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हिन्दी दिवस पर विशेष: “प्लीज मम्मी, डोंट गो. . . . !”: स्नेह मधुर

हिन्दी दिवस: “प्लीज मम्मी, डोंट गो. . . . !”

स्नेह मधुर

अपने एक मित्र के साथ उनके एक ब्रिगेडियर दोस्त के घर जाने का सौभाग्य मिला। ब्रिगेडियर दोस्त की नियुक्ति कहीं बाहर है और उनकी पत्नी अपने बच्चों के साथ इसी शहर में रहती हैं।

जब उनके घर हम पंहुचे तो ब्रिगेडियर की पत्नी कहीं जाने की जल्दी में थीं और तैयार हो रही थीं। बाल संवारना, पफ करना, नौकर को हिदायत देना, उतरे हुए कपड़े इधर से उधर फेंकना, तीन साल की बच्ची पिंकी को नाश्ता वक्त पर करने का निर्देश देना, आठ साल के बच्चे सुदर्शन के स्कूल से लौटने पर उसे क्या नाश्ता देना है इसके बारे में नौकर को समझाना, ढेर सारी कापी-किताबों को समेटना, टामी को गोद में लेकर दुलराना, हमारा हालचाल पूछना और कुछ याद करते हुए कोल्ड ड्रिंक्स लाने के लिए नौकर को फिर पुकारना। बिजली के बिल, कार में आयी खराबी और टुल्लू जल जाने से लेकर हिंदी के एक समाचार पत्र के संपादक के साथ हुई भेंट का जिक्र करना और खुशवंत सिंह के स्तंभ ‘सरदार इन बल्ब‘ की प्रशंसा करना आदि सब कुछ एकसाथ चल रहा था। ऐसा लग रहा था कि घर में फुल वाल्यूम में टेलीविजन चल रहा है, रेडियो बज रहा है, टेपरिकार्डर भी चल रहा है, कूलर के साथ एयर कंडीशनर की आवाज मिल गयी है और छत पर लटके पंखे भी वाल बेयरिंग कट जाने के कारण जोर से घड़घड़ा रहे हैं। इतनी ढेर सारी आवाजों के बीच ऐसा लगता था कि जैसे घर के सारे नल भी खुले हों और बाल्टियों में पानी गिरने की आवाज के साथ टेलीफोन पर जोर-जोर से बात करने की आवाज भी उसी में घुसी जा रही हो। हे भगवान! रसोई में आमलेट जलने की गंध मिलना भर बाकी रह गया था।

शटल काक की तरह एक कमरे से दूसरे कमरे में नाचती हुई अन्तत: जब वह कंधे पर पर्स और हाथों में कापियों का ढेर उठाये और पैर में सैंडिल डालने की बार-बार कोशिश करती हुई सामने स्थिर हो गयीं तो लगा जैसे भूकंप की तबाही के बाद की शान्ति हो। मित्र ने पूछा, ‘भाभी जी कहीं जा रही हैं क्या? कहीं यूनिवर्सिटी में रिसर्च तो शुरू नहीं कर दिया है ?‘

‘नहीं यार, आय एम नाट सो लकी। मन तो बहौत करता है, बट यू नो, देयर इज नो टाइम । घर की रिसपांसिबिलिटी से फ्री हों तो कुछ करें भी। सारी लाइफ स्पवायल हो गयी। बस एक स्कूल ज्वाइन किया है, वहीं पढ़ाने जा रही हूं‘।‘

‘स्कूल में पढ़ाना तो फुलटाइम जाब है, कैसे मैनेज करती हैं? इंटर सेक्शन में हैं कि हाई स्कूल में?‘

‘अरे मजाक मत करिये, कहां हाई स्कूल और कहां इंटरमाडिएट? पास में बच्चों का एक स्कूल है-नर्सरी, उसी में टाइम पास करती हूं।‘

‘नर्सरी स्कूल में पढ़ाती हैं आप? कितने पैसे देते होंगे? सात-आठ सौ रुपये बस न, या कुछ और?‘

