
हरिकांत त्रिपाठी IAS
दास्तान ए सचिवालय 4
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बाबा यानि कि बाबा राम विशाल मिश्र जिनकी यशोगाथा मैं जनवरी 2019 की पोस्ट में लिख चुका हूँ, प्रमुख सचिव वीर बहादुर से बाबा के अच्छे ताल्लुक़ात बन गए क्योंकि दोनों लोगों ने सामान्य प्रशासन विभाग में राजनीतिक उत्पीड़न के दिन साथ साथ बिताए थे । जब सरकारें बदलती हैं तो एक सरकार में महत्वपूर्ण रहे लोगों को दूसरी विरोधी पार्टी की सरकार आने पर भाषा, प्रशासनिक सुधार, धर्मार्थ कार्य, उत्तराखंड समन्वय आदि इसी तरह के पनिशमेंट विभाग हैं जिनमें तैनात कर दिया जाता है, जहाँ पर वे बिना किसी काम के सिर्फ़ बैठकर वेतन खींचते रहते हैं ।
बात 2005 की है जब मैं सिद्धार्थनगर सी डी ओ से ट्रांसफ़र होकर संयुक्त सचिव चिकित्सा शिक्षा बना तो बाबा की तैनाती संयुक्त सचिव सामान्य प्रशासन विभाग में हुई और वे एक दड़बानुमा कैबिन में बैठने लगे थे और उनका काम सिर्फ़ हफ़्ते में एक दो दिन ऑटोरिक्सा से आकर प्रमुख सचिव वीर बहादुर से से गप मारना ही था । जब प्रमुख सचिव के अच्छे दिन आये तो बाबा को कुशीनगर का सी डी ओ बना दिया । बाबा वहाँ फ़र्ज़ी इन्दिरा आवास की समस्या से परेशान होकर अडंगेबाजी करने लगे तो उन्हें वहाँ से भी हटा दिया गया । बाबा को प्रमुख सचिव ने नगरायुक्त आगरा बना दिया तो बाबा वहाँ भी राजनीति खेलने लगे और एक दिन सफ़ाई कर्मियों ने पार्षदों की ठुकाई कर दी । जब प्रमुख सचिव दुर्गा शरण मिश्रा आगरा इन्सपेक्शन पर गए तो बाबा एक दिन पहले ही इलाहाबाद सरक लिए । इन हरकतों की शिकायत हुई तो बाबा को विशेष सचिव वित्त बना दिया गया ।
एक दिन मैं अपने चैम्बर में काम कर रहा था तो बाबा एकाएक नमूदार हो गए । मैंने बाबा को सादर बैठाकर चाय मँगवाई तो बाबा ने राज खोलने के अन्दाज़ में मुझसे कहा – अच्छा ये बताइए भाई साहब कि अगर मैं होम में आ जाऊँ तो कैसा रहेगा?
मैंने कहा- बाबा तुम काम तो करते नहीं हो , यहाँ आकर क्या करोग ? यद्यपि प्रमुख सचिव तुम्हारे शुभचिन्तक हैं पर काम में तो कोई रियायत देने से रहे, आपसे दुर्व्यवहार करेंगे अलग से ।
बाबा होम में आने की ज़िद पर अड़े रहे तो मैं उनको होम में पहले से ही दुर्दिन काट रहे हम लोगों के सीनियर एन के सिंह के कक्ष में ले गया । एन के सिंह कारागार विभाग देख रहे थे जो प्रमुख सचिव गृह के ही अधीन था । वहाँ बाबा ने बताया कि दरअसल फ़ाइलों पर आपत्तियाँ लगाने से परेशान प्रमुख सचिव वित्त ने बाबा की शिकायत वित्त मंत्री से किया । वित्त मंत्री ने बाबा को तत्काल सरेंडर कर दिया और प्रमुख सचिव नियुक्ति वीर बहादुर से बाबा के स्थान पर कोई उपयुक्त प्रतिस्थानी तैनात करने को कह दिया ।
एन के सिंह ने बहुत समझाया कि बाबा आप प्रमुख सचिव से बात करके कहीं और आप अपनी तैनाती करा लीजिए क्योंकि वो हम लोगों को तो दुर्वचन बोलते ही रहते हैं और आप तो काम भी करते नहीं सो आपका तो घंघेचा पकड़ कर सीढ़ियों से नीचे ढकेल देंगे ।
बाबा हँसते रहे और होम में आने के पक्ष में दलीलें देते रहे । एन के सिंह ने बाबा को यह भी कहा कि यहाँ की चमक दमक पर मत जाइये, यह उसी तरह है जैसे नरक में खूब हलवा पूड़ी खिलाया जाता है और फिर मैले में सिर डुबो दिया जाता है । बाबा ने ठान लिया तो ठान लिया और वे होम में आने की ज़िद पर अड़े रहे ।
अपराह्न में बाबा प्रमुख सचिव से मिलने गए । प्रमुख सचिव उन्हें देखकर हँसे और बोले – क्या हुआ आप फिर से आ गये ?
