
आनंद मोहन भटनागर
घटती हिन्दू जनसंख्या… एक हकीकत!
भारत में जनगणना के फ़ार्म में मात्र ६ धर्मों का ही उल्लेख है, ये धर्म हैं हिन्दू, मुसलिम, सिख, ईसाई, बौद्ध और जैन । इन सभी धर्मों में हिन्दूओं को ही बहुसंख्यक माना गया है, शेष सभी अल्पसंख्यक हैं।
फ़ार्म में एक कालम और है “अन्य “ का । इस अन्य में वे लोग शामिल हैं जो अपने आप को अमेरिका की तर्ज़ पर ख़ुद को “एथिस्ट “ कहते है । भारत जैसे देश मे इनकी संख्या कई लाखों में है जो ख़ुद को किसी धर्म का नहीं मानते हैं, लेकिन वास्तव में वे हैं धर्मान्तरिक ईसाई । ये वे लोग हैं जो हिन्दू और दलित होने के बाबजुद ईसाई धर्म स्वीकार कर चुके हैं लेकिन उन्होंने अपने नाम मे कोई संशोधन नहीं किया है और आज भी लोग उन्हें हरीश चंद , प्रभु दयाल हरबंस लाल जैसे नामों से ही जानते हैं।
ये लोग ईसाई धर्म स्वीकार करने के बाद भी ईसाई देशों से सुविधाए भी लेते हैं और वक़्त पड़ने पर देश से अल्पसंख्यक होने का लाभ भी लेते रहते हैं।
भारत में हिन्दू जनसंख्या कुल जनसंख्या का ८० फ़ीसदी बतायी जाती है। यह आँकड़ा भ्रामक लगता है क्योंकि हमारे देश के नौ राज्यों मे हिन्दू आज अल्पसंख्यक हो चुका है। इनकी स्थिति इन राज्यों में यह है कि उन्हें वे सुविधाए भी नहीं मिलती जो अन्य राज्यों मे अल्पसंख्यकों को मिलनी चाहिए ।
केरल जैसे राज्य में बहुत ही शीघ्र हिन्दूओं की वही हालत होने वाली है जो काशमीर की कभी थी। अरुणाचल, मणिपुर, मेघालय, उत्तर पूर्व के कई राज्यों मे ईसाइयो की जनसंख्या का लगातार बढ़ना गहरी चिन्ता का विषय है। नागालैंड में तो हिन्दू आवादी का प्रतिशत मात्र ५ फ़ीसद से भी कम है ।
हमारी हिन्दू जनसंख्या आज ८० फ़ीसदी से भी कम है क्योंकि धर्मान्तरित ईसाइयों ने अपना ईसाई धर्म घोषित नहीं किया है। सरकार भी यह बताने के मूड में नहीं है कि कितने बांगलादेशी, जो दो दशक पूर्व ६ करोड़ थे, आज कैसे १६ करोड़ का आँकड़ा पार कर गये हैं?
आनंद मोहन भटनागर, लखनऊ
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