‘नहीं यार, इतने भी नहीं। बट यू नो, मनी इज नो कंसीडरेशन फार मी। हसबैंड को ही फाइव फीगर मिल जाता है। पैसे की भूख नहीं है। आय एम नाट रनिंग आफटर मनी। आय वांट टु वर्क फार माय सैटिसफैक्शन, फार सम काज। बच्चों की हेल्प हो जाती है और मेरा टाइम भी पास हो जाता है। आखिर एक इंसान को जिस्मानी जरूरतों के अलावा अपनी मानसिक खूराक के बारे में भी तो कुछ सोचना चाहिए। अदरवाइज व्हाट इंज डिफरेंस बिटवीन अ मैन ऐंड ऐन एनीमल? स्कूल में तो अच्छा-खासा टाइम पास हो जाता है, यू नो, पढ़ाई कि पढ़ाई और आउटिंग कि आउटिंग ! घर के मोनोटोनस एंड डिप्रेसिंग एटमासफियर से कुछ देर के लिए छुट्टी मिल जाती है। घर में बैठे-बैठे बोर हो जाते हैं। सारी एजूकेशन बेकार हो गयी। यू नो, वन शुड डू समथिंग क्रि येटिव। स्कूल में दीज लोअर क्लास टीचर्स से भी इंटरैक्शन हो जाता है। दे आर वेरी क्रि येटिव एंड इमोशनल। दे मिस देअर फेमिली व्हेन दे वर्क आउटसाइड। एक्चुअली, इंसपाइट आफ फाइनेंशियल क्र ाइसेस एंड हैविंग गुड नालेज, दे डोंट वांट टु वर्कं, बट आयरनी इज दैट दे आर फोस्र्ड टु वर्क.. आय रियली इंंजवाय देयर कंपनी …. इट्स क्वाइट थ्रिलिंग फार मी टु शेयर देयर एक्सपीरियेंसेज। मेरे क्लास की और लेडीज तो दिन भर किटी पार्टीज में लगी रहती हैं ..आय हेट दीज किटी पार्टीज। बस साड़ी-गहनों की बात करो। आय एम फेडअप विद दीज थिंग्स…।‘

‘कितने दिनों से पढ़ा रही हैं?‘

‘अभी तो तीन महीने ही हुए हैं और यू नो, पूरे स्कूल के बच्चे मेरे पास आते हैं और कहते हैं कि मैडम आपकी क्लास में पढ़ूंगा..। सारे बच्चे अपनी कापी मुझसे ही करेक्ट $कराते हैं। एक दिन मैनेजर से मेरा झगड़ा भी हो गया। मैंने तो कह भी दिया कि मैं काम नहीं करूंगी। बट यू नो, व्हाट हैपेंड? सारे बच्चों ने मुझे कार्ड्स लिखकर दिये ..प्लीज मैडम ,डोंट लीव अस … सो स्वीट आफ देम। आय स्टार्टेड क्राइंग..। बच्चे लव्ज मी वेरी मच। मैनेजर ने मुझे तीन-तीन क्लासेज दे रखी हैं। मैं तो काम के मारे मरी जा रही हूं। घर पर लाकर कापियां करेक्ट करनी पड़ती हैं-रात-रातभर जागकर। लाइफ हैज बिकम हेल। अदर टीर्चस तो दिन-भर में चार-पांच पीरियड पढ़ाकर चली जाती हैं, सबसे अधिक मुझे ही खटना पड़ता है …नोबडी गिव्ज देम कार्ड्स… दे आर नाट पापुलर अमंज्स चिल्ड्रेन।‘

इसी बीच पिंकी आकर मैडम की साड़ी पकडक़र खड़ी हो गयी और रह-रहकर साड़ी को अपनी तरफ खींचती जा रही थी। मैडम बात करने में इतनी मशगूल थीं कि पिंकी की रूआंसी आवाज मम्मी के कानों तक नहीं पंहुच पा रही थी। साड़ी को खींचते हुए पिंकी बस एक ही चीज रटे जा रही थी, ‘ मम्मी, प्लीज डोंट गो …मम्मी प्लीज डोंट गो मम्मी !‘

मैडम को अचानक अहसास हुआ कि पिंकी उनकी साड़ी से लिपटी खड़ी है। उन्होंने पिंकी की करुण पुकार को अनसुना करते हुए एक झाड़ लगायी, ‘पिंकी, गो टु योर बेड …आय सेड गो टु योर बेड।‘ मम्मी की घूरती आंखों को देखकर वह सहम सी गयी और बेमन से अपने कमरे की तरफ चली गयी।

