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“समस्त विश्व की आशा का केंद्र बना भारत”: एक भारत वह भी था और एक भारत  यह भी है

“समस्त विश्व की आशा का केंद्र बना भारत”: एक भारत वह भी था और एक भारत  यह भी है
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डॉ. राम अवतार सिंह
जौनपुर

आज भारत विश्व के सबसे समृद्ध देशों के समूह जी-20 का मुखिया है जिनके पास विश्व की 80% अर्थव्यवस्था है। अभी पिछले दिनों अमेरिकी राष्ट्रपति वाइडन ने कहा कि ” मोदी से दुनिया को बहुत उम्मीदें हैं।”

फ्रांस, रूस, ब्रिटेन के भी शासनाध्यक्षों ने वर्तमान में विश्व राजनीति में भारत की भूमिका को सराहा है। पिछले दिनों बाली में जी-20 सम्मेलन में भारत के प्रधानमंत्री को सैल्यूट की मुद्रा में अभिवादन करते हुए अमेरिकी राष्ट्रपति की तस्वीर अखबारों में छपी थी। अभी कुछ दिन पहले अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की डायरेक्टर क्रिस्टलीना ने कहा था- ” भारत एक चमकता हुआ सितारा है और आने वाले वर्षों में वह दुनिया पर अपनी छाप छोड़ेगा।”

ऐसा लगता है कि आज विश्व राजनीति का केंद्र बिंदु भारत है।
लेकिन किसी भी उपलब्धि का आकलन तब तक नहीं किया जा सकता जब तक कि तुलना करने के लिए उसका अतीत भी सामने न हो।

बहुत दिन नहीं हुए, कुल शायद 30- 32 साल पहले भारत को अपना खर्च चलाने के लिए अपना सोना गिरवी रख कर ब्रिटेन से कर्ज लेना पड़ा था और हम दुनिया भर में मजाक और दया के पात्र बने थे।

एक वह भी समय था जब हम विश्व बैंक तथा अन्य संपन्न देशों के सामने सहायता पाने के लिए खड़े रहते थे- कभी धन के लिए तो कभी अन्न के लिए। जब अमेरिका ने नाराज होकर हमें सहायता में गेहूं देने से मना कर दिया था तो हमने रूस के सामने झोली फैलाई और उसने हमें 20 हजार टन गेहूं दिया था। उस समय देश में एक मजाक प्रचलित था कि भारत का प्रधानमंत्री जब भी विदेश जाता है तो उसके सूटकेस में एक अल्म्युनियम का कटोरा जरूर होता है।

आज अमेरिका के राष्ट्रपति आगे बढ़कर भारत के प्रधानमंत्री से हाथ मिला रहे हैं और एक वह भी दिन था जब भारत के प्रधानमंत्री एक हफ्ते वाशिंगटन के होटल में पड़े रहे और अमेरिका के राष्ट्रपति ने मिलने का समय नहीं दिया था। यहां प्रधानमंत्री का नाम देना उचित नहीं है क्योंकि प्रश्न प्रधानमंत्री का नहीं बल्कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भारत की हैसियत का था।

हुआ यह था कि न्यूयॉर्क में संयुक्त राष्ट्रसंघ की बैठक में भाग लेने के बाद भारतीय प्रधानमंत्री अपने कतिपय सहयोगियों के साथ अमेरिकी राष्ट्रपति से मिलने राजधानी वाशिंगटन पहुंचे। वहां एक होटल में रुके और उनसे मिलने का समय मांगा। प्रधानमंत्री के साथ गए भारत के विदेश मंत्री, अमेरिका में भारत के राजदूत- सभी लगातार प्रयत्न और दौड़- धूप करते रहे लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति ने भारत के प्रधानमंत्री को मिलने का समय नहीं दिया और वे वहां से राष्ट्रपति से मिले बिना भारत लौट आए।

बात 1991 की है। भारत ने अमेरिका से सुपरकंप्यूटर मांगा। अमेरिका तो वैसे ही भारत से नाराज था। उसका जवाब था-“पहले अपनी जनता का पेट भरने का इंतजाम करो।”

