हाथरस के गाँव बूलगढ़ी, थाना चाँदपा मे पिछले कुछ दिनों में जो कुछ घटा उसमे कुछ भी अप्रत्याशित नही था । अमानवीय वर्ण व्यवस्था मे पिसते दलित परिवार, पुरुषवादी मानसिकता के चलते एक औरत के व्यथा वर्णन पर उसी की दुर्दशा, व्यापक सुधारों की प्रतीक्षा कर रहे एक ग़ैर पेशेवर पुलिस बल का दयनीय प्रदर्शन, झूठ पर झूठ बोल रहे प्रशासनिक अधिकारियों या असंवेदनशील राजनीति के चलते इस के अतिरिक्त आप उम्मीद भी क्या कर सकते थे ? दशकों से हर बार यही होता आया है, सरकारें बदलती हैं और कुछ नहीं बदलता!
“हाथरस”

विभूति नारायण राय, IPS
लेखक उत्तर प्रदेश में पुलिस महानिदेशक रहे हैं और महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय वर्धा के कुलपति भी रह चुके है
हाथरस मामले में अब जब मुख्यमंत्री योगी ने मामले की जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा कर दी है तो एक नयी समस्या सामने आ गयी है । इसी के साथ अभियुक्तों , पीड़ित परिवार और पुलिस कर्मियों के नार्को टेस्ट की बात हो रही रही है तो मृतका के संबंधी इसका विरोध कर रहे हैं। क्या वे भी कुछ छिपा रहे हैं ? क़ानूनी स्थिति यह है कि यदि वे नार्को टेस्ट मे शरीक नही हुये तो इसका लाभ अभियुक्तों को ही होगा ।
हाथरस के गाँव बूलगढ़ी, थाना चाँदपा मे पिछले कुछ दिनों मे जो कुछ घटा उसमे कुछ भी अप्रत्याशित नही था । अमानवीय वर्ण व्यवस्था में पिसते दलित परिवार, पुरुषवादी मानसिकता के चलते एक औरत के व्यथा वर्णन पर उसी की दुर्दशा, व्यापक सुधारों की प्रतीक्षा कर रहे एक ग़ैर पेशेवर पुलिस बल का दयनीय प्रदर्शन, झूठ पर झूठ बोल रहे प्रशासनिक अधिकारियों या असंवेदनशील राजनीति के चलते इस के अतिरिक्त आप उम्मीद भी क्या कर सकते थे ? दशकों से हर बार यही होता आया है, सरकारें बदलती हैं और कुछ नहीं बदलता!
गाँव बूलगढ़ी देश के असंख्य गाँवो की तरह गुमनामी की चादर तले गुम रहता और हम में से अधिकतर ने कभी उसका नाम भी न सुना होता यदि 14 सितंबर को गाँव की ही एक बेटी के साथ वह कुछ न घटता जिस से न सिर्फ़ उसकी ज़िंदगी मे उथल पुथल मच गयी बल्कि सूबे समेत पूरे देश की राजनीति मे उबाल आ गया । दोहराने की ज़रूरत नही है कि आज भी गाँव दलितों के लिये नर्क जैसे हैं , कुछ जो शहरों मे निकल आते हैं वे भले कुछ बेहतरी का अहसास कर लें पर पीछे छूट गये तो नारक़ीय जीवन जीने के लिये ही अभिशप्त हैं । 14 सितंबर की सुबह इस उन्नीस साला लड़की के ऊपर तब जानलेवा हमला हुआ जब वह खेतों मे घास छिलने गयी थी । पीड़िता , उसके परिवारी जन और अभियुक्तों के हमदर्दों के बयानों मे इतने विरोधाभास हैं कि किसी अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचना थोड़ा मुश्किल है । पर इतना तो तय है कि उसके साथ शारीरिक हिंसा हुई है । इसमें यौन हिंसा सम्मिलित है ।
कम क़ानूनी ज्ञान रखने वाले नेताओं और चैनल वीरों ने हल्ला मचाया कि लड़की के साथ बलात्कार तो हुआ ही नही क्योंकि चिकित्सकीय परीक्षण मे वीर्य के अंश नहीं मिले । उन्हें तो अज्ञान के लिये क्षमा कर सकते हैं पर आप उन पुलिस अधिकारियों को क्या कहेंगे जो सिर्फ़ सत्ता को ख़ुश करने के लिये अपनी सारी सिखलाई ताक पर रख देते हैं और बलात्कार का आरोप सिरे से नकारने लगते हैं । वे भूल जाते हैं कि भारतीय दंड संहिता की धारा 375 के तहत वीर्य अंश की अनुपस्थिति से बलात्कार का आरोप ख़ारिज नही हो जाता । निर्भया बलात्कार और हत्या कांड की पृष्ठभूमि मे बने क्रिमिनल ला अमेंडमेंट ऐक्ट 2013 ने तो महिलाओं के ख़िलाफ़ कदाचार के सम्भावित क्षेत्र का और अधिक विस्तार किया है ।
शुरुआत से ही चीज़ें ग़लत दिशा मे गयीं । बुरी तरह से पीड़िता को परिवारी जन थाने ले गये । उम्मीद के अनुरूप उन्हें रपट लिखाने मे जद्दोजहद करनी पड़ीं । फिर जो रिपोर्ट लिखी गयी उस पर परिवार लगातार असंतुष्ट दिखा।
मेरा हमेशा से मानना रहा है कि यदि थानों मे पुलिस परिवादी की एफआईआर जाते ही लिख ले तो बाद मे खड़ी होने वाली आधी से ज़्यादा समस्याएँ सामने ही न आयें । पर दुर्भाग्य से सरकारें फ़र्ज़ी आँकड़ों के ज़रिये अपराध नियंत्रण के अपने ही बुने जाल मे इस क़दर उलझ कर रह जाती हैं कि वे थानों मे मुक़दमे दर्ज़ न करने की प्रवृत्ति को न सिर्फ़ नज़रंदाज़ बल्कि प्रोत्साहित ही करती दिखती हैं । इस समय उत्तरप्रदेश मे पुरानी परंपरा का ही निर्वाह हो रहा है ।
इसके बाद अस्पतालों का सिलसिला शुरू हुआ । जो सरकारी अस्पतालों के चक्कर लगा चुके हैं वे जानते हैं कि एक ग़रीब और दलित मरीज़ के साथ कैसा व्यवहार। हुआ होगा वहाँ ! यह अनायास नही है कि क़ोरोना काल मे मुख्यमंत्रियों और मंत्रियों को अपने इलाज के लिये प्राइवेट अस्पतालों की शरण लेनी पड़ रही है । इस अभाग़ी लड़की को भी ज़िला अस्पताल , अलीगढ़ मेडिकल कालेज से दिल्ली के सफ़दर गंज अस्पताल तक भाग दौड़ करनी पड़ी और हर सुविधा से उसका परिवार असंतुष्ट ही नज़र आया । ज़रूरी नही कि यह असंतोष इलाज की अपर्याप्तता से उत्पन्न हुआ हो , ज़्यादा संभावना है कि इसके पीछे वहाँ उस की श्रेणी के मरीज़ों के लिये हर तरफ़ पसरी बेरुख़ी और उन्हें कीड़े मकोड़े जैसा समझने की प्रवृत्ति रही हो ।
और किसने इलाक़े को बैरिक़ेड़ कर मीडिया और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परिवार से न मिलने देने का विचार दिया था । प्रशासन के मुखिया ज़िला मजिस्ट्रेट बीच बीच पीड़ित परिवार की तरफ़ से कोई बयान देते और हर बार परिवार का कोई न कोई सदस्य उन्हें झूठा ठहरा देता । नौकरशाही को सच बोलना सिखाना बहुत मुश्किल है ।

