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सोनिया और उनकी कांग्रेस…..”एक चेहरा यह भी!”: रामकृपाल सिंह

 

सोनिया और उनकी कांग्रेस…..एक चेहरा यह भी!”

रामकृपाल सिंह

बात 1959 की है। केंद्र में कांग्रेस सरकार थी और जनसंघ (भारतीय जनता पार्टी) विपक्षी पार्टी थी। उन दिनों जनसंघ कांग्रेस के खिलाफ जोरदार आंदोलन चला रही थी। उन्हीॅ दिनों प्रधानमंत्री को विदेश जाना पड़ा और जनसंघ ने अपना आंदोलन स्थगित कर दिया।

तत्कालीन जनसंघ अध्यक्ष श्री दीनदयाल उपाध्याय ने कहा-” इस समय प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू देश के प्रतिनिधि के रूप में विदेश में हैं। हमें इस समय एकजुटता का संदेश देना है कि प्रधानमंत्री के साथ पूरे देश की शक्ति है। उनके भारत लौटने के बाद हम फिर आंदोलन शुरू करेंगे और सरकार की बखिया उधेड़ेंगे।”

राष्ट्रवाद का एक रूप वह था। अब एक निगाह इस दूसरे रूप पर डालिए-
पिछले दिनों चीन सीमा पर भारतीय और चीनी सैनिकों में मारकाट हुई। समाचार यह भी है था कि चीन अपनी सेना भी तैनात कर रहा है। दोनों ओर से तनाव चरम पर है। इस समय शत्रु देश को हमें एकजुटता का संदेश देना चाहिए। इसके विपरीत कांग्रेस के नेतृत्व में अनेक दल न केवल सरकार पर हमलावर हैं बल्कि संसद का सत्र बुलाने की भी जिद पर अड़े हुए हैं। अगर संसद सत्र बुलाया जाता है तो स्वाभाविक है कि उसमें सैनिक तैयारियां, रणनीति, सीमा की सैन्य स्थिति आदि पर भी चर्चा होगी। इन चर्चाओं से देश को क्या लाभ होगा- कहना कठिन है किंतु संसद में दी गई एक-एक सूचना शत्रु देश के लिए अवश्य लाभकारी होगी। क्या कांग्रेस की मंशा यही है?
इस तरह की देश विरोधी हरकत कांग्रेस पहले भी कर चुकी है। पाकिस्तान से हुए कारगिल युद्ध के समय भी कांग्रेस ने पाकिस्तान की निंदा या आलोचना करने के बदले भारत सरकार से ही पूछा था-” क्या कारगिल युद्ध जरूरी था?” उसके इस कथन में राष्ट्रीय भावना का तो अभाव है ही ,उसके पीछे बुद्धिहीनता भी झांक रही है। पाकिस्तान की सेना ने चुपके से कारगिल की पहाड़ियों पर कब्जा कर लिया था। लड़ाई न लड़ते तो क्या उसे पाकिस्तान को सौंप देते? क्या इस उद्धरण से यह नहीं लगता कि कांग्रेस भी वही भाषा बोल रही थी जो कारगिल के बारे में पाकिस्तान बोल रहा था।

सोनिया और उनके सहयोगियों ने देश की सत्ता को हमेशा अपनी स्वार्थ- सिद्धि का माध्यम बनाया। यहां मैं इस तथ्य का उल्लेख नहीं करूंगा कि भारतीय किसानों का गेहूं सड़ता रहा और ऑस्ट्रेलिया से महंगे दामों पर गेहूं आयात किया जाता रहा क्योंकि कमीशन का रेट अच्छा था।( इंडिया टुडे- 12 मई 2006)
मैं यह भी नहीं कहूंगा कि भारत उस समय सबसे अधिक हथियार इटली से महंगे दामों पर खरीद रहा था क्योंकि सवाल मायके को फायदा पहुंचाने का था। (इंडिया टुडे- 6 मार्च 2013 )

हमारा मुख्य प्रश्न यह है कि भारत के हितों की बलि देकर शत्रु देश चीन का हित साधने का प्रयत्न क्यों किया जा रहा है।
देखिए कुछ बानगी —

भारत एक परमाणु शक्ति बनेगा- यह घोषणा 1960 में जवाहरलाल नेहरू ने किया था। लाल बहादुर शास्त्री के समय हम परमाणु शस्त्र निर्माण की तरफ कदम बढ़ा चुके थे लेकिन वह उनके निधन के कारण रुक गया और बाद में आर्थिक कारणों से ठप हो गया।

1974 में जब इंदिरा गांधी ने परमाणु परीक्षण किया तो कांग्रेस ने इसे बहुत बड़ी उपलब्धि बताते हुए देश की सुरक्षा के लिए आवश्यक बताया लेकिन जब 1998 में अटल बिहारी बाजपेई ने परमाणु परीक्षण किया तो सोनिया गांधी बाजपेई सरकार पर आक्रामक हो गई और उन्होंने मनमोहन सिंह और शरद पवार को बाजपेई से यह पूछने भेजा कि “यह परमाणु विस्फोट क्यों किया गया?” कांग्रेस की नीति में यह परिवर्तन एकाएक कहां से आ गया?

