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म. प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन’ का प्रतिष्ठित भवभूति अलंकरण: राजेश जोशी व डॉ जानकी प्रसाद शर्मा सम्मानित

म. प्र.हिन्दी साहित्य सम्मेलन‘ का प्रतिष्ठित भवभूति अलंकरण वर्ष 2021 के लिए सुविख्यात कवि श्री राजेश जोशी तथा वर्ष 2022 के लिए हिन्दी और उर्दू के जाने माने आलोचक, सम्पादक और अनुवादक डॉ जानकीप्रसाद शर्मा को प्रदान किये जाने का निर्णय हुआ है।

भवभूति अलंकरण की निर्णयक मंडल में इस बार सर्वश्री प्रो पुरुषोत्तम अग्रवाल, डॉ सूरज पालीवाल तथा डॉ उर्मिला शिरीष शामिल थे।

भवभूति सम्मान से अलंकृत श्री राजेश जोशी हमारे समय के महत्वपूर्ण रचनाकार हैं। वे उन विरले सृजनधर्मियों में शुमार हैं जिन्होंने कविता के अतिरिक्त कथा, नाटक, डायरी, अनुवाद और आलोचना सहित कई विधाओं में महत्वपूर्ण काम किया है। हँलाकि आमजन के बीच वे अपनी कविताओं के लिए ही जाने जाते हैं और एक कवि के रूप में उनकी लोकप्रियता अपने शिखर पर है।

उनकी कविताओं का मूल स्वर प्रतिरोध है, जनपक्षधरता है और यही पक्षधरता उनके जीवन में भी परिलक्षित होती है। यही प्रतिबद्धता उन्हें हिन्दी के कविता संसार का एक विश्वसनीय नागरिक भी बनाती है।बढ़ते बाजारीकरण, ध्वस्त होतीं लोकतान्त्रिक संस्थाएँ, बढ़ती सांप्रदायिक घृणा और हिंसक होते समाज में राजेश जोशी की कविताएं अपने पाठक को नैराश्य के घटाटोप से बाहर निकलने का रास्ता दिखाती हैं और उसके अंदर इस सबसे संघर्ष कर उबरने की ऊर्जा भी भर्ती हैं। उनकी कविताओं में समाज में फ़ैल रही हताशा और अन्याय से लड़ने की एक ज़िद है और यही ज़िद उन्हें एक बड़ा कवि बनाती है।

भवभूति सम्मान से अलंकृत डॉ जानकीप्रसाद शर्मा एक ऐसे अनुपम रचनाकर हैं जो पिछले पाँच दशकों से लगातार हिन्दी और उर्दू के बीच एक मजबूत सेतु की तरह अपना काम ख़ामोशी के साथ करते आ रहे हैं और आज भी उतनी सी सक्रियता और शिद्द्त के साथ उर्दू भाषा की महत्वपूर्ण कृतियों से हिन्दी संसार को स्मृद्ध कर रहे हैं। हिंदुस्तान की दोनों ही भाषाओं में उनकी आवाजाही है और इसी का परिणाम है कि उन्होंने अपने हिन्दी के पाठकों को “उर्दू साहित्य की परम्परा “, ” रामविलास शर्मा और उर्दू ” जैसी महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तकों का उपहार दिया। इसके अतिरिक्त उन्होंने ‘ शानी रचनावली ‘ का भी संपादन किया है। पिछले कुछ वर्षो में इस्मत चुगताई, मजाज़ और मंटो पर महत्वपूर्ण विशेषांकों का भी संपादन किया जो बहुत चर्चित हुए।

हिन्दी और उर्दू अदब में महत्वपूर्ण आलोचना पुस्तकों के अलावा उन्होंने तीन दर्जन से अधिक पुस्तकों का उर्दू से हिन्दी में अनुवाद किया जिनमे सज्जाद ज़हीर की ” रौशनाई “, काज़ी अब्दुस्सत्तार का उपन्यास ” दाराशुकोह ” तथा ‘ ग़ालिब ‘ के अनुवाद उल्लेखनीय उपलब्धि है।

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