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स्कूली बच्चों की सुरक्षा के लिए कोर्ट चिंतित

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने सभी डीएम को दिया निर्देश

2 मार्च तक स्कूल बसों की फिटनेस रिपोर्ट दें

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने राज्य के सभी जिलाधिकारियों को आदेश दिया है कि वे उच्चतम न्यायालय के आदेशों के अनुसार स्कूल बसों की फिटनेस जांच करें और उसके बाद अपनी अनुपालन रिपोर्ट दायर करें। मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति चंद्र धारी सिंह की खंडपीठ द्वारा 13 जनवरी को दिए गए आदेश के अनुसार, जिला मजिस्ट्रेट 2 मार्च तक प्रमुख सचिव, परिवहन को अपनी रिपोर्ट सौंपेंगे और प्रमुख सचिव 21 मार्च तक अदालत में पूरी अनुपालन रिपोर्ट दाखिल करें।

इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ पीठ ने यह आदेश ‘एमसी मेहता बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एंड अदर्स, 1997 (8) एससीसी 770 ‘ मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा दिए गए फैसले को देखते हुए जारी किया गया है। उस आदेश में उच्चतम न्यायालय ने बसों की आवाजाही से संबंधित कुछ सामान्य निर्देश जारी किए थे, जिनमें सीटों की व्यवस्था, बस के बुनियादी ढांचे, बस चालक की योग्यता आदि के संबंध में शर्तें शामिल थीं। खंडपीठ ने याचिका में दी घटनाओं का जिक्र करते हुए कहा कि कागजों पर तो सरकार ने काफी काम किया है, किंतु जमीन पर नहीं है। खंडपीठ ने कहा कि ऐसा प्रतीत होता है कि ज्यादातर स्कूली बसों में दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया जा रहा है। खंडपीठ ने कहा कि प्रदेश की हर स्कूली बस का 20 नवंबर 2012 के दिशा-निर्देशों के अनुसार निरीक्षण किया जाए और 2 मार्च तक निरीक्षण अभियान पूरा करके अगले दस दिनों में सभी जिलाधिकारी अपनी रिपोर्ट प्रमुख सचिव, परिवहन विभाग को भेज दें, जिसे 21 मार्च तक कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किया जाए।

सामाजिक संस्था ‘वी द पीपल’ की तरफ से दायर जनहित याचिका नंबर 2163/2017, वी द पीपील बनाम यूनियन आफ इडिया एवं अन्य में कहा गया था कि राज्य के स्कूल इन निर्देशों का पालन नहीं कर रहे हैं। निर्देशों का पालन नहीं करने के कारणउच्चतम न्यायालय द्वारा वांछित कोई सुरक्षा व बचाव ,उन बच्चों को नहीं दिया जा रहा है जो स्कूल बसों के माध्यम से शैक्षणिक संस्थानों में आते- जाते हैं।

याचिका में कई ऐसे मामलों को भी उजागर किया, जहां ड्राइवरों की लापरवाही के कारण या वाहनों की खराब स्थिति के कारण, स्कूल बसें दुर्घटनाग्रस्त हो गई थीं, जिनमें जानमाल का भारी नुकसान हुआ। खंडपीठ ने कहा है कि इन आदेशों को लागू करने के लिए जरूरत पड़ने पर डीएम संबंधित ट्रैफिक अधिकारियों और पुलिस कर्मियों से सहायता ले सकते हैं।

खंडपीठ ने मुख्य सचिव से पूछा है कि वह स्कूल बसों में ट्रैकिंग सिस्टम स्थापित करने की संभावनाओं के बारे में भी पता लगाएं। खंडपीठ ने कहा कि स्कूल बसों के पंजीकरण और फिटनेस के लिए एक विस्तृत नीति पहले से ही राज्य द्वारा तैयार की जा चुकी है। सरकार ने 29 जून, 1998 को एक कार्यालय ज्ञापन जारी किया था और 20 नवंबर, 2012 को इस मुद्दे से संबंधित एक व्यापक योजना बनाई थी। हालांकि, मुख्य मामला इनके पालन करने का था। खंडपीठ ने कहा कि सरकार द्वारा निर्धारित दिशा-निर्देशों को देखने के बाद, हमें इसमें कोई संदेह नहीं है कि कम से कम कागजों पर तो सरकार ने प्रभावी कदम उठाए हैं। हालांकि, मुख्य मुद्दा इन दिशा-निर्देशों के पालन का है।

याचिकाकर्ता द्वारा रिट के लिए याचिका दायर कर जिन दुर्घटनाओं का विवरण दिया गया है,उनसे पता चलता है कि अधिकांश स्कूल बसें 20 नवंबर, 2012 के आदेश के तहत निर्धारित शर्तों का पालन नहीं कर रही हैं। कोई ऐसा तथ्य या सामग्री भी रिकॉर्ड पर नहीं रखी गई, जिससे यह संकेत मिल सकें कि स्कूल बसों को चलाने वाले व्यक्तियों से दिशानिर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित कराने के लिए, राज्य के किसी भी सक्षम अधिकारी द्वारा कोई निरीक्षण किया गया है।इसको देखते हुए, हाईकोर्ट ने प्रमुख सचिव, परिवहन विभाग को निर्देश दिया है कि वह जिला मजिस्ट्रेटों के कार्यों की निगरानी करें और यह सुनिश्चित करें कि आदेशों का अनुपालन किया जाए। इसके अलावा, यह भी कहा गया है कि यदि सक्षम प्राधिकारी को किसी भी स्थिति में यह पता चलता है कि निर्धारित किसी भी शर्त का पालन नहीं किया जा रहा है, तो वे बस ऑपरेटर के खिलाफ उचित कार्रवाई करने के लिए स्वतंत्र होंगे। पीआईएल की अब 27 मार्च को सुनवाई होगी।

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