
वरिष्ठ पत्रकार रामधनी द्विवेदी
“जब गाली भी प्रिय लगने लगती है…”
कई दशक पहले की बात है। मैं छोटे भाई की ससुराल जाने लगा तो मां ने धीरे से कहा कि वहां जब तुम भोजन करने बैठोगे तो महिलाएं गारी गाएंगी। तुम जब भोजन करके उठने लगना तो थाली के नीचे कुछ रुपये रख देना और कहना कि महिलाओं को पान खाने के लिए है।
मैं तब लगभग 30-32 साल का था और इस तरह की जानकारी नहीं थी। मैने गांव में किसी नए समधी या दामाद के आने पर गारी गाते तो सुना था लेकिन उन्हें इसके लिए पैसे दिए जाते हैं, यह जानकारी नहीं थी। बाद में पता चला कि जो पैसे मेहमान देते थे, उसे शगुन के रूप में उनमें बांट दिए जाते थे। मां की यह सीख मैने याद रखी और बाद में ऐसे मौके आने पर थाली के नीचे रूपये रखता जरूर था।
गारी गाली का अपभ्रंस है। सिर्फ यही अवसर है जब गारी दी नहीं जाती बल्कि गायी जाती है। इसके अलग तरह के गीत होते हैं जिनमें अश्लीलता भी होती है। लेकिन उनके पीछे सिर्फ हंसी- मजाक या विनोद ही होता है। गांवों में पहले जब गारी के पात्र मेहमान आते थे तो अड़ोस पड़ोस की महिलाएं इसके लिए बुलाई जाती थीं। कुछ महिलाएं गाली गाने की विशेषज्ञ मानी जाती थीं। वे मेहमान की बहन, मां और पुरुषों का नाम लेकर लेकर आशुगीत बना लेती थीं और गाती थीं। कुछ महिलाएं संकोच करती थीं लेकिन कुछ पूरे जोर-शोर से इसे गाती थीं।
मेहमान ने भोजन शुरु किया नहीं की गारी शुरू और जब तक वह बाहर जाकर मुंह नहीं धो लेता था, तब तक यह क्रम जारी रहता था। उसके जाते ही महिलाएं आपस में हंसी करने लगती थीं। मुझे पता नहीं कि भारत के कितने क्षेत्रों में यह परंपरा है। अब तो शायद ही होगी क्यों कि अब नई बहुएं तो अवसर विशेष पर सामान्य लोग गीत नहीं गा पातीं गारी कौन गाता होगा?
लेकिन यह परंपरा पुरानी है। बाबा तुलसी दास ने रामचरित मानस में भगवान श्री राम के विवाह के वर्णन में इस परंपरा का वर्णन किया है। जब राजा दशरथ जनकपुरी में भगवान के विवाह के उपरांत भोजन करने बैठते हैं तो जनकपुरी की महिलाएं गारी गाती हैं। देखें—-
पंच कवल करि जेवन लागे,गारि गानि सुनि अति अनुरागे।
जेवहिं देहिं मधुर धुनि गारी, लै लै नाम पुरुष अरु नारी।
समय सुहावनि गारि बिराजा, हंसति राउ सुनि सहित समाजा।
राजा दशरथ गारी सुनकर प्रसन्न हो रहे हैं। वह रस लेकर भोजन कर रहे हैं और अपने साथ बैठे परिजनों के साथ उसका आनंद ले रहे हैं। तुलसी बाबा भगवान के विवाह में इतने मगन हैं कि एक-एक लोक व्यवहार की बात करते हैं। इतना सूक्ष्म वर्णन शायद ही किसी कवि ने किसी घटना का किया हो। वह पुष्पवाटिका प्रसंग से दशरथ के अवध पुरी पहुंचने तक का वर्णन 58 दोहों में करते हैं। बालकांड के दोहा नंबर 285 से 343 तक यही वर्णन है। एक एक चौपाई आपको उस नैसर्गिक आंनद तक पहुंचा देगी और लगेगा कि आप खुद भगवान के विवाह के दृष्टा हैं।

मैने सोचा कि क्या वाल्मीकि ने भी इस प्रसंग का वर्णन इसी तरह किया है। लेकिन वहां ऐसा नहीं मिलता। वहां भगवान के विवाह का प्रसंग अधिक विस्तार नहीं पाता है। हां, वहां राजा दशरथ और जनक की वंशावली का विस्तार जरूर है। वशिष्ठ और सतानंद क्रमश: दशरथ और जनक के पूर्वजों की जानकारी शाखोच्चार में देते हैं। सनातन भारतीय विवाह पद्धति में शाखोच्चार की परंपरा है। वर और वधू के पक्ष के पुरोहित दोनों परिवारों के पूर्वजों का नाम लेकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं। लेकिन वाल्मीकि रामायण में यह बहुत विस्तार से है और दशरथ और जनक की पूरी वंशावली ही दी गई है। वहां विवाह की लौकिक पंरपराओं का उल्लेख नहीं मिलता। यदि शाखोच्चार को हटा दिया जाए तो विवाह को बहुत विस्तार से नहीं बताया गया है।
रामचरित मानस में तुलसी बाबा के इतने सूक्ष्म विस्तार में जाने का अर्थ यह है कि वह लोक मानस, परंपरा और व्यवहार को बहुत गहराई तक देखते- समझते हैं। वह वनवासी नहीं, लोकवासी हैं। इसलिए वह भगवान राम के विवाह का इतना सुंदर वर्णन कर पाते हैं।
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