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“भारत का 23 प्रतिशत हिस्सा निमोनिया से ग्रसित है और इससे मरने वालों की संख्या 14-30 प्रतिशत के बीच है”

 

निमोनिया के बारे में जागरूकता बढ़ाने के लिए आरोग्य भारती एवं विश्व आयुर्वेद मिशन के संयुक्त तत्वावधान में विश्व निमोनिया दिवस के अवसर पर ऑनलाइन स्वास्थ्य संवाद आयोजित किया गया। कार्यक्रम में निमोनिया के लक्षण, कारण और उपचार के बारे में जानकारी दी गयी।

आरोग्य भारती के राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य एवं वरिष्ठ चिकित्सक डॉ जी एस तोमर ने कहा कि संक्रमण के कारण फेफड़े में सूजन आ जाती है, जिसे निमोनिया कहते हैं। हालांकि ज्यादातर निमोनिया बैक्टीरिया के संक्रमण की वजह से होता है, इंफ्लूएंजा या कोविड-19 वायरस जैसे वायरल संक्रमण भी फेफड़ों को प्रभावित कर सकते हैं। कोरोना महामारी इसका जीता- जागता उदाहरण है। निमोनिया खासतौर से 05 वर्ष से कम उम्र में बच्चों एवं 65 वर्ष से अधिक वृद्धों के लिए जानलेवा है।
आंकड़े बताते हैं कि भारत का 23 प्रतिशत हिस्सा निमोनिया से ग्रसित है और इससे मरने वालों की संख्या 14-30 प्रतिशत के बीच है। कुल मिलाकर निमोनिया दुनियाभर में बढ़ती मृत्युदर का प्रमुख कारण बना हुआ है।

डॉ तोमर ने कहा कि प्रधानमंत्री उज्ज्वला योजना के माध्यम से आज गांव में भी हर घर मे चूल्हे के धुएं से मुक्ति मिली है जिससे निमोनिया एवं सांस की अन्य बीमारियों में कमी आयी है।

उन्होंने बताया कि गाय के देशी घी में कपूर, सेंधा नमक मिलाकर सीने पर मालिश के बाद सेकाई करने एवं सितोपलादि चूर्ण को तुलसी पत्र स्वरस एवं आर्द्रक स्वरस से सेवन करने पर लाभ मिलता है।

श्वास कास चिंतामणि रस एवं त्रिभुवन कीर्ति रस भी प्रभावी है जिसका प्रयोग चिकित्सक के परामर्श से किया जा सकता है।
प्रयागराज के वरिष्ठ चेस्ट फीजिशियन डॉ आशीष टंडन ने कहा कि निमोनिया के अधिकांश रोगियों को आमतौर पर ठंड लगना और तेजी से बुखार आने का अनुभव होता है।

उन्हें पीले या हरे रंग के थूक के साथ खांसी होती है। सांस फूल सकती है।

इसके अलावा कुछ रोगियों को सीने में दर्द, खून की खांसी या भूख न लगने का भी अहसास हो सकता है।
ऐसे लक्षण होने पर चिकित्सक से परामर्श अवश्य लेना चाहिए।

मोतीलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज की पूर्व रिसर्च अधिकारी डॉ शांति चौधरी ने न्यूमोनिया के कारणों पर विचार रखे।
बच्चों में पोषक तत्वों की कमी होना, घर या वर्कप्लेस पर वेंटिलेशन की कमी, ऑटोइम्यून डिसऑर्डर के लिए स्टेरॉयड या अन्य इम्यूनोसप्रेशेन्ट दवाओं का प्रयोग, पर्यावरण प्रदूषण प्रमुख कारण हैं।

कोविड-19 और फ्लू की तरह निमोनिया भी एक संक्रामक बीमारी है, जो खांसने, छींकने, छूने और यहां तक की सांस के ज़रिए भी फैलती है। बहुत से लोग ऐसे भी होते हैं जिनमें निमोनिया के कोई लक्षण साफतौर पर नहीं दिखते लेकिन वे भी बीमारी फैला सकते हैं।
न्यूमोनिया से बचाने के लिए 6 माह तक शिशु को माँ का दूध अवश्य पिलाना चाहिए।

एपेक्स इंस्टीच्यूट आफ आयुर्वेदिक मेडिसिन चुनार मिर्जापुर के प्रो 0 वीरेंद्र कुमार विभागाध्यक्ष कौमारभृत्य ने कहा कि महर्षि काश्यप द्वारा बताये गये स्वर्ण प्राशन टीकाकरण से सामान्य श्वसन तंत्र के रोगों जैसे न्यूमोनिया तथा बार बार लगने वाले सर्दी जुकाम बुखार से लेकर कोरोना आदि अन्य अपेक्षा कृत नई बीमारियों से बचाव हेतु बच्चों में रोग प्रति रोधक क्षमता विकसित की जा सकती है। उन्होंने आयुर्वेदिक औषधियों वासा, तुलसी, भारंगी, सेंधा नमक से स्वनिर्मित नेबुलाइजर पर किये गये शोध के विषय मे जानकारी दी।

आयुर्वेद चिकित्साधिकारी डॉ अवनीश पाण्डेय ने कहा कि निमोनिया की रोकथाम करने का एक प्रभावी तरीका है समय पर टीकाकरण कराना। इंफ्लूएंजा और न्यूमोकोकल जैसे कई टीके निमोनिया की गंभीरता को कम करने में सफल साबित हुए हैं। इसके अलावा डायबिटीज रोगियों में ब्लड शुगर लेवल सामान्य बनाए रखने से निमोनिया होने की संभावना को कम किया जा सकता है।इसके साथ ही 18 वर्ष से ऊपर के लोगों को कोरोना वैक्सीन अवश्य लगवाने की सलाह दी।

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