सबसे दुर्भाग्य पूर्ण प्रशासन का वह व्यवहार था जो 29 सितंबर को पीड़िता के मरने के बाद दिखा । यह व्यवहार कोई पहली बार नही दिख रहा था । सरकारें आई गयीं पर नौकरशाही ज्यों की त्यों रही । औपनिवेशिक शासकों की परंपरा के अनुसार जनता से सब कुछ छिपाना और तभी कुछ साझा करना जब मजबूर हो जाय । आदतन झूठ बोलना और विडंबना यह कि जब कभी सच बोलें भी तो जनता को झूठ जैसा लगे । इस मामले मे भी रात के अंधेरे मे मृतका का शव जला दिया गया । प्रदेश पुलिस के मुखिया के अनुसार यह फ़ैसला ज़िला स्तर के अधिकारियों ने किया था पर इसका जवाब किसी के पास नही है कि अगर कुछ छिपाना नही था तो रात के अंधेरे मे शव दाह क्यों किया गया ? इस सवाल का भी उत्तर कोई नही दे रहा कि दूसरे दिन पूरे गाँव को छावनी मे किसके आदेश पर तब्दील कर दिया गया और किसने इलाक़े को बैरिक़ेड़ कर मीडिया और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं को परिवार से न मिलने देने का विचार दिया था । प्रशासन के मुखिया ज़िला मजिस्ट्रेट बीच बीच पीड़ित परिवार की तरफ़ से कोई बयान देते और हर बार परिवार का कोई न कोई सदस्य उन्हें झूठा ठहरा देता । नौकरशाही को सच बोलना सिखाना बहुत मुश्किल है ।

अब जब मुख्यमंत्री योगी ने मामले की जाँच सीबीआई को सौंपने की घोषणा कर दी है तो एक नयी समस्या सामने आ गयी है । इसी के साथ अभियुक्तों, पीड़ित परिवार और पुलिस कर्मियों के नार्को टेस्ट की बात हो रही रही है तो मृतका के संबंधी इसका विरोध कर रहे हैं। क्या वे भी कुछ छिपा रहे हैं ? क़ानूनी स्थिति यह है कि यदि वे नार्को टेस्ट में शरीक नहीं हुए तो इसका लाभ अभियुक्तों को ही होगा। यह सब करना सरकार के बस का नही है। आने वाली सभी सरकारों को लंबे समय तक इस दिशा मे पूरी निष्ठा से काम करना पड़ेगा तभी कुछ बदलाव संभव है ।

ग़ौर से देखें तो साफ़ हो जायेगा कि प्रारंभ में ही यदि विधि सम्मत और ईमानदारी से व्यवहार हुआ होता तो पिछले हफ़्ते भर देश उस अराजकता से होकर न गुज़रता जिसके विज़ुअल्स हमारे टीवी स्क्रीन्स के परदों पर छाये रहे । पर यह आशा अभी तो दूर की कौड़ी लगती है कि स्थितियाँ इस हद तक बदल जायेंगी । पहले तो हमें अपने गांवों को दलितों के रहने योग्य बनाना होगा । वे एक ऐसी बसावट मे तब्दील हों जहाँ दलित को भी मनुष्य के रूप मे रहने का अधिकार हो तभी पुलिस थानों, अस्पतालों या दूसरे सरकारी दफ़्तरों में उन्हें गंभीरता से लिया जायेगा । नौकरशाही को भी ज़्यादा पारदर्शी और विश्वसनीय होना चाहिये । इसके लिये एक लंबा रास्ता तय करना होगा और यह किसी एक सरकार के बस का नही है । आने वाली सभी सरकारों को लंबे समय तक इस दिशा मे पूरी निष्ठा से काम करना पड़ेगा तभी कुछ बदलाव संभव है ।
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