यहां यह भी बता दें कि उस समय परमाणु अप्रसार नीति लागू थी और परमाणु परीक्षण करने वाले देश को दंडित किया जाता था सो भारत का विरोध प्रायः सभी देशों ने किया लेकिन मात्र खानापूरी हुई। अमेरिका ने नाम मात्र को प्रतिबंध लगाया लेकिन उसी के बाद उसके राष्ट्रपति बिल क्लिंटन भारत आए। जापान ने सिर्फ बयान देकर भारत की निंदा की लेकिन कोई प्रतिबंध नहीं लगाया और रूस ने भी परमाणु परीक्षण की आलोचना तो की लेकिन भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों की सराहना भी की। भारत के इस परमाणु परीक्षण से सिर्फ 3 लोग बुरी तरह तिलमिलाए थे- चीन, पाकिस्तान और सोनिया गांधी। चीन और पाकिस्तान की तिलमिलाहट तो समझ में आती है लेकिन सोनिया क्यों नाराज हुईं? परमाणु हथियार बनाना तो कांग्रेस की घोषित नीति थी।

हालांकि परमाणु परीक्षण के बाद विश्व राजनीति में भारत का कद बढ़ा और विश्व में भारत का सम्मान भी बढ़ा और चीन ने भारत को आंखें दिखाना और धमकाना बंद कर दिया था। जब इस उपलब्धि पर सारा देश जश्न मना रहा था तो सोनिया गमगीन क्यों थीं? क्या इसलिए कि उनका मित्र चीन इससे से खुश नहीं था?

और भी बहुत कुछ था सोनिया नियंत्रित भारत में जो न केवल भारत के लिए घातक था बल्कि इसे यदि भारत के विरुद्ध षड्यंत्र कहा जाए तो गलत नहीं होगा। मार्च 2014 में जनरल बिक्रम सिंह ने सरकार को लिखा था कि “हमारी रक्षा- व्यवस्था अत्यंत जर्जर और दयनीय है। हमारे पास 20 दिन भी लड़ने के लिए गोला बारूद नहीं है।” आशय यही कि हमारी उस समय यह हालत थी कि हम पाकिस्तान के सामने भी नहीं टिक सकते थे। वायुसेना की भी शिकायत थी कि हमारी उपेक्षा की जा रही है। वायुसेना प्रणाली 97% निष्क्रिय हो चुकी है। हमारे पास रात में लड़ने की क्षमता नहीं है- आदि। क्या ऐसा नहीं लगता कि भारत की रक्षा व्यवस्था जानबूझकर इस हालत में पहुंचा दी गई थी- किसी अन्य देश के इशारे पर। यहां यह भी बता दें कि सेना की इन शिकायतों पर अंत तक कोई कार्यवाही नहीं हुई।

राहुल गांधी प्रायः भारत-चीन सीमा पर चीन के अतिक्रमण पर सवाल उठाते मिल जाएंगे और अभी पिछले दिनों चीन से झड़प पर भी संसद में बहस की मांग कर रहे हैं तो सवालों को उठाने वालों के समय भारत- चीन सीमा पर क्या हालत थी- एक नजर उस पर भी।

सोनिया के शासनकाल में (वाया मनमोहन सिंह) सेना पर डीजीपी का कुल मात्र 2.5 प्रतिशत खर्च होता था जो पाकिस्तान से भी कम था। भारत चीन की सीमा पर सड़क, पुल आदि की हालत दयनीय थी। भाात -चीन सीमा पर 27 प्रोजेक्टों की मंजूरी थी लेकिन सिर्फ एक बना था। यह सब उल्लेख 2014 की संसदीय समिति की रिपोर्ट में है इसी रिपोर्ट में चीनी घुसपैठ का भी जिक्र है।

जिन्होंने देश की रक्षा व्यवस्था को इस दयनीय स्तर पर पहुंचाया है, क्या उन्हें फौजी झड़प पर संसद बुलाने की मांग करने का अधिकार है?

पिछले दिनों गृह मंत्री ने संसद में सोनिया गांधी और उनके परिवार पर चीन से धन प्राप्त करने का खुलासा किया और कांग्रेस इसे नकार नही पाई। सोनिया गांधी की उपरोक्त तमाम चीन समर्थक और चीन को लाभ पहुंचाने वाली गतिविधियों में क्या चीन से प्राप्त धन की भी कोई भूमिका थी? इसे नकार पाना कठिन है।

है तो बहुत कुछ लेकिन यहां विस्तार में जाना संभव नहीं है। किन्तु यह भी कि सबकुछ सोनिया की देवरानी मेनका गांधी ने मात्र कुछ शब्दों में बता दिया।

– 19 मार्च 2014 को अपने बयान में मेनका गांधी ने कहा था कि “सोनिया गांधी इटली से खाली हाथ आई थीं और आज यह दुनिया की चौथे नंबर की अमीर कैसे हो गई?”

वास्तव में मेनका गांधी तमाम अखबारों में छपी उस खबर का जिक्र कर रही थीं जिसमें तमाम अमीरों की संपत्ति बताई गई थी। उसमें सोनिया गांधी दुनियाभर के अमीरों में चौथे नंबर पर थी लेकिन मेनका जी ने अपने बयान में उस धन का जिक्र नहीं किया था जिसकी मालकिन सोनिया गांधी थी। वह धन था- एक खरब, 24 अरब रूपए और स्वाभाविक है कि वह अभी भी है।
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