
ऋतंधरा मिश्रा
प्रयागराज।
बीसवीं सदी की केंद्रीय चेतना मुक्ति कामना है इसका पूर्वार्ध राष्ट्रीय मुक्ति का समय जिसमें मजदूर किसानों के साथ साथ महिला वर्ग और दलित पिछड़ा समाज की अविस्मरणीय भूमिका रही है किंतु इनकी इस अ प्रीतम भूमिका को न केवल नजर अंदाज किया गया वरना इन्हें दोयम दर्जे का नागरिक जीवन जीने को बात भी किया गया यह ठीक है कि अतीत हुई सदी के उत्तरार्ध में संविधान प्रदत अधिकारों का लाभ उठाकर खासतौर से महिला वर्ग और दलित वर्ग अपनी अलग पहचान बनाने तथा अलग व्यक्तित्व निर्माण करने में कामयाब हुआ किंतु सवाल केवल प्रबुद्ध महिला वर्ग एवं सुविधा भोगी दलित वर्ग का ही नहीं वरन उस बहुसंख्यक किसान कामगार इस्त्री और दलित स्त्री तथा दलितों में भी दलित जनों का है जो आज भी प्रथम दर्जे की नागरिकता तथा सामान्य मानवीय अधिकारों के लिए छटपटा रहे हैं।

साहित्य और समाज परिवर्तनशील होता है साथ ही दोनों का संबंध भी अन्योन्याश्रित होता है साहित्य में समाज प्रतिबिंबित होता है और समाज साहित्य से प्रभावित हुए बिना नहीं रहता साहित्य को सामाजिक उत्पादन एवं सामाजिक साक्ष्य मानने वाली नई साहित्यिक अवधारणाओं का परिणाम है कि समकालीन परिवेश में नारी मुक्ति एवं दलित मुक्ति को बाड़ी देने वाले साहित्य के समाजशास्त्रीय अध्ययन मदन और मूल्यांकन पुनः मूल्यांकन की प्रवृत्ति तेजी से बढ़ रही है।
हिंदी साहित्य के आधुनिक काल का आरंभ गद्य से तथागत में भी खासतौर से कथा साहित्य से होता है कथा लेखन के क्षेत्र में मुंशी प्रेमचंद्र का आगमन एक अविस्मरणीय एवं युगांत कारी घटना है प्रेमचंद जी ने कहानी और उपन्यास का जीवन और समाज के यथार्थ से अटूट रिश्ता कायम किया कहना गलत ना होगा कि उपन्यास और यथार्थवाद के अंतर संबंधों की गहरी पकड़ का यदि कोई लेखक हुआ तो निस्संदेह वह प्रेमचंद ही है प्रेमचंद्र के पास यथार्थवादी जीवन दृष्टि थी और मानवतावाद का चश्मा मानवतावादी रचनाकार होने के कारण ही वे कथा साहित्य में समाज के विभिन्न वर्गों एवं जीवन के विभिन्न पक्षियों तथा मनुष्य के विभिन्न रूपों का यथार्थ चित्रण करने के बावजूद किसान मजदूरों एवं स्त्रियों आज दलित जनों के प्रति अपने अधिक पक्षधरता तथा गहरी सहानुभूति को छिपा नहीं पाते प्रेमचंद ने सैकड़ों कहानियां तथा करीब एक दर्जन उपन्यास लिखा है किंतु नारी पात्रों की दृष्टि से सेवासदन, निर्मला, गबन, कायाकल्प, कर्मभूमि, रंगभूमि तथा गोदान उपन्यास का विशेष महत्व है।

सेवा सदन में नारी मुक्ति चेतना का प्रारंभिक उन्मेष देखने को मिलता है उपन्यास की नायिका संबंध रूपवान और स्वाभिमानी लड़की है दहेज के भाव में तथा पिता के जेल चले जाने के पश्चात पर आश्रित हो जाने के कारण उसका विवाह दोहा झूमर गजाधर के साथ कर दिया जाता है गरीबी और अनमेल विवाह के चलते उसकी सारी आशाओं आकांक्षाओं तथा भविष्य के सुंदर सपनों पर पानी भर जाता है उसका पति उसे पग पग पर अपमानित लांक्षित करता है तथा उसके चरित्र पर संदेश कर उसे घर से निकल जाने की धमकी देता है अन्नदाता की गुलामी करने और उसकी गालियां खाने की बजाए सुमन घर से निकल कर चल देती है और भोला भाई नाम की वेश्या के यहां आशय पाती है भोला बाई की कहानी भी बहुत कुछ सुमन जैसी है अंतर सिर्फ इतना है कि सुमन हिंदू है और वह मुस्लिम सुमन अपने मान सम्मान की रक्षा के लिए पति का घर छोड़ दी है और एक ऐसे पुरुष की तलाश में रहती है जो उसकी व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करते हुए उसे अपना बना सके किंतु उसकी कामना पूरी नहीं होती और वह भौतिक जीवन से ऊब कर विधवा आश्रम में चली जाती है ।