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“नवग्रह में चन्द्रमा और उसका पेड़़” – 3 : प्रबोध चंदोल

 

आप जिस किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को समाप्त करने या उसका शुभ फल प्राप्त करना चाहते हैं, उस ग्रह के प्रतीक वृक्ष का रोपण, सेवा-संरक्षण, दर्शन, आदि आपको करना है। ढाक के तीन पात जैसे मुहावरे आपने खूब सुने होगें, आज जानते हैं कि ढाक के तीन पत्तों का कितना महत्व है आपके स्वास्थ्य के लिए

प्रबोध चंदोल

भारतीय संस्कृति में पेड़ के मायने

“नवग्रह में चन्द्रमा और उसका पेड़़: ढाक

“ढाक के तीन पात”

जैसा कि आप जानते ही हैं कि नवग्रह के 9 वृक्ष होते हैं जो अलग-अलग उन ग्रहों के प्रतीक माने जाते हैं।  आप जिस किसी भी ग्रह के दुष्प्रभाव को समाप्त करने या उसका शुभ फल प्राप्त करना चाहते हैं, उस ग्रह के प्रतीक वृक्ष का रोपण, सेवा-संरक्षण, दर्शन, आदि आपको करना है। इससे उक्त ग्रह का दुष्प्रभाव समाप्त हो जाता है और वह ग्रह आपके लिए शुभ फलदायी हो जाता है। जब हम इन वृक्षों का रोपण करते हैं तो तीन-तीन वृक्षों की तीन पंक्तियां बनाते हैं जिसमें चन्द्रमा की जगह पूर्व दिशा में सबसे दांए होती है।

इससे पहले के आलेख में हमने आपकी सुविधा के लिए नवग्रह का मानचित्र भी दिया था जिसे देखकर आप नवग्रह की स्थापना में चन्द्रमा की सही स्थिति जान सकते हैं। आपको मालूम ही है कि चन्द्रमा का वृक्ष ढाक या प्लाश है। आज हम आपको इस वृक्ष की उपयोगिता के बारे बताएंगे।


ढाक एक औसत ऊंचाई का एक पवित्र पेड़ है जिसकी एक टहनी में तीन पत्ते एक साथ जुड़े हुए आते हैं। इसका पत्ता काफी चौड़ा होता है जिस पर भोजन करना या प्रसाद ग्रहण करना बहुत फलदायी माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में इस वृक्ष को ब्रह्माजी का प्रतीक माना गया है। चन्द्रमा की शांति के लिए इस वृक्ष की लकड़ी को हवन में समिधा के रूप में प्रयोग किया जाता है तथा काष्ठ को जलावन के रूप में भी उपयोग किया जाता है। पारंपरिक रूप से इसके पत्तों से दोने व पत्तल आदि बनाए जाते रहे हैं। इस पेड़ के फूल व बीज औषधि के रूप में भी प्रयोग किए जाते हैं। इसके बीजों को नींबू के रस में पीसकर लगी हुई जांघ या बगल में लगाने से यह बीमारी ठीक हो जाती है।

इसके बीजों में आंतों में पैदा होने वाले विषाणु या कीड़ों को नष्ट करने की क्षमता होती है। इसके लिए ताजा बीजों के रस को शहद के साथ दिया जाता है। यह योग दस्तावर भी होता है। शरीर के किसी अंग में झटके से, पैर में मोच से या गठिया के कारण सूजन अथवा जलन आदि में इसके फूलों का प्रयोग अति लाभकारी है। इसके लिए एक बर्तन में पानी को उबालना रख दें, जब पानी उबलने लगे तो बर्तन के ऊपर एक जालीनुमा ढक्कन रखकर उसपर ढाक के फूलों को रखकर पका लें और इन पके हुए पत्तों को प्रभावित अंग पर रखें।

इसके पत्तों का प्रयोग शरीर से विजातीय द्रव्य को बाहर करने और खून साफ करने के लिए भी जाता है। इसके लिए ताजे या सूखे हुए दोनों तरह के फूलों का प्रयोग किया जा सकता है।

सूखे फूलों को पीसकर पाउडर बना लें और एक या दो ग्राम प्रतिदिन ले सकते हैं। यौन रोग, आंतों के रोग या अल्सर में इसके फूलों का पाउडर बनाकर एक चम्मच या पांच ग्राम मिश्री और दूध के साथ दिन में दो बार लेना हितकारी होता है। मधुमेह में इस पाउडर की दो ग्राम की खुराक ली जा सकती है। यह वीर्यवर्धक होता है तथा जल्दी स्खलन की स्थिति में दो ग्राम की खुराक मिश्री मिलाकर दी जा सकती है परन्तु मधुमेह के रोगी मिश्री न मिलाएं।

इसके फूलों का रंग गहरा लाल होता है अतः होली के अवसर पर इसके फूलों से प्राकृतिक लाल रंग तैयार किया जाता है जिससे त्वचा को किसी भी प्रकार की हानि नही होती है। इसके पेड़ से गोंद भी तैयार होता है जो खाने के काम आता है। इस प्रकार यह एक बहुउपयोगी वृक्ष है। यह पेड़ पहले बहुतायत में पाया जाता था परंतु अब कम हो गया है। हम सब को इसकी उपयोगिता को देखते हुए इसका रोपण करना चाहिए।

क्रमशः

लेखक का परिचय

प्रबोध चंदोलप्रकृति एवं पर्यावरण के लिए पिछले अनेक वर्षों से समाज में कार्यरत एक प्रकृति प्रेमी, जो अब तक अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर विभिन्न क्षेत्रों में लाखों वृक्षों का रोपण कर चुका है। आपने ’पेड़ पंचायत’ नामक संस्था की स्थापना की है ताकि इस धरती पर विलुप्त होती वृक्ष प्रजातियों को बचाकर धरती के अस्तित्व की रक्षा की जा सके। इस प्रयास में उन औषधीय पौधों को बचाने का भी संकल्प है जो लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। भारतीय संस्कृति में किस प्रकार पेड़ों के संरक्षण व संवर्द्धन की परंपरा है इसी पर उनके श्रंखलाबद्ध आलेख प्रस्तुत हैं।

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