अमेरिका के ही मना करने पर हमको दुनिया के किसी भी विकसित देश ने सुपर कंप्यूटर नहीं दिया। यहां तक कि रूस ने भी नहीं दिया क्योंकि रूस तब तक बिखर चुका था और उसमें भी तब अमेरिका का विरोध करने का साहस नहीं था।
उसके पहले भी भारत के प्रति वह हिकारत का ही भाव था कि 1971 के बांग्लादेश युद्ध के समय दुनिया का एक भी देश भारत के साथ नहीं था। बाद में अनेक वार्ताओं के बाद रूस हमारे पक्ष में आया भी तो बड़ी अपमानजनक शर्तों के साथ। और यह भी कि इसमें रूस का अपना स्वार्थ भी था। विश्व महाशक्ति होने के बावजूद भी एशिया में रूस का कोई सहयोगी नहीं था जो उसे भारत के रूप में मिल रहा था। दूसरे उसे भारत के माध्यम से हिंद महासागर में प्रवेश मिल रहा था। भारत- रूस मित्रता की शुरुआत यहीं से हुई थी।

यही तब भी हुआ जब भारत में सिक्किम का विलय हुआ। तब भी भारत अकेला था। इस विलय से अमेरिका और चीन तिलमिला कर रह गए थे लेकिन चूंकि विलय का फैसला स्वयं सिक्किम की संसद का था इसलिए वे कुछ कर पाने में असहाय थे।

यह तो हुई बड़े देशों की बात। उस समय तो विश्व के तमाम छोटे- छोटे देश तथा छोटे- बड़े अंतरराष्ट्रीय संगठन भी भारत को उपदेश और चेतावनी देते थे।

अंतर्राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग का तो प्रायः बयान आता था कि भारत में मानवाधिकार की स्थिति, विशेषकर कश्मीर में चिंतनीय स्तर पर है। भारत उसमें सुधार करे। विश्व बैंक और अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष की भी आर्थिक मामलों में चेतावनियां प्रायः मिला करती थी।

वास्तव में वह एक बेचारा हिंदुस्तान था- “विपन्न और शक्तिहीन ” और आज दुनिया की निगाह में भारत विशिष्ट है। यही अनुभूति सुख देती है।

एक मुहावरा है-” अबरे की लुगाई, गांव की भउजाई।” हम वास्तव में अबरे की लुगाई थे। हमने बहुत अपमान झेला है। मुस्लिम देशों के सम्मेलन में भारतीय प्रतिनिधि फखरुद्दीन अली अहमद को शामिल होने की अनुमति नहीं मिली और वहां से उन्हें वापस लौटा दिया गया था। अपने द्वितीय राज्यारोहण में इराकी शासक सद्दाम हुसैन भारतीय प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिले यद्यपि वह प्रतिनिधिमंडल भारतीय प्रधानमंत्री का लिखित शुभकामना संदेश लेकर गया था।

अगर भारत में एक भी ईसाई नागरिक की हत्या हो जाती तो अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन सहित तमाम ईसाई देश भारत पर टूट पड़ते और आरोपों एवं उपदेशों की झड़ी लगा देते थे।
बड़े देश ही नहीं- पुर्तगाल, स्वीडन सहित तमाम छोटे देश भी और यहां तक कि कनाडा भी जिसकी स्वयं की हैसियत अमेरिका के एक राज्य जैसी है – मानवाधिकार से लेकर आतंकवाद तक पर हम को उपदेश देते थे जिसमें अहंकार और उपेक्षा का भाव स्पष्ट दिखाई पड़ता था।

बस, वह एक उपेक्षित और अपमान सहन करता भारत और एक यह – समस्त विश्व की आशा का केंद्र बना भारत।
यह परिवर्तन जिनके भी कारण हुआ, भारत उनका ऋणी है।

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डॉ. राम अवतार सिंह टी.डी. ला कॉलेज, जौनपुर के प्रधानाचार्य रहे हैं। विधि में पी-एच.डी. हैं। उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान तथा केंद्रीय हिंदी संस्थान एवं अन्य अनेक पुरस्कारों से अलंकृत हैं। अंतर्राष्ट्रीय विषयों के अच्छे जानकार हैं। अब सेवानिवृत्त हैं। 

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