ट उपलब्धि हासिल करने वाले विद्यर्थियो को गोल्ड मेडल से नवाजा गया।आगरा, गोरखपुर रुहेलखंड,अलीगढ़ विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति भूमित्रदेव मुख्य अतिथि थे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समय में वैश्विक सभ्यता का संकट एक बड़ी चुनौती है। आधुनिक वैज्ञानिक अविष्कारों का सृजनात्मक उपयोग सुनिश्चित होना चाहिए। इसके नकारात्मक प्रयोग ने अनेक जटिल समस्याओं को जन्म दिया है। इसमें प्राकृतिक,सामाजिक,शैक्षणिक,आर्थिक विसंगतियां शामिल है। इनका समाधान गांधीवादी चिन्तन से हो सकता है।

विक्टर नारायण विद्यांत इसी चिंतन के संवाहक थे। उनकी जीवन शैली भी इसी के अनुरूप थी। विशिष्ट अतिथि प्रो ए के शर्मा ने कहा कि विद्यर्थियो को विद्यांत जी जैसे महापुरूषों से प्रेरणा लेनी चाहिए। अध्यक्षता डॉ गोपाल चक्रवर्ती ने की। उन्होंने कहा कि विद्यांत जी की कथनी और करनी में कोई अंतर नहीं था। प्रबंधक शिवाशीष घोष ने कहा कि विद्यांत जी राष्ट्रीय स्तर के शिक्षाविद होने के साथ ही,उच्च स्तरीय संगीतिज्ञ थे। प्राचार्या प्रो धर्म कौर ने प्रगति आख्या प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि महाविद्यालय में अनुशासन,पठन पाठन,स्पोर्ट पर विशेष ध्यान दिया जाता है। समय समय पर यहां राष्ट्रीय,प्रादेशिक स्तर की सेमिनार आयोजित की जाती है। समारोह के संयोजक उप प्राचार्य डॉ राकेश कुमार मिश्र थे। स्वागत भाषण डॉ राजीव शुक्ला ने किया।

समारोह में कॉलेज की वार्षिक पत्रिका साक्षी का लोकार्पण किया गया। इस अवसर पर होनहार विद्यर्थियो को विद्यांत गोल्ड मेडल प्रदान किया गया। इसके अलावा डी एस बोस,राम दुलारी,सरोजनी श्रीवास्तव कैलाश नाथ, श्रीवास्तव,केसी सरकार,शक्ति ज्योत्स्ना गोल्ड मेडल से भी नवाजा गया।
विक्टर नारायण विद्यांत त्यागी महापुरुष थे। एक समय उनके परिवार की गिनती लखनऊ के शीर्ष रईसों में होती थी। ब्रिटिश काल में उनके पिता और चाचा सरकारी कान्ट्रैक्टर थे। यहाँ का चारबाग स्टेशन, पक्का पुल, हजरतगंज का इलाहाबाद बैंक, सेन्ट्रल बैंक आदि भवनों का निर्माण उनके पिताजी ने ही कराया था। 5 जनवरी, 1895 में जन्मे  विक्टर नारायण विद्यांत का बचपन, युवावस्था राजसी अन्दाज में बीता। चाँदी के बर्तनों में खाने, महंगी विदेशी कारों में घूमने की सुविधा उन्हें हासिल थी। लेकिन जीवन में ऐसा पल भी आया जब इन भौतिक सुविधाओं के प्रति उनकी आसक्ति नहीं रह गयी। उन्होंने अपनी विदेशी राल्स रायस कार एक मठ के स्वामी जी को दान कर दी। चाँदी के बर्तन, चाँदी के पलंग, महंगे वस्त्र सबका त्याग कर दिया। इसकी जगह बांस की चारपाई, अल्मुनियम के नाममात्र के बर्तन, दो जोड़ी साधारण वस्त्र अपने व अपनी पत्नी के लिए रखे। शेष सम्पत्ति विद्यान्त हिन्दू कालेज की स्थापना में लगा दी।
उन्होंने बनारस में एंग्लो बंगाली कालेज तथा लखनऊ में छह शिक्षण संस्थाओं की स्थापना की। विद्यान्त हिन्दू प्राथमिक विद्यालय, विद्यान्त हिन्दू इंटर कालेज, विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय, शशि भूषण प्राथमिक विद्यालय, शशि भूषण बालिका इंटर कालेज और शशि भूषण बालिका महाविद्यालय उनके त्याग के प्रतीक के रूप में आज विद्यमान है। इसके अलावा राँची का अस्पताल, बंगाल के कृष्ण नगर का विद्यालय, अल्मोड़ा का टी.वी. सैनीटोरियम आदि संस्थाओं का वित्त पोषण वही करते थे। वह निर्धन, अनाथों की सहायता, बालिकाओं की शिक्षा, विवाह के लिए बड़ी मात्रा में धन खर्च करते थे। ब्रिटिश शासन ने उन्हें अवैतनिक मजिस्ट्रेट के पद से नवाजा था। विद्यान्त हिन्दू स्कूल की 1938 और डिग्री की स्थापना 1954 में की गयी थी। वह सांस्कृतिक गतिविधियों में भी रूचि रखते थे। लखनऊ के कालीबाड़ी ट्रस्ट, बंगाली क्लब, श्री हरिसभा के वह आजीवन सदस्य रहे। वह अखिल भारतीय बंग साहित्य सम्मेलन के अध्यक्ष चुने गए। 1938 में विद्यान्त हिन्दू महाविद्यालय प्रांगण में दुर्गापूजा समारोह की शुरुआत की। यह लखनऊ की प्राचीनतम दुर्गा पूजा में से एक है।
पांच जनवरी को विद्यान्त हिन्दू पीजी कालेज ने उनकी याद में एक सौ पच्चीसवाँ संस्थापक दिवस मनाया जाएगा। वी एन विद्यान्त ने समाज के हित में अपनी पूरी चल अचल सम्पत्ति दान कर दी थी। उनका यह जीवन समाज के लिए प्रेरणादायक है। समाज व राष्ट्र के हित को सर्वोच्च मानना चाहिए। यही विचार देश को विकसित बनाएगा। शिक्षक के हाथ में तीन पीढ़ियां होती हैं ऐसे में शिक्षकों की नियुक्ति योग्यता और पारदर्शिता से होनी चाहिए ऐसा कार्य वही कर सकता है जो अपनी जगह समाज और देश के हित को महत्व देता है। वीएन विद्यान्त जी का जीवन इसी की प्रेरणा देता है। एक समय भारत विश्व गुरु था। विश्व के अन्य देशों से लोग यहाँ ज्ञान प्राप्त करने आते थे। अंग्रेजों ने हमारी शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त किया। आजादी के आन्दोलन में जहाँ अंग्रेजों को हटाने का प्रयास हो रहा था, वहीं देश के विभिन्न हिस्सों में अनेक महापुरूष शिक्षा के प्रसार में लगे थे जिससे भारतीय समाज को जागरूक बनाया जा सके। विद्यान्त जी ऐसे लोगों में थे। भारत को पुनः विश्व गुरु बनाने का प्रयास करना होगा। आगे बढ़ने के लिए पहला कदम खुद ही उठाना पड़ता है बाद में अन्य लोगों का भी सहयोग मिलता है। सबके सहयोग से शिक्षा के स्तर को बढ़ाया जा सकता है। विद्यार्थी ही देश का भविष्य है। शिक्षित होने के साथ ही उन्हें राष्ट्रीयता व कर्तव्य पालन के विचार से ओत प्रोत होना चाहिए।

 

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