कुलीनता का ढोंग करने वाले लोग उसे यहां भी चैन से नहीं रहने देते वास्तव में सुमन और भोला भाई के चरित्र के माध्यम से प्रेमचंद यह दिखाना चाहते हैं कि दहेज, अनमेल विवाह, पति का संदेह और पत्नी को घर से निकाल दिया जाना आदि पितृसत्ता की दहलीज का रास्ता दिखाती है संदर्भ चाहे हिंदू घरों का हो या मुस्लिम समाज का।

निर्मला उपन्यास में निर्मला के जीवन की करुण कहानी काजल आर्थिक पराधीनता की कोख से होता है निर्मला का विवाह धन अभाव के कारण विदुर तोताराम से होता है अतः ससुराल में कदम रखते ही वह तोताराम के तीन बेटों की मां बन जाती है पिता की उम्र के पति के सामने जाने उनसे हंसने बोलने में उसे संकोच होता है उधर तोताराम ना केवल उसके चरित्र पर संदेह करते हैं बल्कि अपने लड़कों के बिगड़ने और बिछड़ने के लिए भी उसे ही जिम्मेदार ठहराते हैं और पारिवारिक उलझनों को सुलझाने निपटाने के बजाय घर छोड़ कर चले जाते हैं आर्थिक रूप से पूर्णतया पति पर आश्रित रहने वाली निर्मला जैसे तैसे गृहस्थी की गाड़ी चलाते हुए कुछ और सोचती है उसे अपने जीवन की विडंबना ओके लिए कोई मलाल नहीं है उसे तो बस एक ही चिंता खाए जाती है कि जो दुर्गति उसकी हुई वही गति उसकी कन्या की ना हो पता जीवन के अंतिम क्षणों में अपनी ननद से कह जाती है कि-” चाहे कुंवारी रखिएगा या विष देकर मार डालिए गा पर किसी को पात्र की गले ना मढियेगा”। वस्तुतः निर्मला की यह व्यथा समूची नारी जाति की अंतर वेदना बन जाती है।
गबन उपन्यास की जालपा सुमन और निर्मला से भिंड एक नए ढंग की ईमानदार और साहसी नारी है वह ना तो निर्मला की तरह घुट घुट कर प्राण देने वाली है और ना ही सुमन की तरह हड़बड़ी में भटगांव वाली राह की ओर कदम ही उठाती है सच कहा जाए तो जालपा एक देशभक्त नारी है वह फांसी पर चढ़ने वाले क्रांतिकारियों की बलिदान भावना से प्रभावित है यही कारण है कि जब उसका पति मुखबिरी करके क्रांतिकारियों को पकड़ा देता है तो वह इस विश्वासघात के लिए अपने पति रमानाथ को फट करती है यह ठीक है कि जालपा को आभूषणों से बेहद प्यार था और उसकी इस नादानी की वजह से उसके पति को सरकारी रकम गबन करनी के जुर्म में गिरफ्तार होना पड़ा किंतु हमें या नहीं बोलना चाहिए कि आभूषणों के प्रति लगाव के लिए औरतें स्वयं नहीं बल्कि वह पितृ सत्तात्मक समाज व्यवस्था जिम्मेदार हैं जो पुरुषों का प्रभुत्व कायम रखने के लिए स्त्रियों को गहने जैसी तुच्छ चीज में उलझे रहने का प्रशिक्षण पीढ़ी दर पीढ़ी देती आ रही है।

