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दक्षिणापथ 11: “चले मदुरै की ओर”: रामधनी द्विवेदी

दक्षिणापथ 11

चले मदुरै की ओर…

वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी

धनुष्‍कोटि के बाद मदुरै मीनाक्षी जी के दर्शन की योजना थी। घर से निकले तीन दिन हो गए थे। जिस कैब से हम लोग कन्‍याकुमारी से आएथे, उसी से मदुरै भी जाना था। तनुपिल्‍लई के साथ यही तय था।वह बहुत अच्‍छे ड्राइवर हैं। कभी 80 के ऊपर नहीं चले। रास्‍ते में कुछ न कुछ जानकारी देते जाते थे। हमलोगों ने तो सुबह होटल में ही नाश्‍ता कर लिया था। तनुपिल्‍लई ने, जब हम लोग कमाल संग्रहालय देख रहे थे, उस समय नाश्‍ता किया। लगभग दस बजे हम मदुरै के लिए निकले। रामेश्‍वरम से मदुरै वही एनच 44 जाता है जो आगे चेन्‍नई तक चला जाता है। यह बहुत ही अच्छा है। पहले यह दो लेन था लेकिन बाद में चार लेन बनाया गया।

रामेश्‍वरम से मदुरै की दूरी लगभग 160 किमी है और तीन घंटे लग जाते हैं। बीच में रुक कर नाश्‍ता किया तो और समय लगेगा। सड़क अच्‍छी हो तो यात्रा सुखद हो जाती है। दक्षिण की अभी तक जितनी भी सड़कों से यात्रा की सभी अच्छी मिलीं। सिर्फ कन्‍याकुमारी से आते समय जिस रास्‍ते पर गूगल ने घुमा दियाथा, उसे छोड़कर। हम लोग लगभग डेढ़ बजे मदुरै पहुंच गए थे। बीच में उसी रामनाथपुरम के चौराहे पर चाय पी गई, इसलिए अधिक समय नहीं लगा। मदुरै में मुख्‍य काम मीनाक्षी के दर्शन का ही था। मंदिर दोपहर साढ़े 12 बजे बंद हो जाता था और शाम को चार बजे खुलता था। हमारे पास ढाई घंटे का समय था। तनुपिल्‍ल्‍ई का सुझाव था कि तिरुमल्‍लई नायका महल देख लिया जाय।तिरुमल्‍लई नायकार मदुरै के शासक थे जिनकी राजधानी कभी तिरची थी लेकिन बाद में वह मदुरै में अपना महल बनाए और यहीं से शासन किया,लेकिन उनके पोते को मदुरै पसंद नहीं आया इसलिए राजधानी फिर तिरची ले गया और साथ ही महल को भी उखाड़ कर ले गया जिससे यह काफी कुछ नष्‍ट हो गया। लेकिन महल का मुख्‍य हिस्‍सा अब भी बचा है जो संग्रहालय में बदल दिया गया है।


तिरुमल्‍लई नायका महल

यह महल वास्‍तु कला का बेजोड़ नमूना है जिसका अब चौथाई भाग ही बचा है। यह मीनाक्षी मंदिर से डेढ़ किमी की दूरी पर है। इसका निर्माण 1636 ईस्‍वी में नायक राजवंश के शासक तिरुमल्‍लई नायक( 1626 से 1659) ने कराया था जो इटैलियन और राजपूत शिल्‍प का अनुपम उदाहरण है। इसे देखने के लिए टिकट लगता है और पूरे महल को देखने में एक घंटे तक का समय लग जाता है। स्‍थानीय गाइड भी उपलब्‍ध रहते हैं जो इसकी बा‍रीकियों को बताते हैं। महल में इसका जो साइटप्‍लान उपलब्‍ध है उसके अनुसार यह नौ सौ फुट लंबा और 660 फुट चौड़ा है। गाइड से मिली जानकारी के अनुसार जब तिरुमल्‍लई नायक ने तिरची से अपनी राजधानी मदुरै स्‍थानांतरित की तो इसका निर्माण कराया। बाद में उनके पेाते को यहां की जलवायु रास नहीं आई तो वह फिर राजधानी तिरची ले गया और महल के काफी हिस्‍से को भी उखाड़ कर ले गया लेकिन उसका सपना पूरा नहीं हुआ। सिर्फ एक चौथाई भाग बचा रह गया जिसपर बाद में अंग्रेजों का कब्‍जा हो गया। महल के अन्‍य भाग अंग्रेजों ने तोड़कर समतल कर दिया। बाद में बचे हिस्‍से का जीर्णोद्धार भी अंग्रेजों ने ही कराया। इस समय महल का स्‍वर्ग बिलाशम भाग ही बचा है जिसमें दरबारे हाल और नृत्‍यमंडपम ही पूरी तरह सुरक्षित है। इनमें सिंहासन की प्रतिकृति ध्‍यान आकृष्‍ट करती है जिसके पास खड़े हो कर पर्यटक फोटो खिंचाते हैं।


इस महल की विशेषता इसके विशाल स्‍तंभ हैं जिनकी चौड़ाई इतनी अधिक है कि तीन लोग इनको अपनी अंकवार में नहीं ले सकते। इनकी ऊंचाई 20 मीटर और चौड़ाई चार मीटर है। ये सभी बलुआ पत्‍थर के बने हैं जिनके ऊपर इमारत टिकी है। गलियारों में इनका आकर्षण देखते ही बनता है। बाद में इन स्‍तंभों पर सीमेंट की पर्त चढ़ा दी गई लेकिन कहीं- कहीं से इसका पत्‍थर दिख जाता है। पूरे महल में 248 स्‍तंभ हैं। इतने विशालकाय पत्‍थर कहां से लाए गए,कहां उन्‍हें तराशा गया और कैसे खड़े किए गए,इसका जवाब गाइड के पास नहीं था लेकिन निर्माण कला देख दांतों तले अंगुली दबाना पड़ता है। कहते हैं कि बाद में अंग्रेजों ने इस वास्‍तु के आधार पर कई इमारतें बनवाईं।

