
प्रो हेरंब चतुर्वेदी की नव प्रकाशित पुस्तक ‘पंडित जवाहर लाल नेहरू- विचार, विवाद और व्यक्तित्व’ पर परिचर्चा
निराला के निमित्त और स्वराज विद्यापीठ के संयुक्त तत्वावधान में प्रो हेरंब चतुर्वेदी की सस्ता साहित्य मण्डल से नव प्रकाशित पुस्तक ‘पंडित जवाहर लाल नेहरु- विचार, विवाद और व्यक्तित्व’ पर पंडित नेहरू की पुण्य तिथि पर परिचर्चा का आयोजन हुआ. परिचर्चा का आयोजन वरिष्ठ कवि यश मालवीय, जिन्हें यह पुस्तक समर्पित भी की गई है, के संक्षिप्त व्याख्यान से हुआ. उन्होंने कहा कि हेरंब जी प्रतिपक्ष के लेखक हैं. जितना ही अधिक नेहरु से सम्बंधित अफ़वाहों को हवा देकर नेहरु को बदनाम किया जा रहा है नेहरु लगातार उतने ही प्रासंगिक होते जा रहे हैं. उन्होंने कहा कि आज के समय में नेहरु ही प्रकाश स्तम्भ हो सकते हैं. नेहरु जितने बड़े राजनेता थे उससे कहीं अधिक बड़े रचनाकार थे.

इसी क्रम में इतिहासकार अतुल चतुर्वेदी ने कहा कि नेहरु लोकतंत्र के अलंबरदार थे. उनकी हिंदी और अंग्रेज़ी दोनों भाषाओं पर ज़बरदस्त पकड़ थी.
अपने वक्तव्य में मुख्य अतिथि पूर्व विधायक एवं कांग्रेस के वरिष्ठ नेता श्री अनुग्रह नारायण सिंह ने कहा कि राजनीति की चुनौतियों को भली-भाँति जानते समझते हुए उन्होंने राजनीति के क्षेत्र में प्रवेश किया न कि परिवारवाद के कारण. आज सांप्रदायिकता का ज़हर गहरे उतर चुका है. उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि आज की परिस्थितियों में नेहरु क़ालीन अर्थनीति बहुत प्रासंगिक हो गई है. नेहरु के अपने समकालीन नेताओं के साथ विवाद बताए जाते हैं जिनका कोई आधार नहीं है. वे प्रखर लोकतंत्रवादी थे.
इस अवसर पर मुख्य वक्तव्य देते हुए इलाहाबाद विश्वविद्यालय के हिंदी विभाग के अध्यक्ष प्रो प्रणय कृष्ण ने कहा कि दरअसल आज जो हमले नेहरु पर हो रहे हैं वे नेहरु पर नहीं बल्कि Idea of India पर हैं.

उन्होंने आगे कहा कि इस देश को नेहरु और उनके विचारों से आगे जाना है. उन्होंने कहा कि नेहरु अपने समय में एक तरह से common denomerator लगते हैं और ये बात गांधी अच्छी तरह से जानते थे. नेहरु में सबसे बड़ा गुण था आत्मालोचना का होना. वे अपनी आलोचना का स्वागत करते थे लेकिन दुर्भाग्य से बाद की राजनीति से ये गुण लगातार ग़ायब होता गया है.

उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि स्वयं कांग्रेस ने नेहरु के साथ इंसाफ़ नहीं किया और नेहरु की नीतियों को पलटने का काम किया. उन्होंने कहा कि नेहरु ने भारत की सांस्कृतिक जड़ों को पोषित किया. उन्होंने अपने वक्तव्य का समापन करते हुए कहा कि आज भारतीय संस्कृति का नया भाष्य खड़ा करने का समय है.
स्वराज विद्यापीठ के कुलपति प्रो आर सी त्रिपाठी ने कहा कि एक ऐसा समय आता है जब व्यक्ति एक विचार बन जाता है. नेहरु ऐसे ही व्यक्तित्व हैं.
अपने अध्यक्षीय उद्बोधन में वरिष्ठ समाजसेवी श्री आनंद मालवीय ने कहा कि हमारी राष्ट्रीयता की जड़ें एक नहीं हैं बल्कि विविध हैं और नेहरु विविधता में एकता के सच्चे पैरोकार थे. उन्होंने हेरंब जी के साथ अपने लम्बे साथ को याद करते हुए कहा कि वे साहित्य और इतिहास में आवाजाही करते रहते हैं.

उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के काल को रेखांकित करते हुए कहा कि भारत एक राष्ट्र के रूप में स्वतंत्रता आंदोलन में जनता जनार्दन के संघर्षों से पैदा हुआ तभी वह साम्राज्यवादी अंग्रेज़ी हुक़ूमत का विरोध कर सका. नेहरु ऐसे ही राष्ट्रवाद के समर्थक जो जनता जनार्दन के संघर्षों से पैदा हो और विविधता में एकता लिए हुए हो.
कार्यक्रम का संचालन डा. सूर्य नारायण ने एवं धन्यवाद ज्ञापन विवेक निराला ने दिया.
इस अवसर पर प्रो अनिता गोपेश, के के राय, रामजी राय, अनिल रंजन भौमिक, प्रियदर्शन मालवीय, अंशु मालवीय, संध्या नवोदिता, वंदना मालवीय, परिमल चतुर्वेदी, गायत्री गांगुली, मोहन लाल यादव सहित बड़ी संख्या में शहर के साहित्यकार और कलाप्रेमी उपस्थित थे.
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