जब ज़िलाधिकारी की पत्नी ने ज़िलाधिकारी को यह सब बताया तो ज़िलाधिकारी आगबबूला हो गये और उन्होंने तुरन्त पुलिस अधीक्षक एस के सिंह को बुलाया और सारी बातों से अवगत कराया । यह तय हुआ कि ए डी एम के घर से जो उनके हिस्से की धनराशि हो, उसे भी बरामद करके मुक़दमा क़ायम करा दिया जाये ।
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संस्मरण:
‘कबिरा खड़ा बाज़ार में’-19 :


लेखक: हरिकान्त त्रिपाठी सेवानिवृत्त आईएएस अधिकारी हैं
‘जब ए डी एम हो गए बरबाद ‘
किसी भी इन्सान में त्रयोगुण यानि तमोगुण, रजोगुण, सतोगुण सदा मौजूद रहते हैं । जिस समय जो गुण प्रबल रूप में प्रभावी हो जाता है उस समय इन्सान वैसा ही व्यवहार करता है । जो श्रेष्ठ जन होते हैं वे त्रयोगुण में संतुलन बनाकर रखते हैं ।
प्रकरण 1992-93 का है जब मैं सिद्धार्थनगर में डी डी सी के पद पर तैनात था । मऊ में प्रधानमंत्री के आगमन का कार्यक्रम लगा तो शान्ति व्यवस्था के लिए ग़ैर ज़िले के मजिस्ट्रेटों और पुलिस अधिकारियों की मऊ में ड्यूटी लग गई । मेरी भी ड्यूटी लग गई तो मुझे ख़ुशी हुई कि मैं ज़िलाधिकारी मऊ से मिलकर उन्हें मुबारकबाद दे सकूँगा और अपने सहपाठी दीनानाथ नगर मजिस्ट्रेट मऊ के साथ एक रात बिता सकूँगा।
दरअसल उन्हीं दिनों मऊ में अपने अपर ज़िलाधिकारी मिश्रीलाल को ज़िलाधिकारी साहब ने रिश्वतख़ोरी के मामले में जेल भिजवा दिया था जिससे मैं बहुत प्रभावित था । जब मैं मऊ पहुँचा और ज़िलाधिकारी जो मेरे मित्र भी थे, उन्हें बधाई वग़ैरह दे चुका तो क़िस्सा जो मुझे मालुम हुआ वो प्रस्तुत कर रहा हूँ ।
मऊ में चुनाव हुए तो टेंट पंडाल में रेन प्रूफ़ पंडाल के नाम पर चालीस लाख का बिल तैयार हुआ । मुख्य निर्वाचन अधिकारी के माध्यम से उसका आधा बजट आबंटित हो गया और तत्कालीन ज़िलाधिकारी/ अपर ज़िलाधिकारी ने उसका भुगतान ठेकेदार लल्लू एंड संस को कर दिया । इसके बाद उनके ट्रांसफ़र हो गये और नये ज़िलाधिकारी और अपर ज़िलाधिकारी तैनात हो गये । जो आधा बजट बचा था वो अब पुन: आबंटित हो गया और ज़िलाधिकारी और अपर ज़िलाधिकारी मिश्रीलाल ने उस बीस लाख रूपये को भी लल्लू एंड संस को भुगतान कर दिया गया । भुगतान के बाद मिश्रीलाल साहब की पत्नी ज़िलाधिकारी साहब की पत्नी से मिलने उनके घर गईं और एक लाख रूपये वहाँ छोड़ आईं ।
जब ज़िलाधिकारी की पत्नी ने ज़िलाधिकारी को यह सब बताया तो ज़िलाधिकारी आगबबूला हो गये और उन्होंने तुरन्त पुलिस अधीक्षक एस के सिंह को बुलाया और सारी बातों से अवगत कराया । यह तय हुआ कि ए डी एम के घर से जो उनके हिस्से की धनराशि हो, उसे भी बरामद करके मुक़दमा क़ायम करा दिया जाये ।
मिश्रीलाल उस समय हरिश्चन्द्र सचिव विज्ञान एवं टेक्नॉलजी उ प्र सरकार के साथ दौरे पर थे । एस पी ने वायरलेस सेट के संदेश से नगर मैजिस्ट्रेट दीनानाथ को भी बुला लिया और सब लोग ए डी एम के सरकारी आवास पर पहुँच गये । तब तक ए डी एम मिश्रीलाल भी दौरे से वापस आ गये । डी एम ने मिश्रीलाल से पैसे के बाबत पूछा तो सीधे सादे मिश्रीलाल ने स्वीकार किया कि कुल बीस लाख रूपये भुगतान के लिए 5% के हिसाब डी एम का हिस्सा एक लाख रूपये उन्होंने भिजवाया था । उनके अपने हिस्से के बारे में पूछने पर बताया कि उनके हिस्से का एक लाख घर में रखा हुआ है। वो एक लाख रूपये भी मिश्रीलाल से बरामद कर कुल दो लाख रूपये की रिश्वतख़ोरी के लिए मिश्रीलाल के विरुद्ध मुक़दमा क़ायम करा दिया गया । मिश्रीलाल गिरफ़्तार हो गये और न्यायालय से जेल भेज दिए गये ।