‘यू नो, शी इज पिंकी, माय पुअर चाइल्ड। शी हैज गाट फीवर, परसों से चढ़ा है, 102..103 डिग्री के आस-पास ही रहता है, उतरता ही नहीं। अरे हां, याद आया, वुड यू प्लीज हेल्प मी? आय हैव रिटेन सम पोएम्स, गुड पोएम्स, आय वांट देम टु बी पब्लिश्ड इन सम पेपर, कैन यू ट्राय फार मी इन योर पेपर?‘

‘आप इंगलिश में लिखती हैं और हमारा पेपर हिंदी में निकलता है। अंग्रेजी की किसी पत्रिका में कोशिश करिये।

‘अरे नहीं, आय मीन यू मिसअंडरस्टुड मी …आय राइट इन हिंदी ओनली। हिंदी इज माय मदर टंग। मेरा पूरा एक्सप्रेशन हिंदी में है। आय लव टु एक्सप्रेस मायसेल्फ इन हिंदी …! आय आलसो फील फुल कांफीडेंस इन राइटिंग इन हिंदी… मेरी पोएम्स का कलेक्शन बुक फार्म में निकलने जा रहा है। उससे पहले, आय मीन, इन द मीन टाइम मैं चाहती हूं कि कुछ पोएम्स पेपर में निकल जाये तो अच्छा रहेगा …!‘

‘आपने अपने संपादक मित्र से अनुरोध नहीं किया?‘

‘आय हैव ट्रायड हिम। ही विल डेफिनेटली गिव, बट आपके पेपर में भी निकल जाये तो यू नो थोड़ा सा स्टेटस पर फर्क पड़ता है, है न।‘

‘सो तो है।‘

‘प्लीज डू ट्राय…। आपकी डाटर किस स्कूल में पढ़ती है?‘

‘ग्रीन लान नर्सरी में।‘

‘ओह कैसी रेपुटेशन है स्कूल की?‘

‘अच्छी है। क्या पिंकी का एडमिशन कराना है?‘

‘अरे नहीं, इन सडिय़ल स्कूलों में पिंकी को नहीं डालूंगी। दे आर राटेन कैसे-कैसे गंदले बच्चे आते हैं, कैसी-कैसी फूहड़ टीचर्स आती हैं पढ़ाने? घर में पकायेंगी रोटी, करेंगी झाड़ू-पोंछा और फिर होठों पर लिपिस्टिक लगाकर पंहुच जायेंगी स्कूल में । आय हेट देम !‘

‘फिर किस लिए पूछ रही हैं ग्रीन लांस के बारे में ?‘

‘बुलाया है मुझे..! एक्चुअली दे आर आफरिंग मी नाइन हंडेड रूपीज..! मैंने भी कहला दिया है कि राउंड फीगर की बात करो वन थाउजेंड। बट यू नो ? मनी इज नो कंसीडरेशन-इट डज नाट मैटर। द ओनली थिंग इज दैट कि इट्स ऐन अपार्चयूनिटी। मुझे तो तीन ही महीने हुए हैं पढ़ाना शुरू किये हुए और आय एम गेटिंज्ज आफर्स! कितने सालों से पढ़ाने वाली टीचर्स भी हैं, बट दे नेवर गाट एनी आफर फाम एनी व्हेयर। आय वांट टु अवेल दिस अपाच्र्यूनिटी। बट यू नो चिल्डे्रन विल डेफिनेटली मिस मी … आय एम वेरी इमोशनल… आय कांट हर्ट देम। प्लीज टेल मी कि मैं क्या करूं मेरी समझ में कुछ नहीं आ रहा है कि वहाट टु डू…. प्लीज हेल्प मी ।‘

इसी बीच एक बार फिर पिंकी कमरे से बाहर निकल आयी थी लेकिन परदे की ओट में इस तरह से छिपी थी कि मम्मी की नजर उस पर न पडऩे पाये। वह लगातार रोये जा रही थी लेकिन अपनी आवाज को दबाने के लिए उसने परदे को मुंह में ठूंस लिया था। अब न तो उसकी आवाज उसकी मम्मी के कानों तक पंहुचेगी और न ही आंसू उसकी मम्मी देख पायेगीं।

(यह व्यंग्य वर्ष 1987 मेें मैंने लिखा था जो तब इलाहाबाद और लखनऊ से प्रकाशित दैनिक समाचार पत्र अमृत प्रभात में घूमता आईना स्तम्भ में प्रकाशित हुआ था)

स्नेह मधुर Sneh Madhur

 

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