नई दिल्‍ली के कनॉट प्‍लेस के स्‍तंभ भी इन्‍हीं को देख कर बनाए गए थे। वैसे दक्षिण भारत के सभी मंदिरों का शिल्‍प और वास्‍तु देख कर लोगों की आंखें फटी रह जाती हैं। इनकी मिनएचर मूर्तियां कलाकारों का लोहा मानने को मजबूर कर देती हैं। महल में जो छोटी छोटी मूर्तियां लगाई गई हैं,उनके बारे में पता चला कि ये ठोस पत्‍थर की न होकर इन्‍हें भूसी, बीजों की गिरी, गोंद और इसी तरह के कई मसालों को मिलाकर बनाए गए मिश्रण से बनाई गई हैं और उन्‍हें जगह जगह पर चिपका दिया गया है। इन्‍हें जिस मसाले से चिपकाया गया है,वह वर्षों तक उन्‍हें मजबूती से पकड़े रहता है। यदि कोई मूर्ति टूटी या खराब हुई तो उसे फिर से बना कर चिपका दिया जाता है। नृत्‍यशाला के गुंबद को संभाले रखने के लिए लोहे के दो रॉड लगाए गए थे जिन्‍हें चाभी से कसा जा सकता था,इस तरह गुंबद अपने स्‍थान पर बना रहता था और उसमें दरार आदि नहीं आती थी। ऐसी तकनीक कहीं और नहीं देखने को मिलती।
महल की छतों को रंगबिरंगी आकृतियों से सजाया गया है। इनमें प्राकृतिक रंगों का प्रयोग किया गया है जिससे लगता है कि उन्‍हें अभी हाल में ही रंगा गया है। महल बनने के बाद उन्‍हें एक बार ही दोबारा रंगा गया था। इसके बाद आजादी के बाद उन्‍हें रंगा गया लेकिन बाद में सिंथेटिक रंगों का इस्‍तेमाल किया गया लेकिन उनकी ताजगी देखते ही बनती है। कोई छत ऐसी नहीं होगी जिसे इस तरह की आकृतियों से सजाया न गया हो। रंगशाला थोड़ी निचाई में है जिसमें कुछ सीढि़यां उतरने पर पहुंचा जाता है। यहीं राजा नर्तकियों का नृत्‍य देखते थे। राजपरिवार की महिलाएं ऊपर गवाक्ष से नृत्‍य देखा करती थीं। महाराज के आसन का प्रतीक प्रस्‍तर आसन आज भी रखा हुआ है जो जीर्ण हो चुका है।


महल में ही कैदियों को रखने के लिए कैदखाने भी बनाए गए हैं जिन्‍हें अंधेरी कोठरी कहा जाता है। आम अपराधी और गिरफ्तार किए गए राजों आदि के लिए अलग- अलग कैदखाने भी बनाए गए थे। बड़े लोगों के कैदखाने अंदर के हिस्‍से में होते थे जिससे उनपर नजर रखी जा सके। महल के इस इलाके को बंद कर दिया गया है।


महल के अधिकतर हिस्‍से में देश और राज्‍य के अन्‍य हिस्‍सों से लाई गई मूर्तियां रखी गई हैं जिनमें विभिन्‍न देवी देवताओं की मूर्तियों के साथ ही अन्‍य आकृतियां भी हैं। रखरखाब के अभाव में इन मूर्तियों की हालत ठी नहीं है। एक कक्ष में तो कई मूर्तियां कबूतरों के बीट से अटी पड़ी थीं। शाम के समय में दरबारे आम में तमिल और अंग्रेजी में लाइट एंड साउंड शो होता है जिसमें महल के साथ ही नायक राजवंश के बारे में जानकारी दी जाती थी।


तिरुमल्‍लई नायक प्रतापी शासक थे और वह अपने आसपास के राजाओं और मुगल रियासतों के हमलों को सफल नहीं होने देते थे। सुरक्षा की दृष्टि से ही महल को इतना मजबूत बनाया गया था। गाइड ने एक कहानी बताई कि महल बन जाने के बाद तिरुमल्‍लई नायक ने मुनादी करा दी कि बिना प्रहरियों की नजर में आए यदि कोई महल में प्रवेश कर लेगा तो उसे एक गांव इनाम में दिया जाएगा। कहते हैं कि एक चोर गोह (एक जानवर- लिजार्ड- जो दीवार पर अपने पंजे इस तरह गड़ा देता है कि लोग उसकी पूंछ में रस्‍सी बांध कर दीवारों पर चढ़ जाते हैं। पहले किले और इसी तरह की ऊंची दीवारों पर चढने के लिए यही तकनीक इस्‍तेमाल की जाती थी।) की मदद से किले की छत पर चढ़ गया। छत में एक छेद किया और नीचे उतर कर एक कीमती सामान चोरी कर चला गया और किसी को पता नहीं चला। दूसरे दिन वह दरबार में आया और बताया कि उसने कल रात महल से यह चुराया है। तिरुमल्‍ल्‍ई नायक को गुस्‍सा तो बहुत आया लेकिन जबान के मुताबिक उस चोर को एक गांव पुरस्‍कार में दिया जिसका नाम ही तमिल में चोर का गांव पड़ा। जिस जगह उसने छत में छेद किया था,वह अब तक बना हुआ है और उससे रोशनी नीचे आती रहती है। हालांकि उसे लाल कपड़े से ढक दिया गया है।

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