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हाईकोर्ट ने पूछी प्रवासी कामगारों के इलाज और पुनर्वास की योजना

जेपी सिंह

प्रयागराज।
हाई कोर्ट ने यूपी सरकार से प्रवासी कामगारों के इलाज के लिए बनाए गए नीति और नियम बताने को कहा है। साथ ही यह भी पूछा है कि ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए क्या उपाय किए जा रहे हैं।
कोरोना काल में दूसरे राज्यों से लौट रहे प्रवासियों के लिए सरकार से लेकर न्यायालय तक चिंतित हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार से दूसरे राज्यों से आ रहे प्रवासी कामगारों और उनके परिवारों को चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के बारे में नीति और नियम तथा ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए उपाय बताने को कहा है। मुख्य न्यायाधीश गोविंद माथुर और न्यायमूर्ति रमेश सिन्हा की पीठ ने राज्य सरकार के अधिकारियों को प्रवासी कामगारों और उनके परिजन के पुनर्वास की योजना के बारे में भी बताने का निर्देश दिया है।
अदालत ने कहा कि राज्य सरकार की ओर से आजीविका के लिए उत्तर प्रदेश के निवासियों का दूसरे राज्यों में पलायन घटाने के लिए एक संपूर्ण खाका पेश किए जाने की जरूरत है।’ पीठ ने हाई कोर्ट के अधिवक्ता रितेश श्रीवास्तव और गौरव त्रिपाठी की तरफ से दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए 26 मई को यह आदेश पारित किया और इस मामले की अगली सुनवाई की 1 जून, 2020 को होगी ।
हाईकोर्ट ने कहा कि जहां तक सवाल इस जनहित याचिका में श्रमिकों को परिवहन सुविधा और भोजन उपलब्ध कराने की है, सुप्रीम कोर्ट एक जनहित याचिका में पहले ही इस मामले पर स्वतः संज्ञान ले चुका है, इसलिए अदालत इस संबंध में राज्य सरकार से कोई स्पष्टीकरण मांगने की इच्छुक नहीं है। याचिकाकर्ताओं ने इस याचिका में प्रवासी श्रमिकों की दुर्दशा बताई है और उनके मुताबिक, प्रवासी कामगार दूसरे राज्यों से सैकड़ों किलोमीटर पैदल चलकर अपने गांव जा रहे हैं। उत्तर प्रदेश में रोजगार के लिए मूलभूत ढांचा उपलब्ध नहीं होने की वजह से लाखों लोग रोजी रोटी कमाने के लिए दूसरे राज्य जाते रहे हैं।
याचिका में कहा गया है कि इस तरह का पलायन किसी भी तरह गलत नहीं है क्योंकि संपूर्ण भारत एक संघ है लेकिन जिन राज्यों में ये कामगार काम कर रहे थे, उन राज्य सरकारों का रवैया संघीय ढांचे की भावना के बिल्कुल विपरीत है। इसलिए यह बहुत आवश्यक है कि उत्तर प्रदेश सरकार स्थानीय स्तर पर रोजगार के लिए अपना तंत्र मजबूत करे।
याचिकाकर्ताओं द्वारा यह कहा गया कि, 25 मार्च, 2020 के बाद से लॉकडाउन के चलते, देश भर में “प्रवासी मजदूर”, अपने कार्यस्थल से अपने गृह नगर/गाँव तक पैदल यात्रा कर रहे हैं, जोकि सैकड़ों किलोमीटर दूर है। याचिका में, भारत के संविधान के अनुच्छेद 14 और 21 का हवाला देते हुए ऐसे तथाकथित प्रवासी मजदूरों की गरिमा और मानवीय स्थिति के संरक्षण की मांग की गई। याचिकाकर्ताओं का कहना था कि न तो केंद्र सरकार द्वारा और न ही उन प्रदेशों की राज्य सरकारों द्वारा, जहां यह मजदूर काम कर रहे थे, ऐसे मजदूरों एवं उनके परिवार के लिए कोई पर्याप्त व्यवस्था की गई। याचिका के अनुसार, पर्याप्त व्यवस्थाओं के अभाव में, मजदूर और उनके परिवार को सड़कों पर दयनीय स्थिति का सामना करना पड़ रहा है।
याचिकाकर्ताओं के अनुसार वास्तव में, ‘प्रवासी मजदूर’ या ‘प्रवासी कामगार’ (जैसा कोई शब्द नहीं है। क़ानून केवल ‘मजदूर’ या ‘कामगार’ को निर्धारित करता है इसलिए, यह उन राज्य सरकारों की ज़िम्मेदारी थी, जहाँ यह ‘मजदूर’ या ‘कामगार’ काम काम कर रहे थे, कि उन्हें लॉकडाउन के दौरान सभी आवश्यक सुविधाएं और आवश्यकताएं प्रदान की जा सकें। इस तरह की सरकारों का दृष्टिकोण अत्यधिक निराशाजनक है क्योंकि वे मानवों के अस्तित्व को बनाए रखने में विफल रहे, जिनकी सेवाओं का उपयोग उनकी समृद्धि के लिए किया गया था।”
यह भी बताया गया है कि रेलवे स्टेशनों पर भी ऐसे मजदूरों के लिए कोई भोजन उपलब्ध नहीं है, इसलिए, “श्रमिक स्पेशल” के रूप में जानी जाने वाली ट्रेनों में यात्रा करने वाले लोगों को भुखमरी का सामना करना पड़ रहा है। भोजन और पानी की अनुपलब्धता के कारण कानपुर और उन्नाव में हुई हिंसा का उल्लेख भी याचिकाकर्ताओं द्वारा किया गया। अदालत के समक्ष ऐसे भी कई उदाहरण लाये गए, जहां राजमार्गों या अन्य सड़कों से गुजरने वाले मजदूरों को न तो भोजन मिल रहा है और न ही गरिमा के साथ जीवित रहने का कोई साधन।
इसके अलावा, याचिकाकर्ताओं द्वारा यह भी विशेष रूप से अदालत को बताया गया कि इन मजदूरों की अनियंत्रित आवाजाही ने, सभी प्रमुख कस्बों और ग्रामीण क्षेत्रों में कोरोनावायरस बीमारी के प्रसार की आशंका को भी तेज कर दिया है। याचिका में की गयी मांग वर्तमान परिस्थितियों के मद्देनजर, याचिकाकर्ताओं द्वारा, सड़कों पर चल रह मजदूरों/कामगारों को पर्याप्त सुविधाएं प्रदान किये जाने की मांग के अलावा, उत्तर प्रदेश राज्य के निवासियों के लिए एक मजबूत पुनर्वास कार्यक्रम होने पर भी जोर दिया गया, ताकि उन्हें अपने अस्तित्व के बचाव के लिए दूसरे राज्यों में न जाना पड़े।
याचिकाकर्ताओं ने कहा कि “उत्तर प्रदेश राज्य में रोजगार के लिए बुनियादी ढांचा उपलब्ध नहीं होने के कारण लाखों लोग अपनी आजीविका कमाने के लिए दूसरे राज्यों में पलायन करते हैं। ऐसा प्रवास/माइग्रेशन बिल्कुल भी गलत नहीं है क्योंकि पूरा भारत एक संघ है, लेकिन उन राज्य सरकारों का वर्तमान रवैया, जहां ये लोग काम कर रहे थे, संघ और संघीय ढांचे की भावना के विपरीत है, इसलिए, यह उत्तर प्रदेश राज्य के लिए अधिक आवश्यक है कि स्थानीय रोजगार के लिए यह अपने किले को मजबूत करे।

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