बाबा ने अपना दुखड़ा रोना शुरू किया कि वहाँ वित्त विभाग में वे बहुत निष्ठा और ईमानदारी से काम करते थे, पर उनके ऊपर ग़लत प्रस्तावों पर भी दस्तखत करने के लिए दबाव डाला जाता था, वे सताये गये हैं आदि आदि । जब बाबा अपना दुखड़ा रो चुके तो प्रमुख सचिव हँसे और बोले- आप यार जहाँ भी रहते हैं वहीं बवाल करते रहे हैं । आपको सी डी ओ कुशीनगर बनाया तो वहाँ भी नहीं चल पाये , प्रदेश के सबसे अच्छे नगर निगम का नगरायुक्त बनाया तो वहाँ भी बवाल काटने लगे और आपको वहाँ से हटाना पड़ा । अब वित्त विभाग में भी नहीं चल पाये और वापस आ गए! अब क्या चाहते हैं ?
बाबा ने कहा कि सर आप मुझे अपने साथ होम में ही रख लीजिए तो बड़ी कृपा होगी ।
प्रमुख सचिव ने कहा, ठीक है, होम में आ जाइए पर यहाँ यार शान्ति से रहिएगा, गड़बड़ न करिएगा। इस प्रकार अगले दिन बाबा विशेष सचिव गृह बन गए।
बाबा राजनीति के पक्के खिलाड़ी थे और गणित में इलाहाबाद विश्वविद्यालय से एम एससी कर चुके पूरे गणितज्ञ थे । हम लोगों को अक्सर ललकारते रहते थे कि क्या बात कर रहे हैं आप तो गणित के विद्यार्थी थे ? उन्होंने ने पक्की गणित लगा ली थी कि विधानसभा के चुनाव सन्निकट थे और राजनीतिक प्रतिबद्धता के चलते चुनाव आयोग प्रमुख सचिव का गृह विभाग का प्रभार हटा ही देगा । बाबा ने समझ लिया था कि प्रमुख सचिव के कोप से बचने के लिए एकाध महीने तक उनसे मुठभेड़ किसी तरह टालते रहना है फिर न रहेगा बाँस न बजेगी बाँसुरी । बाबा अपनी रणनीति पर जुट गए । उनको आबंटित चार अनुभाग काफ़ी महत्वपूर्ण थे, पर बाबा अपने स्तर से कोई भी फाइल ऊपर जाने ही न देते । अनुभाग से जो भी पत्रावलियाँ आतीं वे सब पर पृच्छा लगाते । अनुभाग वाले उसका जवाब बनाकर लाते तो वे नई पृच्छायें लगा देते । ऐसी ऐसी नवोन्मेषी पृच्छायें लगाते कि सचिवालय सेवा के धुरंधर अधिकारी भी भौंचक रह जाते । बाबा का बैरियर पार कर पाना सचिवालय वालों के बूते का न था ।
उप सचिव Jawahar Lal परेशानहाल फ़ाइलें लाकर मुझे दिखाते कि देखिए सर कहीं ऐसे काम होता है! मैं हँसता और कहता कि ऐसे थोड़े ही बाबा ने वित्त विभाग वालों को पानी मँगवा दिया ! धीरे धीरे सब समझ गए कि बाबा प्रमुख सचिव तक फ़ाइलें नहीं जाने देना चाहते । गृह विभाग भी पूरा महासागर था , प्रमुख सचिव को बाबा की इस हरकत का पता ही नहीं चला ।
एक महीने बीतते बीतते वही हुआ जो बाबा की गणित ने बताया था । चुनाव आयोग का फ़रमान आ गया और प्रमुख सचिव को गृह विभाग को अलविदा कहना पड़ा । बाबा प्रमुख सचिव के उस रूप को देखने से बच गए जिसका वर्णन एन के सिंह ने यह कहते हुए किया था कि आपका तो घंघेचा पकड़ कर ले जाकर प्रमुख सचिव सीढ़ियों पर धकेल देंगे । सीधे सज्जन सरदार मंजीत सिंह प्रमुख सचिव गृह बन गये और बाबा फिर हमेशा की तरह चैन की बंशी बजाने लगे ।
( क्रमशः)
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