
डॉ आनंद श्रीवास्तव
विद्वानों के अभिलेखीकरण के क्रम में सिर्फ प्रयागराज में ही डेढ़ सौ प्रकांड विद्वान मिल गए हैं
हमारी संस्कृत भाषा न तो विलुप्त हो गई है और न ही इस भाषा में लेखन बंद हुआ है। बल्कि संस्कृत भाषी लोगों की संख्या निरंतर बढ़ती ही जा रही है, हां, उसका प्रदर्शन नहीं होता है। कुछ संस्कृत प्रेमी तो ऐसे हैं जो अपनी दिनचर्या में भी संस्कृत भाषा का प्रयोग करने में नहीं हिचकिचाते हैं। यहां तक कि रिक्शे वाले से भी भी संस्कृत में ही संवाद करते हैं और रिक्शेवाला उनके मंतव्य को समझ भी जाता है।
डॉ आनंद श्रीवास्तव बताते हैं कि उत्तर प्रदेश संस्कृत संस्थान 20 वीं शताब्दी में उत्तर प्रदेश में संस्कृत की विद्वत परंपरा पर एक ग्रंथ प्रकाशित करने की योजना पर काम कर रहा है जिसमें प्रत्येक जिले के संस्कृत के विद्वानों के योगदान का लेखा जोखा तैयार हो रहा है। प्रयागराज, कानपुर, अमेठी, वाराणसी, प्रतापगढ़ सहित कुल 25 जनपदों का काम पूरा भी हो चुका है। इस योजना से डॉ आनंद श्रीवास्तव के साथ उर्मिला श्रीवास्तव जी और लखनऊ की निर्मला जी भी जुड़ी हैं।
इसके अतिरिक्त प्रयागराज की पांडित्य परंपरा पर उर्मिला श्रीवास्तव जी का और काशी की पांडित्य परंपरा पर बलदेव प्रसाद उपाध्याय जी का ग्रंथ प्रकाशित हो चुका है। इस तरह से स्पष्ट हो जाता है कि संस्कृत जब तक हमारे भीतर है, तब तक संस्कृत का ह्रास नहीं हो सकता है और अब तो नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति के तहत इसके उन्नयन की रूपरेखा तैयार की जा रही है और संस्कृत के शिक्षकों को प्रशिक्षित भी किया जा रहा है।
संस्कृत भाषा में निरंतर कार्य हो रहा है, इसके प्रमाण हर जनपद से मिल रहे हैं। विद्वानों के अभिलेखीकरण के क्रम में सिर्फ प्रयागराज में ही डेढ़ सौ प्रकांड विद्वान मिल गए हैं जिन्होंने बीसवीं शताब्दी में अद्भुत रचनाएं की हैं और उनका योगदान अविस्मरणीय है।
संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान डॉ आनंद श्रीवास्तव ने संस्कृत में 16 ग्रंथों की रचना की है, विशेष रूप से कालिदास और अघोर तंत्र पर उनका गहरा अध्ययन है। इसके अतिरिक्त “आधुनिक संस्कृत काव्यशास्त्र” में उनकी विशेषज्ञता है।
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