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“काफ़ी बदलाव की जरूरत है शिक्षा के क्षेत्र में ” : आनंद मोहन भटनागर

“काफ़ी बदलाव चाहिए शिक्षा क्षेत्र में “
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आनंद मोहन भटनागर

किसी ज़माने मे यूपी बोर्ड मे यदि ५५ फ़ीसद नम्बर आ जाते थे तो उसकी होनहार छात्रों मे गिनती होती थी। प्रथम श्रेणी मे तो पूरे स्कूल से मात्र ४-५ ही छात्र बमुश्किल निकल पाते थे । आज न तो यू पी बोर्ड की कोई गरिमा बची है न ही सी बी एस सी या आई एस सी की । ९५ या ९९.७५ मार्क्स पाने वालों की संख्या कई हज़ारों मे होगी । इन होनहार बच्चों की क़लई जब खुलती है जब वह किसी प्रतियोगी परीक्षाओ मे बैठते है या प्रतियोगिता निकाल कर प्रथम वर्ष मेडिकल या इन्जीनियरिंग कालेज मे प्रवेश लेते है ।

ऐसे ही एक इनजिनियरिग कालेज मे जब एक क्लास मे ६० बच्चों मे ४५ बच्चे फ़ेल हो गये तो बहुत से बच्चों ने अपना रोना मुझसे रोया। बोले, अंकल क्या करे बाप ने क़र्ज़ लेकर मुझे इन्जीनियरग कालेज मे भेजा कुछ ने तो बैक से अब क्या होगा? १० बच्चे तो पाँचो विषय मे फ़ेल है तो किसी का ४ तो किसी का तीन मे बैक है । यदि आप यूनिवर्सिटी के निर्देशक से मिल कर बैक परीक्षा २-३ माह बाद करवा दे तो इससे कई छात्रों का भला हो जाएगा ।

विश्वास मानिए बड़ी मुश्किल से निदेशक काफ़ी लम्बी मुक्का लात के बाद राज़ी हुए। बोले, हमारे यूपीटीयू की अपनी छवि है हम अपने टेकनिकल विश्वविद्यालय को आई आई टी से कम नही समझते। बच्चे नही पढ़ेंगे तो फ़ेल होगे ही ।

मैंने उनसे कह दिया, ज़्यादा भाव न खाए आपके यहाँ वेटिंग लिस्ट मे जो १ लाख नम्बर पर है आप उनको भी घर से बुला कर एडमिशन के लिए कहते है । बहुत से कालेजो मे सीटें भरती ही नही है। कैसे आप अपनी टैकनिकल यूनिवर्सिटी की तुलना आई आई टी जैसी संस्थाओं से कर सकते है?

ख़ैर बैक परीक्षाएँ हुई और जो छात्र सारे विषय मे फ़ेल थे उसमें ५ ही क्षात्र ही परीक्षा मे पास हुए उनको द्वितीय वर्ष मे प्रवेश मिला बाक़ी घर बैठ गये ।

जहाँ तक मै सोचता हू हमारे देश मे शिक्षा का अर्थ केवल इतना ही है एक अदद नौकरी । इसके वास्तविक उद्देश्य को तिरोहित कर दिया गया है बहुत ही कम छात्र एेसे होगे जो अपनी ज्ञान संपदा बढ़ाने के लिए पुस्तकालयों या विभिन्न पुस्तकों का अध्ययन करते होगे।

कभी कभी कम पढ़े लिखे भी काफ़ी बौद्धिक परिपरकवता समझ बूझ विचारशीलता रखते है । अध्ययन रूचि का अभाव विचारों को पंगु बना रहा है । समूचे राष्ट्र पर नज़र डाले हमारे देश मे जितनी पत्र पत्रिकाएँ समाचार पत्र प्रकाशित होते है, उससे कई करोड़ ज़्यादा रूस जैसे कई देशो मे छपती है। रूस के एक समाचार पत्र प्रवादा इसकी कई करोड़ प्रति मात्र कुछ घंटों मे ही बिक जाती है। ये आँकड़े बताते है कि भारत मे पढ़ने ज्ञान प्राप्त करने मे रूचि का कितना अभाव है ।
—-आनंद मोहन भटनागर

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