रंगभूमि तथा कर्मभूमि उपन्यास के नारी पात्रों के माध्यम से प्रेमचंद्र प्रेम का नया मानवीय आधार प्रस्तुत करते हैं रंगभूमि की सोफिया विचारों से मानवतावादी है वह ऐसा ही है और जाति धर्म के बंधनों को नहीं मानती तथा विनय नाम के हिंदू लड़के से प्रेम करती है इसी प्रकार कर्मभूमि में मुसलमान लड़की सकीना का हिंदू लड़के अमरकांत से प्रेम का चित्रण है कायाकल्प में प्रेमचंद जी नारी जीवन का एक नया अर्थ सामने लाते हैं इसमें मुख्य नारी पात्र रानी देवप्रिया को विलासी जीवन त्याग ते हुए दर्शाया गया है।
गोदान स्वाधीनता पुर भारत का एक ऐसा सामाजिक आख्यान है जो भारतीय समाज को कुलीन ता वादी चश्मे से देखने के बजाय निम्न वर्गीय सोच का आधार प्रस्तावित करता है दलित विमर्श एवं नारी विमर्श जैसे ज्वलंत मुद्दे यहां अपनी केंद्रीय उपस्थिति दर्ज कराते हैं तथा शोषण एवं उत्पीड़न की शिकार स्त्रियां नारी एकजुटता का जीवंत उदाहरण प्रस्तुत करती है पंडित माता दी और दलित सिलिया की अंतर कथा दलित चेतना की जीवन कथाएं सीलिया की त्रासदी यह है कि दलित स्त्री होने के कारण वह दोहरे तिहरे शोषण की शिकार है दलित की स्थिति मैं वह पंडित दाता दीन की मुफ्त की मजदूर है और नारी की स्थिति में दाता दीन उसका शारीरिक शोषण करते हैं और मातादीन योन शोषण जिस मातादीन के लिए वह अपने परिजनों को त्याग दी है जिसके लिए कोल्हू के बैल की तरह कटती है तथा जिसे वह टर्बन प्राण सब समर्पित करती है उसकी नजर में भी वह मात्र एक काम करने वाली मशीन के सिवा और कुछ नहीं है गोदान की सबसे मुखर नारी पात्र धनिया है वह एक साहसी और विद्रोह री स्त्री है पंडित दाता दिन अपने बेटे का धर्म भ्रष्ट होने के बाद जब सिलिया को दुत्कार देते हैं तो वह धनिया ही होती है जो बिरादरी की परवाह किए बगैर अछूत सीलिया को अपने घर में पनाह देकर बहना पर की अद्भुत मिसाल पेश करती है अवसर आने पर धनिया अपने पति होरी को उसके दब्बू पद के लिए फटकार दी है तथा पंचों द्वारा होली का जुर्माना लगाने जाने पर पूरी बिरादरी को चुनौती देती है इतना ही नहीं जिस दाता देने होरी को किसान से मजदूर बना दिया उस दाता दिन को ललकार ते हुए वह एक स्वाभिमानी निर्भीक तथा विद्रोही तेवर की श्रमिक स्त्री के रूप में हमारे सामने आती है सच कहा जाए तो नारी चाहे निम्न वर्ग की हो या उच्च वर्ग की हो या स्वर्ण वर्ग की हो उसकी नियति समाज में एक सी है दलित और पिछड़े समाज की स्त्री सीलिया और धनिया के अलावा सवण स्त्री मीनाक्षी जो जमींदार की बेटी होकर भी प्रतिशतता की दूरी तेरी मार जलती है तथा उसकी नियत निर्धन होरी की बेटी रूपा से भिन्न नहीं है।
प्रेमचंद के उपन्यासों में चित्रित संघर्षशील नारी सामान्य मानवीय अधिकारों तथा वैयक्तिक स्वतंत्रता के लिए लड़ती जूझती हुई ना केवल अपने ऊपर होने वाले अत्याचार एवं शोषण का प्रतिरोध करती है बल्कि आत्मनिर्भर होने की चेष्टा भी करती है । अंत में कहना प्रसांगिक न होगा कि प्रेमचंद गोदान में निम्नवर्गीय किसान- कामगार स्त्री और दलित स्त्री के जीवन का जो यथार्थ धनिया और सीरिया के माध्यम से सामने लाते हैं आजादी के बाद आज उसकी तीसरी चौथी पीढ़ी की मुक्ति का यथार्थ लेखन समकालीन कथा लेखन में या तो स्थगित है या फिर सिरे से गायब है। इस स्थगित कथा को आगे बढ़ाएं बगैर तथा नारी मुक्ति के एजेंडे में इन्हें शामिल किए बगैर स्त्री विमर्श का अध्याय अधूरा रहेगा।
ऋतंधरा मिश्रा
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