जेल चले जाने के बाद मिश्रीलाल का पूरा परिवार तबाह हो गया । दो लाख रूपये की बरामदगी का प्रकरण अपने आप में बहुत गम्भीर था । 1992-93 में दो लाख रूपये की धनराशि बहुत बड़ी हुआ करती थी, उनकी सालों तक ज़मानत नहीं हुई और वे जेल में बंद पड़े रहे । इसी दौरान उनके एकमात्र पुत्र ने आत्महत्या कर ली या वो दुर्घटना में मर गया । पुत्र की मृत्यु के आघात को सहन न कर पाने के कारण मिश्रीलाल की पत्नी का भी देहान्त हो गया और परिवार में तीन अनाथ बच्चियाँ ही शेष रह गईं ।
जब मिश्रीलाल ज़मानत पर रिहा हुए तो परिवार पैसे पैसे का मोहताज हो चुका था । वे निलम्बित हो चुके थे और कमिश्नर वाराणसी को विभागीय कार्यवाही में जाँच अधिकारी बनाया गया था, सो वह बनारस में ही रहने लगे। वे फटेहाल कपड़ों में हवाई चप्पल पहन कर कलेक्ट्रेट बनारस आते और जिस अधिकारी से मिलते उसी के फ़ोन से देर देर तक लोगों को फ़ोन लगा लगा कर अपने प्रकरण में मदद के लिए गुहार लगाते । उनकी इस आदत से परेशान अधिकारियों ने उनसे सहानुभूति जताने या मदद करने के बजाय उनसे कन्नी काटना शुरू कर दिया । दरिद्रता और बीमारी से वे धीरे-धीरे विक्षिप्त से रहने लगे ।
1971 बैच की आई ए एस अधिकारी नीरा त्यागी (यादव) जी बहुत ईमानदार और सख़्त किन्तु मानवीय संवेदनशीलता से परिपूर्ण अधिकारी हुआ करती थीं । किसी कथित पारिवारिक दुर्घटना के कारण उनकी शादी महेन्द्र सिंह यादव आई पी एस (डी आई जी) से हुई जिन्होंने राजनीति के लिए बाद में आई पी एस से इस्तीफ़ा दे दिया । इस विवाह के बाद से नीरा यादव जी की कार्यप्रणाली ऐसी बदली कि वर्ष 1997 में नीरा यादव, बृजेन्द्र यादव और अखण्ड प्रताप सिंह को उनके अपने ही संवर्गीय साथियों ने आई ए एस एसोसिएशन की बैठक में महाभ्रष्ट चुना। इसके बावजूद मुलायम सिंह यादव ने नीरा यादव को 23 विभागीय कार्यवाहियाँ लम्बित रहने के बावजूद प्रदेश का मुख्य सचिव बना दिया । सी पी आई एल ( Centre for Public Interest Litigation ) नामक संगठन ने नीरा यादव की नियुक्ति के विरुद्ध पी आई एल कर दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने अक्टूबर 2005 में संदिग्ध सत्यनिष्ठा के आधार पर नीरा यादव को मुख्य सचिव के पद से हटाने का निर्देश जारी कर दिया । सरकार ने नीरा यादव को मुख्य सचिव के पद से चेयरमैन राजस्व परिषद के पद पर स्थानांतरित कर दिया ।
नीरा यादव मूलतः सहृदय और मानवीय दृष्टि की अधिकारी थीं । जब वे मुख्य सचिव का पद भार छोड़ने लगीं तो उन्होंने बहुत सारे लोगों पर कृपा कर उनके प्रकरणों का सकारात्मक निस्तारण किया । उनके स्टॉफ अधिकारी मधुकर द्विवेदी ने दबी ज़ुबान में नीरा जी से मिश्रीलाल का पूरा क़िस्सा बताया और कहा कि मिश्रीलाल पिछले बारह सालों से निलम्बित हैं और इस दौरान सपा बसपा और भाजपा सब की सरकारें आईं पर बर्बाद हो चुके मिश्रीलाल के दिन न बहुरे और वे वर्तमान में विक्षिप्त हो गए हैं और लगता है ऐसे ही रिटायर्ड हो जायेंगे। द्रवित होकर नीरा यादव ने तत्काल मिश्रीलाल की पत्रावली प्रस्तुत करने को कहा और मिश्रीलाल को आनन फ़ानन में बहाल कराकर ही अपना चार्ज छोड़ा ।
मिश्रीलाल बहाल तो हो गये पर बहाली के साल भर के भीतर ही उनका देहावसान हो गया । नीरा यादव जी को रिटायरमेंट के बाद नोएडा अथॉरिटी में नियमों के विपरीत अपने परिवारजनों के नाम प्लॉट आबंटन करने के कारण 2012 में तीन साल की सजा सुनाई जिसे सुप्रीम कोर्ट ने घटाकर दो साल कर दिया । कौन अच्छा है कौन बुरा , कौन ईमानदार है कौन भ्रष्ट यह तय करने में मेरा दिमाग़ आज तक चकरघिन्नी बना हुआ है ।

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