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“नवग्रह में मंगल (Mars) और उसका पेड़़: ” – 5 : प्रबोध चंदोल

मंगल यदि किसी की राशि में उचित स्थान पर है तो उस व्यक्ति में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। यह शक्ति और आक्रामकता देता है तथा इसके प्रभाव से मनुष्य में किसी भी काम के प्रति एक जुनून सा पैदा हो जाता है।

खदिर की भस्म के प्रयोग से किसी भी मनुष्य का मंगल दोष समाप्त हो जाता है और वह व्यक्ति उर्जावान, महान, विद्वान बनकर प्रसिद्धि को प्राप्त करता है। 

प्रबोध चंदोल

भारतीय संस्कृति में पेड़ के मायने

“नवग्रह में मंगल (Mars) और उसका पेड़़ : खैर (खदिर) “

नवग्रह वाटिका में कुल नौ वृक्ष होते हैं जिन्हें तीन-तीन वृक्षों की तीन पंक्तियों में लगाया जाता है। इस वाटिका में पूर्व की दिशा को मुख करके खड़े होने पर बीच की पंक्ति में बिलकुल दांए अर्थात् दक्षिण में मंगल के वृक्ष का स्थान है।

यहीं पर इसके प्रतीक वृक्ष ’खैर’ या ’खदिर’ को लगाया जाता है। यह पूरे भारत में पाया जाने वाला एक जंगली पेड़ है। मंगल ग्रह का रंग लाल है और इस ग्रह को भूमिपुत्र भी कहा जाता है।

मंगल यदि किसी की राशि में उचित स्थान पर है तो उस व्यक्ति में सकारात्मक उर्जा का संचार होता है। यह शक्ति और आक्रामकता देता है तथा इसके प्रभाव से मनुष्य में किसी भी काम के प्रति एक जुनून सा पैदा हो जाता है। इसके विपरीत यदि मंगल उचित स्थान पर नही है तो व्यक्ति में खीज पैदा होती है, उसे गुस्सा बहुत आता है, उसका रक्तचाप भी बढ़ जाता है तथा उसमें खून की कमी के साथ-साथ खून में दोष पैदा हो जाता है। ऐसे व्यक्ति का जीवन अस्थिरता से भर जाता है।

खदिर की भस्म के प्रयोग से किसी भी मनुष्य का मंगल दोष समाप्त हो जाता है और वह व्यक्ति उर्जावान, महान, विद्वान बनकर प्रसिद्धि को प्राप्त करता है।

खैर की लकड़ी से कत्था बनाया जाता है जो काफी महंगा उत्पाद है। इसके पत्तों, नई शाखाओं और लकड़ी से विभिन्न रोगों के लिए दवा तैयार की जाती है। ठंड़ और कफ के लिए इसकी छाल के काढ़े में दूध मिलाकर लेने से लाभ होता है। त्वचा के रोगों में इसके काढ़े को पीने के अलावा उसके पानी में नहाने से लाभ होता है।

मधुमेह और मूत्र मार्ग के रोगों में इसके प्रयोग से चमत्कारिक लाभ होता है। त्वचा रोग में इसकी लकड़ी का पाउडर मलहम की तरह सीधे त्वचा पर लगाया जा सकता है। चोट से बने जख्म पर खून को रोकने के लिए इसकी लकड़ी के मलहम को जख्म पर लगाने से उसमें मवाद निकल़ना बन्द होकर वह ठीक होने लगता है। सूजन, खाज खुजली, खांसी व गले में खराश जैसे रोगों में इसका प्रयोग लाभदायक है।

क्रमशः

लेखक का परिचय

प्रबोध चंदोल, प्रकृति एवं पर्यावरण के लिए पिछले अनेक वर्षों से समाज में कार्यरत एक प्रकृति प्रेमी, जो अब तक अनेक संस्थाओं के साथ मिलकर विभिन्न क्षेत्रों में लाखों वृक्षों का रोपण कर चुका है। आपने ’पेड़ पंचायत’ नामक संस्था की स्थापना की है ताकि इस धरती पर विलुप्त होती वृक्ष प्रजातियों को बचाकर धरती के अस्तित्व की रक्षा की जा सके। इस प्रयास में उन औषधीय पौधों को बचाने का भी संकल्प है जो लगभग विलुप्ति के कगार पर पहुंच चुकी हैं। भारतीय संस्कृति में किस प्रकार पेड़ों के संरक्षण व संवर्द्धन की परंपरा है इसी पर उनके श्रंखलाबद्ध आलेख प्रस्तुत हैं।

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