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ग़जल : ‘चिता की गीली लकड़ियों की तरह जल रहा हूँ’ 

आलोक कुमार श्रीवास्तव: अभी तक रिमझिम रही जो गुनगुनाहट,

उभर आयी है वही आवाज़ खुलकर

 

                      ग़ज़ल 

घुट रहा हूँ, घुल रहा हूँ, धीरे-धीरे गल रहा हूँ

ढाँप कर खुद को समय से, जैसे-तैसे चल रहा हूँ

 

गो कि मरने की वजह फौरी कोई दिखती नहीं

चिता की गीली लकड़ियों की तरह मैं जल रहा हूँ

 

सोचिए, कैसे जिए जाऊं पहन कर बेड़ियाँ

जानते हैं आप, पहले कितना मैं चंचल रहा हूँ

 

ज़िंदगी की तंगहाली के दिनों में आज भी

कुछ नहीं तो अपनी सूखी हड्डियां ही मसल रहा हूँ

 

सारे सपने कब तलक संदूक में ही क़ैद रक्खूं

आइएगा आप, मुझको जल्दी है, मैं निकल रहा हूँ

 

2

हो रही बरसात फिर से आज खुलकर

मिल रही सौगात धरती गगन धुलकर

 

निकट आए और टकराए परस्पर

बादलों के दिख पड़े सब राज़ खुलकर

 

अभी तक रिमझिम रही जो गुनगुनाहट

उभर आयी है वही आवाज़ खुलकर

 

कुछ नहीं है शुद्ध-स्वच्छ-पवित्र-निर्मल

एक हैं सब माटी-पानी आज घुलकर

 

3

बेचारों की बस्ती में आ हम लाचार हुए

बिला वक्त की मस्ती में आ हम लाचार हुए

 

इधर घूमने-फिरने को राहें कम पड़ती हैं

पता चला जब यह तब हम सड़कों पर भार हुए

 

अपनी ही गुस्ताखी का ख़मियाजा भुगत रहे

इन बेचारों को लगता हम पानीदार हुए

 

पानी का मसला तो अब कुछ ऐसा लगता है

इंद्र स्वर्ग से भाग रसातल के सरदार हुए

 

और समंदर के पानी का दुखड़ा कुछ ऐसा

बुरे वक्त में आशिक सब के सब गद्दार हुए

 

इन गलियों में फिर भी हमने जूते बहुत घिसे

कभी कहीं सोना पाया तो तुरत लुहार हुए

 

यारों को देते जाते हैं यह अल्टीमेटम

रातों की तफरी में प्यारे हम भिनसार हुए

 

4

ये मुलाक़ात मुख़्तसर भी है मुकम्मल भी

ये बगीचा भी है उतना कि जितना जंगल भी

 

जिन्हें हमेशा ही दुनियां ने सनीचर समझा

बस सनीचर ही नहीं हैं वो शुक्र मंगल भी

 

हमारी प्यास भूख तुम्हारी खाना उनका

पेट खाली भरी थाली है औ’ कमंडल भी

 

ये जो दहाड़ रहा है वो शे’र है मेरा

लड़ा के देखना, जीतेगा कोई दंगल भी

 

जगाओ हाकिमों को नींद भगाओ उनकी

खैंच लो चादरें उनकी औ’ मोटे कम्बल भी

5

अब तुम मेरे साथ न आओ पाँव तुम्हारे थक जाएँगे

उम्मीदें हैं, इन्हें न पालो, इनके घड़े छलक जाएँगे

 

यह सेहत के लिए नहीं है शाम-ओ-सुब्ह चहल-कदमी

होश गँवाकर चल कर देखो सालों-साल सरक जाएँगे

 

सड़कें-पगडंडियाँ बदल जाया करती हैं कभी-कभी

मगर रास्ता वही रहेगा, जिस पर पाँव नरक जाएँगे

 

अभी-अभी मैंने मंज़िल को और करीब बुलाया है

इस पुकार के स्वर संभवत: मेरे गाँव तलक जाएँगे

 

वे उम्मीदें अपेक्षाएँ अब हरगिज़ मत बढ़ने दो

वरना देखोगी संबंधों के ये जोड़ दरक जाएँगे

 

हर पड़ाव पर एक मील का पत्थर लगा दिया हमने

वही सुरमई मुस्तकबिल की कोई एक झलक लाएँगे

 

6

ये रहस्य सब जान रहे हैं

वे पिस्तौलें तान रहे हैं

 

अपना घर कहते ये जिसको

उसमें वे मेहमान रहे हैं

 

दोनों के रिश्तों के बाबत

अब तक हम अनजान रहे हैं

 

भूल-चूक से निबट रहे अब

हानि-लाभ पहचान रहे हैं

 

इस कस्बे के कई पड़ोसी

भारत-पाकिस्तान रहे हैं

 

अलग-अलग दरबारों में वे

कई बार दरबान रहे हैं

 

रावण हो या राम हो कोई

वे सबके हनुमान रहे हैं

 

नुक्कड़ वाले मंदिर में भी

कई साल भगवान रहे हैं

 

मगर इन दिनों जलसे सारे

बियाबान सुनसान रहे हैं

 

***

परिचय – आलोक कुमार श्रीवास्तव

                                                                                                                                                       

20 मार्च 1980 में दलई पुर, सोरांव इलाहाबाद में जन्म।  2012 से भारतीय रिजर्व बैंक, मुम्बई में सहायक प्रबन्धक (राजभाषा) के पद पर कार्यरत। सपने में दलईपुर शीर्षक से एक कविता संग्रह के साथ हिन्दी की तमाम पत्र पत्रिकाओं में कवितांए प्रकाशित । इन दिनों प्र्ख्यात कथाकार मार्कण्डेय की चयनित कहानियों के अंग्रेजी अनुवाद और अमेरिकी लेखक आगस्ट विल्सन के नाटक फ़ेन्सेज के हिन्दी अनुवाद में संलग्न।

फोन : 09004297035

ई-मेल : [email protected]

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