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रहबर कबीर जादा की गजल

ग़ज़ल

ख़ार राहों में जो मिले वो बहुत काम आये।
मानिन्दे दरीचां वो क़लामों में रोशनी लाये।

हमारे अश्क़ में अश्क़ अपना मिला जाता है,
रफ़ीक़ कहिये उसे वक़्त पर जो काम आये।

रिन्दे सारे तुझसे मुतअस्सिर रहते हैं साक़ी,
कुछ ऐसा कर कि पैमाँ में शराब कम आये।

उनकी ख़ातिर अब की अंधेरे बचाये रखिये,
शायद अब की बारी उन को कुछ शरम आये।

हम पर क़रम करने का अन्दाज़ उन का ऐसा है,
यूँ तो हम रोयें नहीं रोयें तो अश्क़ कम आये।

रंज यूँ करिए मगर रिश्तों को सलामत रखिये,
आयें वो जिधर से भी बस ख़ुशबुयेसनम आये।

उम्र भर ज़ेहन में कुछ तासीर यूँ रहे रहबर,
दीद भर जाये खुशी आये या कि ग़म आये।

रहबर क़बीरज़ादा
(डा. शिव प्रसाद तिवारी)

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